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प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने क़ानूनी शिक्षा में लड़कियों के लिए आरक्षण की हिमायत की

पहले अंतराष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस के उपलक्ष्य में प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा कि वर्तमान में शीर्ष अदालत में चार महिला न्यायाधीश हैं, जो इसके इतिहास में अब तक की सबसे अधिक संख्या है और निकट भविष्य में भारत पहली महिला प्रधान न्यायाधीश का गवाह बनेगा.

चीफ जस्टिस एनवी रमना. (फोटो साभार: यूट्यूब/सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन)

नई दिल्ली: प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) एनवी रमना ने लड़कियों के लिए कानूनी शिक्षा में आरक्षण की पुरजोर पैरवी करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि आंकड़े साबित करते हैं कि इस तरह के प्रावधान से जिला स्तर पर महिला न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति में ‘उत्साहजनक परिणाम’ मिले हैं.

उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए आरक्षण के जरिये तेलंगाना ने 52 प्रतिशत, असम ने 46 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश ने 45 प्रतिशत, ओडिशा ने 42 प्रतिशत और राजस्थान ने 40 प्रतिशत महिला न्यायिक अधिकारियों के साथ अच्छा प्रदर्शन किया है.

पहले ‘अंतराष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस’ के उपलक्ष्य में उच्चतम न्यायालय में आयोजित एक कार्यक्रम में संबोधन में जस्टिस रमना ने कहा, ‘मैं दृढ़ता से महसूस करता हूं कि महिलाओं को आरक्षण प्रदान करने की नीति को सभी स्तरों पर और सभी राज्यों में दोहराने की आवश्यकता है.’

उन्होंने कहा कि दिल्ली में महिला अधिवक्ताओं द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कार्ल मार्क्स के एक प्रसिद्ध कथन के आधार पर कहा था, ‘दुनिया की महिलाओं, एकजुट हो जाओ, आपके पास जंजीरों के अलावा खोने के लिए कुछ भी नहीं है.’

उन्होंने कहा, ‘मेरे उस आह्वान को क्रांति के लिए उकसावे के रूप में प्रस्तुत किया गया था. यदि महिलाओं को उनका उचित हिस्सा देना एक क्रांति है, तो मुझे एक क्रांतिकारी के रूप में प्रस्तुत किए जाने पर बहुत खुशी होगी. ऐसी क्रांति का मैं तहे दिल से स्वागत करता हूं.’

जस्टिस रमना ने कहा कि वर्तमान में शीर्ष अदालत में चार महिला न्यायाधीश हैं, जो इसके इतिहास में अब तक की सबसे अधिक संख्या है और निकट भविष्य में भारत पहली महिला प्रधान न्यायाधीश का गवाह बनेगा.

उन्होंने कहा, ‘लेकिन, मुझे लगता है, हम अभी भी अपनी न्यायपालिका में महिलाओं का कम से कम 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने से बहुत दूर हैं. कानूनी पेशा अभी भी पुरुष प्रधान है, जिसमें महिलाओं का बहुत कम प्रतिनिधित्व है.’

प्रधान न्यायाधीश के अलावा शीर्ष अदालत की चार मौजूदा महिला न्यायाधीशों- जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी ने भी इस कार्यक्रम को संबोधित किया.

जस्टिस रमना ने कहा कि 10 मार्च को ‘अंतराष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस’ के रूप में मान्यता देना जागरूकता पैदा करने और राजनीतिक इच्छाशक्ति को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम है.

उन्होंने कहा, ‘मैं सकारात्मक कार्रवाई का प्रबल समर्थक हूं. प्रतिभा के भंडार को समृद्ध करने के लिए मैं कानूनी शिक्षा में लड़कियों के लिए आरक्षण का पुरजोर प्रस्ताव करता हूं. आंकड़े साबित करते हैं कि इस तरह के प्रावधान से जिला स्तर पर महिला न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति में उत्साहजनक परिणाम मिले हैं.’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्याय वितरण प्रणाली के लिए प्रगतिशील परिवर्तन में सबसे आगे होना अनिवार्य है. उन्होंने महसूस किया कि न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व का प्राथमिक कारण समाज में गहराई से निहित पितृसत्ता है.

उन्होंने कहा कि महिलाओं को अक्सर अदालत कक्ष के भीतर शत्रुतापूर्ण माहौल का सामना करना पड़ता है और प्रताड़ना, बार और बेंच के सदस्यों की तरफ से सम्मान की कमी तथा उनकी राय को दबाना ‘कुछ अन्य दर्दनाक अनुभव’ हैं, जो अक्सर कई महिला वकीलों द्वारा सुनाए जाते हैं.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि परिणामस्वरूप भारत में पंजीकृत लगभग 17 लाख अधिवक्ताओं में से केवल 15 प्रतिशत महिलाएं हैं.

उन्होंने कहा, ‘विचार प्रक्रिया में समावेश का अभाव इस विसंगति को बनाए रखता है.’ साथ ही कहा कि कानून स्नातक कर चुकीं कई महिलाएं सामाजिक अपेक्षाओं के कारण अपनी पेशेवर महत्वाकांक्षाओं को छोड़ने के लिए मजबूर हैं.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कॉर्नेलिया सोराबजी, जो 1892 में ऑक्सफोर्ड में कानून की पढ़ाई करने वाली पहली महिला थीं, भारत लौट आईं और ‘पर्दे’ में रहने वाली महिलाओं के साथ बड़े स्तर पर काम किया.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, सीजेआई ने कहा, ‘अक्सर महिलाएं आपराधिक न्याय प्रणाली में प्रतिनिधित्व की कमी के कारण कुछ अपराधों की रिपोर्ट करने में हिचकिचाहट महसूस करती हैं. विविध न्यायपालिका में एक रणनीतिक निवेश न्याय तक पहुंचने में अनुकरणीय परिवर्तन लाएगा.’

ग्रामीण पृष्ठभूमि से अधिक महिला न्यायाधीशों की आवश्यकता पर जोर देते हुए रमना ने कहा, ‘ग्रामीण महिलाओं या हाशिये के समुदायों की महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले अत्याचारों को अक्सर कम करके आंका जाता है और कई लोगों द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता है. संपर्क का पहला बिंदु होने के नाते जिला न्यायपालिका को महिलाओं और बच्चों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है.’

उन्होंने उम्मीद की कि सभी वर्गों और वर्गों की महिलाओं को निष्पक्ष और न्यायसंगत समाज के सपने को प्राप्त करने के लिए न्यायिक प्रणाली के भीतर जगह मिलेगी.

उन्होंने यह भी कहा कि सीजेआई के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने उच्च न्यायालयों के लिए 37 महिला न्यायाधीशों की सिफारिश की, जिनमें से केंद्र ने अब तक केवल 17 सिफारिशों को मंजूरी दी है.

कार्यक्रम में शामिल चारों महिला न्यायाधीशों में वरिष्ठ महिला न्यायाधीश, जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने यह दिखाने के लिए आंकड़े साझा किए कि उच्च न्यायालयों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कितना कम था.

जस्टिस हिमा कोहली ने बताया कि उच्च न्यायालयों में 680 न्यायाधीशों में 83 महिलाएं हैं, जबकि अधीनस्थ न्यायालयों की सेवा करने वाले न्यायिक कर्मचारियों में 30 प्रतिशत महिलाएं हैं.

जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी ने कहा कि उस प्रतिनिधित्व के साथ भी महिलाओं ने साबित कर दिया है कि वे महत्वपूर्ण नेतृत्व भूमिकाएं प्राप्त कर सकती हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)