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पेगासस: सुप्रीम कोर्ट की समिति ने जनता से 11 सवालों पर प्रतिक्रियाएं मांगीं

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस आरवी रवींद्रन की अध्यक्षता वाली समिति ने जनता के लिए 11 प्रश्नों का एक फॉर्म तैयार किया है, जिसमें साइबर सुरक्षा को मज़बूत करने के सुझाव और मौजूदा क़ानूनों की प्रभावशीलता व सरकारी निगरानी के संबंध में जनता की राय मांगी गई हैं.

(इलस्ट्रेशन: द वायर/पीटीआई)

नई दिल्ली: पत्रकारों, विपक्षी नेताओं, जजों और अन्य के खिलाफ पेगासस स्पायवेयर के कथित उपयोग की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति ने इस मुद्दे से संबंधित 11 प्रश्नों पर जनता से 31 मार्च तक उसके मत और टिप्पणियां मांगीं हैं.

समिति का गठन पिछले साल 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस आरवी रवींद्रन की अध्यक्षता में तब हुआ था जब शीर्ष अदालत ने पाया कि केंद्र सरकार द्वारा पेगासस के इस्तेमाल से इनकार की अनुपस्थिति में अदालत के पास मामले की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति के गठन के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है.

इस समिति में जस्टिस रवींद्रन के अलावा साल 1976 बैच के पूर्व आईपीएस अधिकारी आलोक जोशी और अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन/ अंतरराष्ट्रीय इलेक्ट्रो-तकनीकी आयोग की संयुक्त तकनीकी समिति में उप-समिति के अध्यक्ष संदीप ओबेरॉय शामिल हैं.

वहीं, एक तीन सदस्यीय तकनीकी समिति भी है जो कि सुप्रीम कोर्ट की उपरोक्त समिति को जांच में सुझाव देती है, इसमें साइबर सुरक्षा और डिजिटल फॉरेंसिक्स के प्रोफेसर और गुजरात के गांधीनगर में स्थित राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय के डीन डॉ. नवीन कुमार चौधरी, केरल के अमृता विश्व विद्यापीठम में इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. प्रभारन पी. और बंबई के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग के संस्थान अध्यक्ष एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अश्विन अनिल गुमस्ते शामिल हैं.

अब समिति ने जनता के लिए 11 प्रश्नों के साथ एक फॉर्म तैयार किया है, जिसमें शामिल कुछ प्रश्न हैं कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने आदि के उद्देश्यों के लिए नागरिकों के व्यक्तिगत या निजी संचार की राज्य द्वारा निगरानी की मौजूदा सीमाएं अच्छी तरह से परिभाषित हैं और समझी जाती हैं? क्या टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम, 2000 (कार्यकारी निरीक्षण उपायों सहित) के तहत वर्तमान में परिभाषित प्रक्रियाएं राज्य द्वारा निगरानी के अत्यधिक नियमित उपयोग और दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त हैं, उस स्थिति में जब ऊपर उल्लेखित कारणों का इस्तेमाल करते हुए निगरानी को उचित बताया जाता है?

साथ ही पूछा गया है कि क्या विशिष्ट श्रेणियों के व्यक्तियों के लिए विशेष सुरक्षा उपाय होने चाहिए? क्या राज्य द्वारा निगरानी तकनीक का खुलासा करने की जरूरत होनी चाहिए, किसके साथ इस जानकारी का खुलासा करना चाहिए और क्या यह जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में आनी चाहिए?

ऐसे ही 11 सवाल पूछकर फॉर्म के माध्यम से साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के सुझाव मांगे गए हैं.

मालूम हो कि एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया कंसोर्टियम, जिसमें द वायर  भी शामिल था, ने 2021 में पेगासस प्रोजेक्ट के तहत यह खुलासा किया था कि इजरायल की एनएसओ ग्रुप कंपनी के पेगासस स्पायवेयर के जरिये दुनियाभर में नेता, पत्रकार, कार्यकर्ता, सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों के फोन कथित तौर पर हैक कर उनकी निगरानी की गई या फिर वे संभावित निशाने पर थे.

इस कड़ी में 18 जुलाई 2021 से द वायर  सहित विश्व के 17 मीडिया संगठनों ने 50,000 से ज्यादा लीक हुए मोबाइल नंबरों के डेटाबेस की जानकारियां प्रकाशित करनी शुरू की थी, जिनकी पेगासस स्पायवेयर के जरिये निगरानी की जा रही थी या वे संभावित सर्विलांस के दायरे में थे.

इस एक पड़ताल के मुताबिक, इजरायल की एक सर्विलांस तकनीक कंपनी एनएसओ ग्रुप के कई सरकारों के क्लाइंट्स की दिलचस्पी वाले ऐसे लोगों के हजारों टेलीफोन नंबरों की लीक हुई एक सूची में 300 सत्यापित भारतीय नंबर हैं, जिन्हें मंत्रियों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, न्यायपालिका से जुड़े लोगों, कारोबारियों, सरकारी अधिकारियों, अधिकार कार्यकर्ताओं आदि द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है.

यह खुलासा सामने आने के बाद देश और दुनियाभर में इसे लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था.

बता दें कि एनएसओ ग्रुप मिलिट्री ग्रेड के इस स्पायवेयर को सिर्फ सरकारों को ही बेचती हैं. भारत सरकार ने पेगासस की खरीद को लेकर न तो इनकार किया है और न ही इसकी पुष्टि की है.