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उपचुनावों में भाजपा के ख़ाली हाथ रह जाने के क्या मायने हैं

चार राज्यों में लोकसभा की एक और विधानसभाओं की चार सीटों के लिए हुए उपचुनाव में भाजपा की विफलता राज्यों या देश की राजनीति में किसी बड़े परिवर्तन का संकेत नहीं हैं. कोई ऐसी अपेक्षा भी नहीं कर रहा. लेकिन उनमें छिपे भाजपा के सामूहिक नकार को समझना इस अर्थ में बहुत ज़रूरी है कि यह जानबूझकर रचे जा रहे भाजपा के अजेय होने के मिथक को तोड़ता है.

(फोटो: पीटीआई)

अभी कहना मुश्किल है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रतिद्वंद्वी विपक्षी दल देश के चार राज्यों में लोकसभा की एक और विधानसभाओं की चार सीटों के लिए कराए गए उपचुनावों के नतीजों के सबकों को ‘पल में तोला, पल में माशा, पल में रत्ती’ की अपनी पुरानी शैली में ही लेंगे या किंचित गंभीरता से.

लेकिन इस बाबत कोई दो राय नहीं कि मतदाताओं ने इनमें जिस तरह पांच राज्यों में हुए गत विधानसभा चुनावों के ‘आप को छोड़कर सारे विपक्ष के हाथ खाली और भाजपा में खुशहाली’ वाले नतीजों को पलटकर ‘विपक्ष में खुशहाली और भाजपा के हाथ खाली’ में बदल दिया है, उससे वे विश्लेषक पूरी तरह उल्टे लटक गए हैं, जो उक्त विधानसभा चुनाव नतीजों से इतने उत्साहित हो चले थे कि 2022 में ही 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजे भी निकाले दे रहे थे.

ताजा नतीजों ने जता दिया है कि इस देश के बड़प्पन के लिहाज से उक्त विश्लेषकों का कद तो बहुत छोटा है ही, वे अपनी बौद्धिक कवायदों को भी ऐसा आकार नहीं दे पाते, जिससे अपने निष्कर्षों को उस समग्रता से जोड़ सके, जो हमारे जैसे विविधताओं से भरे देश में उनके गलत होने से बचने की अनिवार्य शर्त है.

गौरतलब है कि उल्टे लटकने वाली यह बात इन विश्लेषकों के लिए ही नहीं, कांग्रेस समेत उन सभी विपक्षी दलों, साथ ही विधानसभा चुनावों में उनकी जीत की उम्मीद लगाए बैठे.

साथ ही, अंततः निराश हुए शुभचिंतकों के लिए भी सच है, जो इस कदर विचलित हो रहे थे, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में बुलडोजरी निजाम के खिलाफ सारे वाजिब तर्कों के ध्वस्त हो जाने की हताशा में, कि जैसे अब उस रात की कोई सुबह ही नहीं है क्योंकि मुफ्त राशन, रसोई गैस सिलेंडर व आवास जैसी कल्याणकारी योजनाओं की मार्फत लाभार्थी बनाए जा चुके मतदाताओं ने वाकई भाजपा के नमक का हक अदा करना शुरू कर दिया है और देश व समाज के समक्ष उपस्थित बेरोजगारी, महंगाई ओर आवारा पशुओं से फसलों को हो रहे नुकसान जैसे दूसरे ज्वलंत मुद्दों पर कतई गौर नहीं कर रहे.

हां, यह बात उस भाजपा के लिए भी सही है, जिसे गलतफहमी हो गई थी कि चार राज्यों में भारी एंटी-इनकंबेंसी के बावजूद उसकी सरकारों की वापसी कराकर मतदाताओं ने उसकी न उनकी सारी मनमानियों व आक्रामकताओं पर मुहर लगा दी है और आगे भी लगाती ही रहने वाली है.

हम देख ही रहे हैं कि इसी गलतफहमी के कारण वह और उसके ‘उत्साहित’ समर्थक देश के अमन-चैन व मुसलमानों से रंजिश निकालने की एक के बाद एक नई ‘वजहें’ तलाशने और उनकी मार्फत हिंदू राष्ट्र बनाने के अपने पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोषित लक्ष्य के रास्ते के ‘रोड़े’ खासी तेजी से दूर करने लगे हैं.

इस कदर कि उन्हें रामनवमी, नवरात्रि, हनुमान जयंती और रमजान जैसे त्योहारों को नफरत भड़काने का बहाना बनाने से भी गुरेज नहीं है, जिन्हें देशवासी सदियों से मिल-जुलकर उल्लास व समझदारी के साथ मनाते आए हैं.

पिछले दिनों अनेक विघ्नसंतोषियों ने इस संयोग को भी अपनी सुविधा बना लिया, कि इस बार नवरात्रि व रमजान लगभग साथ-साथ आए, और जताने लगे कि उनके ‘नए भारत’ में ऐसे संयोगों के वक्त त्योहारों की खुशियां आधी भी नहीं रहने दी जाने वाली और प्रायोजित टकरावों के अंदेशे कई गुने हो जाने हैं.

अन्यथा त्योहारों पर जुलूस तो पहले भी निकलते ही थे, लेकिन आतंकित करने वाले हड़बोंग मचाकर उन्हें दूसरे धर्म के पूजास्थलों के सामने से ले जाने में ऐसी ‘शान’ नहीं समझी जाती थी, अश्लील व दूसरे धर्म को अपमानित करने वाले गीत बजाकर भड़काने वाले नारे भी अतनी निर्लज्जता से नहीं ही लगाए जाते थे.

लेकिन प्रशंसा करनी होगी कि जब भाजपा की सरकारें, कार्यकर्ता और समर्थक यह सब करके सांप्रदायिक व धार्मिक उद्वेलनों की ज्यादा उपज, खून की ज्यादा बारिश और वोटों की फसल की ज्यादा उपज के प्रति आश्वस्त अनुभव कर रहे थे, उपचुनावों में चारों राज्यों के मतदाताओं ने भाजपा को खाली हाथ लौटा दिया!

उनके ऐसा करने का इस अर्थ में खास महत्व है कि फिलहाल, वे सभी कारक जस के तस हैं, विधानसभा चुनावों में जनादेश के भाजपा के पक्ष में जाने को लेकर जिनका हवाला दिया जा रहा था. साथ ही उसके चाणक्यों की काबिलियत व अजेयता के गुन गाए और मतदाताओं के विवेक पर संदेह जताए जा रहे थे.

लेकिन अब उन्हीं जैसे संदेहग्रस्त मतदाताओं ने भाजपा को ऐसी हालत में ला खड़ा किया है, जहां वह इस तर्क में भी राहत नहीं ढूंढ़ पा रही कि उपचुनाव चाहे लोकसभा के हों या विधानसभा के, अपवादों को छोड़कर सत्तारूढ़ दल के पक्ष में ही जाते हैं क्योंकि इस नियम के तहत बिहार की बोचहां विधानसभा सीट वहां सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के ही पक्ष में जानी चाहिए थी.

राज्य के गत विधानसभा चुनाव में भी यह सीट उसके गठबंधन के घटक दल के ही खाते में गई थी, जबकि इस बार उसके लिए उस पर अपनी करारी हार का बचाव करना मुश्किल हो रहा है.

पश्चिम बंगाल में आसनसोल लोकसभा सीट के उपचुनाव में भी, जो पिछले दो लोकसभा चुनावों से भाजपा का अभेद्य दुर्ग बनी हुई थी, सत्तारूढ़ दल की जीत की तर्क नहीं चला और राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की कलाई मरोड़कर उसकी यह परंपरागत लोकसभा सीट तीन लाख वोटों से छीन ली.

इस सीट पर हार इसलिए भी भाजपा की आंखों में किरकिरी की तरह चुभेगी कि इस्तीफा देकर उसे खाली करने वाले उसके 2014 व 2019 के उससे निर्वाचित सांसद बाबुल सप्रियो अब तृणमूल कांग्रेस के बालीगंज के विधायक हैं और इस बार चुने गए बिहारीबाबू यानी शत्रुघ्न सिन्हा, जो अटलबिहारी वाजपेयी की केंद्र की भाजपानीत राजग सरकार में मंत्री रहे हैं, भाजपा से रिश्ते तोड़ने के बाद से ही नरेंद्र मोदी के ‘महानायकत्व’ को मुखर चुनौती देते आ रहे हैं.

बिहार से तृणमूल कांग्रेस में आने वाले दूसरे पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा की तरह वे भी भाजपा की प्रताड़ना के ही प्रतीक माने जाते हैं.

निस्संदेह, ये उपचुनाव नतीजे संबंधित चारों राज्यों या देश की राजनीति में किसी बड़े परिवर्तन की अगवानी नहीं करने वाले. कोई उनसे इसकी अपेक्षा भी नहीं ही कर रहा. लेकिन उनमें छिपे भाजपा के सामूहिक नकार के स्वर को सुनना और समझना इस अर्थ में बहुत जरूरी है कि यह देश भर में विपक्ष के लस्त-पस्त और भाजपा के अजेय होने के जानबूझकर रचे जा रहे मिथक को तोड़ता है. इस धारणा को भी कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भाजपा का अमोघ अस्त्र बन गया है.

एक प्रेक्षक ने ठीक ही लिखा है कि इन उपचुनाव नतीजों से 2024 के लोकसभा चुनाव या उससे पहले के किसी राज्य के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के मूड का आकलन करना वैसे ही सही नहीं होगा, जैसे गत विधानसभा चुनावों के नतीजों से 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का अंदाजा लगाना गलत था.

लेकिन कहना होगा कि ये उपचुनाव नतीजे विपक्ष के लिए संजीवनी भले ही न बनें और भले ही उसकी एकता की कोशिशें भी कामयाब न हों, ‘लस्त-पस्त’ विपक्षी चूहों ने सियासत के चूहे-बिल्ली के खेल के प्रतीक इन उपचुनावों में भाजपा के गले में घंटी तो बांध ही दी है. अब जब भी वह शिकार पर निकलेगी, चूहों को पता चल जाएगा कि खतरा किस तरफ से है और बचाव या हमला कैसे करना है.

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ कवि व लेखक राकेश अचल के शब्दों में कहें तो हिजाब, हलाल, अजान व नमाज आदि को लेकर नफरत भरे शोर के बीच इन उपचुनावों में विपक्ष को भाजपा के अश्वमेध के घोड़े को जहां-तहां रोकने में हासिल कामयाबी निस्संदेह, उसका मनोबल बढ़ाएगी और जनविवेक को नई तरह से देखने को प्रेरित करेगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)