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हिजाब, हलाल और मुस्लिम पुरुष: मुसलमानों के बारे में हिंदुत्व के पूर्वाग्रहों का कोई अंत नहीं है

मुस्लिमों की लानत-मलामत करना चुनाव जीतने का फॉर्मूला बन चुका है. और देश के हालात देखकर लगता नहीं है कि ये आने वाले समय में असफल होगा.

3 अप्रैल 2022 को दिल्ली के बुराड़ी में हुई हिंदू महापंचायत में यति नरसिंहानंद के साथ अन्य हिंदुत्ववादी नेता व कार्यकर्ता. (फोटो: पीटीआई)

1980 के दशक में पाकिस्तान की क्रिकेट टीम के कप्तान इमरान खान, जो इस समय अपना राजनीतिक करिअर बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं, भारत में काफी मशहूर थे, खेल के मैदान में भी और इससे बाहर भी. उनकी ग्लैमरस सोशल हस्तियों और अभिनेत्रियों के साथ पार्टियों की तस्वीरें खूब छपा करती थीं. वो एक साबुन का विज्ञापन भी करते थे, जिसमें उनकी मर्दानगी का भरपूर प्रदर्शन किया गया था- भारत में उस विज्ञापन में विनोद खन्ना को लिया गया था.

उस दौर में कहा जाता था कि इमरान और उनकी टीम के साथी युवा महिलाओं के बीच खासे चर्चित थे और भारत में उन्होंने अच्छा समय बिताया. भारतीय क्रिकेटरों को तब ये शिकायत करते सुना जाता था कि उन्हें पाकिस्तान में इस तरह की मेहमान-नवाज़ी नसीब नहीं होती.

अब जाकर मालूम हुआ कि भारतीय महिलाओं के प्रिय केवल पाकिस्तान के पुरुष नहीं थे- बल्कि सामान्य तौर पर मुस्लिम पुरुष हैं. कार्यकर्ता मधु पूर्णिमा किश्वर का ‘सेक्स जिहाद’ को लेकर किया गया ट्वीट कि कैसे प्रशिक्षित युवा मुस्लिम लड़के समवयसी हिंदू, ईसाई और सिख लड़कियों को अपनी बेहतर तकनीक और कौशल से बहका रहे हैं, चर्चा और जगहंसाई का विषय बना, लेकिन यह ‘डर’ आज का नहीं है, यह बहुत समय से बना हुआ है.

मधु किश्वर का ट्वीट, जिसे अब डिलीट कर दिया गया है.

पटौदी के खूबसूरत नौजवान नवाब ने शर्मिला टैगोर से शादी की और बॉलीवुड के ख़ान अभिनेताओं ने भी हिंदू महिलाओं को अपने जीवनसाथी के बतौर चुना, या उनके साथ संबंध में रहे. स्पष्ट तौर पर ये भी इसी ‘सेक्स जिहाद’ साज़िश का हिस्सा हैं.

चलिए, हंसी-मजाक की बात खत्म, गंभीर मुद्दे पर आते हैं. आम मुस्लिम पुरुषों को हिंदू औरतों के साथ सफर करने पर पीटा गया और कई राज्यों ने ‘लव जिहाद’ कानून पास किया है, जिसके कि इस तरह के किसी विवाह, अगर उसमें धर्मांतरण किया गया हो, को निषेध किया जा सके.

इस ट्वीट- जो अब डिलीट कर दिया गया है- में अब तक जो अनकहा था, वो कह दिया गया; बात प्रेम की नहीं है, सेक्स की है, जिसमें मुस्लिम पुरुष बेहतर हैं और कमजोर हिंदू पुरुष नहीं हैं. मेरी समझ से इन समुदायों के पुरुषों, खासकर हिंदू पुरुषों, क्योंकि वो बहुलता में हैं, को इस तरह के सामान्यीकरण को अपमान की तरह लेना चाहिए.

लेकिन मुस्लिम पुरुष महिलाओं, विशेष तौर पर हिंदू महिलाओं को आकर्षक क्यों लगते हैं? इसका कोई जवाब नहीं दिया गया है, लेकिन शायद मांसाहारी होना इसका जवाब हो! इसका कोई मौका न छोड़ते हुए कर्नाटक में हिंदुत्व के सिपाही हलाल मटन के पीछे पड़ गए हैं, वो तरीका जो सदियों से चलन में है और सभी समुदायों के लोगों द्वारा पसंद किया जाता रहा है. हलाल काटने का एक तरीका है जो दिखाता है कि कोई उत्पाद- केवल मटन/मांस नहीं- इस्लामी कायदों के तहत सभी के लिए जायज़ है. मिडिल ईस्ट देशों में निर्यात किए जाने वाले सामान को नियमित तौर पर हलाल चिह्नित किया जाता है, (इसमें बाबा रामदेव के समूह की कंपनियां भी शामिल हैं) कोई भी बाजार में अपने फायदे का अवसर नहीं छोड़ना चाहता है.

कर्नाटक सरकार ने इस विवाद, जो स्पष्ट तौर पर चुनाव से पहले ध्रुवीकरण के इरादे से शुरू किया गया है, से दूरी बनाई है, लेकिन इसे रोकने के लिए कोई कड़े कदम नहीं उठाए.

कर्नाटक हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला है- यहीं मुस्लिम छात्राओं को उनका हिजाब निकालकर क्लास में आने को कहा गया था, वो भी सबसे ख़राब तरीके से. यह उडुपी के एक सरकारी कॉलेज से शुरू हुआ और फिर पूरे राज्य में फैल गया. एक मौके पर तो लड़कों के एक समूह ने एक छात्रा को रोकने का प्रयास करते हुए बदतमीज़ी भी की थी.

एक प्रख्यात समाजवादी के इंजीनियर बेटे बसवराज बोम्मई की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने स्कूल में हिजाब पहनने को प्रतिबंधित करने का आदेश दिया था, जिसे अदालत ने भी बरक़रार रखा. ऐसे में कई छात्राओं के पास पढ़ाई छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.

इन सबका एक पैटर्न है. मुसलमानों को अक्सर उनके सबसे बुनियादी पहचान चिह्नों या सरलीकृत क्लीशे (घिसे-पिटे नजरिये) के चश्मे से देखा जाता है, जिनसे अक्सर सबसे ‘समझदार’ माने जाने वाले हिंदू भी सहमति रखते दिखते हैं, ऐसे कई भी जो गर्व से कहेंगे कि वे सांप्रदायिक सोच वाले नहीं हैं और असल में उनके मुस्लिम दोस्त भी हैं. और फिर भी वे सवाल करते हैं कि किसी स्कूल के यूनिफॉर्म पर जोर देने में क्या गलत है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि ये सब क्रॉस, पगड़ी या माथे पर अपनी जाति संबंधित कोई चिह्न लगाने पर लागू नहीं होता. पता नहीं क्यों मुस्लिम अलग थे, या वो देखने में ज्यादा मुसलमान लगते हैं.

ऊपर से देखने में यति नरसिंहानंद के ‘मुस्लिम प्रधानमंत्री बन गया तो…‘ कहकर हिंदुओं को हथियार उठाने के लिए उकसाने वाले बयान और कर्नाटक सरकार के मुस्लिम छात्राओं के लिए हिजाब पर रोक लगाने के फैसले में अंतर दिख सकता है, लेकिन इसे संहार का आह्वान कहें या अपमान का, इसका उद्देश्य एक ही है- ऐसी निराधार बातें फैलाओ कि देश के करीब 2 करोड़ मुस्लिम किसी गिनती में ही न रहें.

चाहे विधायी तरीके- नागरिकता (संशोधन) अधिनियम से – या मंदिरों के पास मुस्लिम व्यापारियों को अनुमति न देकर, जो उनकी आजीविका के साधन को छीन लेगा, हिंदुत्व की ताकतें मुसलमानों को गैर-नागरिक में बदल रही हैं, जिनका राजी-ख़ुशी रहना हम बाकी लोगों के लिए मायने नहीं रखता या जरूरी नहीं होना चाहिए.

बायोकॉन की अध्यक्ष और प्रभावशाली कारोबारी किरण मजूमदार शॉ ने, विशेष तौर पर कर्नाटक, जहां वो रहती हैं, में इस तरह के कदमों के खतरों को भांप लिया. उन्होंने कहा कि इस तरह के विभाजनकारी कदम राज्य में व्यापार के लिए ठीक नहीं होंगे. ऐसे समय में जब अधिकतर बड़े कारोबारी कूटनीति या डर के चलते चुप्पी ओढ़ लेते हैं, किरण का यह बयान बहादुरी भरा है. भाजपा स्वाभाविक रूप से बौखला गई, लेकिन इस टिप्पणी से सरकार को कम से कम संभावित आर्थिक गिरावट के बारे में सोचना चाहिए.

लेकिन शायद ही ऐसा होगा. भाजपा और हिंदुत्ववादियों के लिए मुस्लिमों को कोसना, उनकी लानत-मलामत चुनावी जीत सुनिश्चित करने का आजमाया हुआ तरीका है, और यहां वही आखिरी उद्देश्य है, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सद्भाव चाहे भाड़ में जाए. हिंदुत्व की सेना इसी समान इरादे के साथ चलती है और समय-समय पर उन्हें मिले इशारों के अनुसार काम में लग जाती है. इसके अलावा, भाजपा और इसका पितृ संगठन मुस्लिमों से गहरी नफरत के अलावा बहुत कुछ नहीं जानता.

लेकिन चुनाव भी केवल एक हिस्सा भर हैं- इस नफरत की जड़ें और गहरी हैं. हिजाब और हलाल मीट के खिलाफ अभियान जल्द खत्म नहीं होगा- बल्कि देश के उन राज्यों  में भी फैलेगा जो भाजपा शासित नहीं हैं. हिंदुत्व की भीड़ अन्य व्यवसायों के पीछे भी जा रही है जो मध्य पूर्वी देशों में निर्यात के लिए अपने सामान पर हलाल की मुहर लगाते हैं या यहां तक ​​कि अपनी सामग्री के बारे में अरबी में छापते हैं (मूर्खतापूर्ण ढंग से जिसे उर्दू समझ लिया गया, जो एक और ‘मुस्लिम’ चिह्न समझा जाता है.) और यह केवल मुस्लिमों के स्वामित्व वाले कारोबारों तक सीमित नहीं है- उन्होंने हल्दीराम जैसे ब्रांड को भी नहीं बख्शा. ऐसी कोई भी चीज़, जिसके मुस्लिम होने का अंदेशा भर हो, को मिटा देना है.

यही हिंदुत्व के पूर्वाग्रह और चिंताएं हैं. जो कुछ भी मुसलमानों से जुड़ता है, उसे नजरों से, दिमाग से और हो सके तो देश से बाहर कर देना चाहिए. हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, या किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसकी पहचान एक कट्टर हिंदू की नहीं है. यह एक बेवकूफाना और विकृत कल्पना है, लेकिन यह पागल भीड़ इसे पाने के लिए खतरनाक स्तर तक जा सकती है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)