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म्यांमार में मुस्लिम रोहिंग्या का दमन ‘नरसंहार’ है: अमेरिका

अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने सोमवार को ‘यूएस होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम’ में अपने संबोधन में कहा कि अधिकारियों ने म्यांमार की सेना द्वारा जातीय अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ व्यापक और चरणबद्ध अभियान के तहत आम नागरिकों पर बड़े पैमाने पर अत्याचार के पुष्ट आंकड़ों के आधार पर इसे ‘नरसंहार’ बताया है.

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ घटित एक घटना की तस्वीर. (फोटो: रॉयटर्स)

वाशिंगटन: अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि म्यांमार में मुस्लिम रोहिंग्या आबादी का हिंसक दमन ‘नरसंहार’ के समान है.

ब्लिंकन ने सोमवार को ‘यूएस होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम’ में अपने संबोधन में कहा कि अधिकारियों ने म्यांमार की सेना द्वारा जातीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ व्यापक और चरणबद्ध अभियान के तहत आम नागरिकों पर बड़े पैमाने पर अत्याचार के पुष्ट आंकड़ों के आधार पर इसे ‘नरसंहार’ बताया है.

म्यांमार के सशस्त्र बलों ने 2017 में एक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसमें मुख्य रूप से रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के कम से कम 7,30,000 लोगों को उनके घरों छोड़कर और पड़ोसी बांग्लादेश में मजबूर किया गया था. यहां उन्होंने हत्याओं, सामूहिक बलात्कार और आगजनी की घटनाओं की बात कही थी. 2021 में म्यांमार की सेना ने तख्तापलट में सत्ता पर कब्जा कर लिया था.

ब्लिंकन के पदभार ग्रहण करने के लगभग 14 महीने बाद यह आया है, जब उन्होंने हिंसा की नई समीक्षा करने का संकल्प लिया था.

अमेरिकी अधिकारियों और एक बाहरी कानूनी फर्म ने अत्याचारों की गंभीरता को शीघ्रता से स्वीकार करने के प्रयास में साक्ष्य एकत्र किए थे, लेकिन तत्कालीन विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने इस संबंध में कोई बयान देने से इनकार कर दिया था.

अमेरिकी अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि ब्लिंकन ने अपना ‘कानूनी और तथ्यात्मक विश्लेषण’ करने का आदेश दिया था. विश्लेषण से निष्कर्ष निकला कि म्यांमार सेना नरसंहार कर रही है और वॉशिंगटन (अमेरिका) का मानना ​​है कि औपचारिक दृढ़ संकल्प से जुंटा (सैन्य सरकार) को जवाबदेह ठहराने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा.

वॉशिंगटन में म्यांमार के दूतावास के अधिकारियों और जुंटा के एक प्रवक्ता ने बीते 20 मार्च इस संबंध में टिप्पणी का अनुरोध करने वाले ईमेल का तुरंत जवाब नहीं दिया.

म्यांमार की सेना ने रोहिंग्या के खिलाफ नरसंहार करने से इनकार किया है, जिन्हें म्यांमार में नागरिकता से वंचित कर दिया गया है. सेना का कहना है कि यह 2017 में आतंकवादियों के खिलाफ एक अभियान चला रहा था.

ब्लिंकन जिनेवा में स्थित एक संयुक्त राष्ट्र निकाय इंडिपेंडेंट मैकेनिज़्म फॉर म्यांमार (आईआईएमएम) के लिए 10 लाख डॉलर के अतिरिक्त फंडिंग की भी घोषणा करेंगे. यह संगठन संभावित भविष्य के मुकदमों के लिए सबूत इकट्ठा कर रहा है.

विदेश मंत्री ब्लिंकन ने यूक्रेन सहित दुनिया में कहीं और भीषण हमले की स्थिति में अमानवीयता पर ध्यान देने के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने कहा, ‘हां, हम यूक्रेन के लोगों के साथ खड़े हैं और हमें उन लोगों के साथ भी खड़ा होना चाहिए जो अन्य जगहों पर अत्याचार झेल रहे हैं.’

फरवरी 2021 में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के सैन्य तख्तापलट के बाद से म्यांमार की सरकार अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रही है. पूरे देश में हजारों आम नागरिक मारे गए हैं और सत्तारूढ़ सैन्य सरकार का विरोध करने वालों को जेल में डाला जा रहा है.

ह्वाइट हाउस की प्रेस सचिव जेन साकी ने कहा कि ब्लिंकन की घोषणा विशेष रूप से पीड़ितों और हमले से बचे लोगों पर जोर देती है कि अमेरिका इन अपराधों की गंभीरता को जानता है. हमारा विचार है कि म्यांमार की सेना के अपराधों पर प्रकाश डालने से अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा, उनके लिए और अधिक दुर्व्यवहार करना कठिन हो जाएगा.’

अगस्त 2017 से 7,00,000 से अधिक रोहिंग्या मुस्लिम, बौद्ध बहुल म्यांमार से बांग्लादेश में शरणार्थी शिविरों में पलायन कर गए हैं. ऐसा तब शुरू हुआ, जब सेना ने एक विद्रोही समूह के हमलों के बाद उन्हें देश से निकालने के उद्देश्य से एक अभियान शुरू किया था. मानवाधिकार संगठनों ने भी इसका स्वागत किया.

विदेश विभाग की 2018 की एक रिपोर्ट में म्यांमार की सेना द्वारा गांवों को तबाह करने और 2016 के बाद से नागरिकों से बलात्कार, यातना और सामूहिक हत्याओं को अंजाम देने के उदाहरणों को शामिल किया गया है.

इधर, बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थियों ने म्यांमार में बड़े पैमाने पर मुस्लिम जातीय समूह के हिंसक दमन को ‘नरसंहार’ मानने संबंधी अमेरिकी घोषणा का सोमवार को स्वागत किया है.

कुटुपलोंग शिविर में रह रहीं 60 वर्षीय सालाउद्दीन ने कहा, ‘हम इसे नरसंहार घोषित किए जाने की बात से बेहद खुश हैं. बहुत-बहुत धन्यवाद.’

ढाका विश्वविद्यालय में नरसंहार अध्ययन केंद्र के निदेशक इम्तियाज अहमद ने कहा कि घोषणा ‘एक सकारात्मक कदम’ है, लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कार्रवाई और ‘ठोस कदम’ का पालन किया जाता है या नहीं.

अहमद ने कहा, ‘सिर्फ यह कहकर कि म्यांमार में रोहिंग्याओं के खिलाफ नरसंहार किया गया था, काफी नहीं है. मुझे लगता है कि हमें यह देखने की जरूरत है कि इस बयान से क्या निष्कर्ष निकलता है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)