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राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग निष्क्रिय, 2018 से लंबित हैं रिपोर्ट्स: संसदीय समिति

सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर गठित संसदीय समिति ने पाया है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग पिछले चार वर्षों से निष्क्रिय रहा है और संसद में उसने एक भी रिपोर्ट पेश नहीं की है.

डोंगरिया कोंद आदिवासी समुदाय की महिलाएं. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: एक संसदीय समिति ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) पिछले चार वर्षों से निष्क्रिय पड़ा है और संसद में उसने एक भी रिपोर्ट पेश नहीं की है.

द हिंदू के मुताबिक, आयोग की ओर से लंबित रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश में इंदिरा सागर पोलावरम परियोजना के आदिवासी आबादी पर प्रभाव संबंधी आयोग द्वारा किया अध्ययन और राउरकेला स्टील प्लांट की वजह से विस्थापित हुए आदिवासियों के पुनर्वास पर एक विशेष रिपोर्ट शामिल हैं.

भाजपा की रमा देवी की अध्यक्षता वाली सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर गठित संसदीय समिति ने पाया कि इन रिपोर्ट्स को आयोग द्वारा अंतिम रूप दे दिया गया है लेकिन केंद्रीय जनजाति मंत्रालय के पास रुकी हुई हैं.

बता दें कि आयोग के पास किसी सिविल कोर्ट के समान ही शक्तियां होती हैं, वह आदिवासियों के अधिकारों और सुरक्षा संबंधित मामलों पर जांच करता है.

समिति ने कहा है, ‘समिति यह नोट करने के लिए विवश है कि 2018 से आयोग की रिपोर्ट्स अभी भी जनजातीय मंत्रालय में प्रक्रियाधीन हैं और आज तक संसद में प्रस्तुत नहीं की गई है. समिति चाहती है कि मामले में तेजी लाई जाए और बिना किसी देरी के रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएं.’

समिति ने आयोग के जनशक्ति और बजटीय कमी के साथ काम करने के चलते निष्क्रिय होने संबंधी तर्कों पर निराशा व्यक्त की. साथ ही, संसदीय समिति ने आगे कहा कि वह हतप्रभ है कि आयोग में कई पद अब भी रिक्त हैं.

वहीं, मंत्रालय ने दावा किया कि आयोग में भर्ती आवेदकों की कमी के कारण रोक दी गई थी क्योंकि पात्रता की सीमा बहुत अधिक निर्धारित की गई थी और नियमों में अब सुधार किया जा रहा है ताकि अधिक उम्मीदवार आवेदन कर सकें.

आयोग की वेबसाइट के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2021-22 में आयोग की केवल चार बैठकें हुईं हैं. शिकायतों के समाधान और आयोग को प्राप्त होने वाले मामलों के लंबित होने की दर भी 50 प्रतिशत के करीब है.

सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट को पिछले सप्ताह लोकसभा में पेश किया गया था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह समिति यह देखकर ‘लाचार’ है कि एनसीएसटी की रिपोर्ट वर्ष 2018 से जनजातीय मामलों के मंत्रालय में प्रक्रियाधीन है और अब तक संसद में पेश नहीं की गई है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)