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केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में राजद्रोह क़ानून का बचाव करते हुए कहा- पुनर्विचार की ज़रूरत नहीं

राजद्रोह संबंधी दंडात्मक क़ानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने पूछा था कि क्या इसे 1962 के फैसले के आलोक में पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा जाना चाहिए. इस क़ानून के भारी दुरुपयोग से चिंतित शीर्ष अदालत ने पिछले साल जुलाई में केंद्र से पूछा था कि वह स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेज़ों द्वारा इस्तेमाल किए गए इस प्रावधान को निरस्त क्यों नहीं कर रही है.

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: केंद्र ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में राजद्रोह से संबंधित दंडात्मक कानून (आईपीसी की धारा 124ए) और इसकी वैधता बरकरार रखने के संविधान पीठ के 1962 के एक निर्णय का बचाव किया. केंद्र ने यह कहते हुए कि लगभग छह दशकों से यह कानून बना हुआ है और इसके दुरुपयोग के उदाहरण कभी भी इसके पुनर्विचार का कारण नहीं हो सकते हैं.

मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 5 मई को कहा था कि वह 10 मई को इस पर सुनवाई करेगी कि क्या केदार नाथ सिंह मामले में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के 1962 के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए राजद्रोह संबंधी औपनिवेशिक युग के दंडात्मक कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को एक बड़ी पीठ को भेजा जाना चाहिए.

धारा 124ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने पूछा था कि क्या इसे 1962 के फैसले के आलोक में पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा जाना चाहिए. शीर्ष अदालत ने इस पर केंद्र और याचिकाकर्ताओं की राय मांगी थी.

इस सवाल पर कि क्या धारा 124ए (राजद्रोह) को चुनौती देने वाली याचिकाओं को केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य में 1962 के फैसले के आलोक में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए, भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ को अपने लिखित प्रस्तुतीकरण में सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि उक्त निर्णय ‘एक संविधान पीठ का निर्णय है और तीन न्यायाधीशों की पीठ पर बाध्यकारी है’.

सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से दाखिल 38-पृष्ठ लिखित प्रस्तुति में कहा गया है, ‘कानून के दुरुपयोग के मामलों के आधार पर कभी भी संविधान पीठ के बाध्यकारी निर्णय पर पुनर्विचार करने को समुचित नहीं ठहराया जा सकता. छह दशक पहले संविधान पीठ द्वारा दिए गए फैसले के अनुसार स्थापित कानून पर संदेह करने के बजाय मामले-मामले के हिसाब से इस तरह के दुरुपयोग को रोकने के उपाय किए जा सकते हैं.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की दलीलों का विरोध किया गया कि एक बदली हुई तथ्य स्थिति में तीन न्यायाधीशों की एक पीठ भी राजद्रोह कानून की वैधता की जांच कर सकती है. केंद्र की ओर से कहा गया कि कोई संदर्भ आवश्यक नहीं होगा और न ही हो सकता है कि तीन न्यायाधीशों की पीठ एक बार फिर उसी प्रावधान की संवैधानिक वैधता की जांच करे.

शीर्ष अदालत ने 1962 में राजद्रोह कानून की वैधता को बरकरार रखते हुए इसके दुरुपयोग के दायरे को सीमित करने का प्रयास किया था. यह माना गया था कि जब तक उकसाने या हिंसा का आह्वान नहीं किया जाता है, तब तक सरकार की आलोचना को राजद्रोही अपराध नहीं माना जा सकता है.

केंद्र का रुख संयोग से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की प्रस्तुतियों से मेल खाता है, जिन्होंने बीते गुरुवार (पांच मई) को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में प्रावधान को बनाए रखने के लिए जोर देते हुए कहा था, ‘केदार नाथ (निर्णय) को एक बड़ी पीठ को भेजना आवश्यक नहीं है. यह एक सुविचारित निर्णय है.’

सॉलिसिटर जनरल द्वारा तय किए गए केंद्र के लिखित प्रस्तुतीकरण ने कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया है, ‘तीन न्यायाधीशों की पीठ मामले को एक बड़ी बेंच को भेजे बिना एक संविधान पीठ के फैसले के अनुपात पर पुनर्विचार नहीं कर सकती है.’

निर्णयों का एक समग्र पाठन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि संविधान पीठ ने 1962 के फैसले में अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) सहित सभी संभावित एंगल से इस कानून की संवैधानिकता की जांच की थी और इसलिए यह बाध्यकारी है.

राजद्रोह कानून उन आरोपों के बीच विवाद के केंद्र में रही है, जिसमें कहा गया है कि विभिन्न सरकारों द्वारा राजनीतिक दुश्मनी निपटाने के लिए इसका हथियार की तरह इस्तेमाल​ किया जा रहा है.

इन आरोपों ने सीजेआई को यह पूछने के लिए प्रेरित किया था कि क्या स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इस औपनिवेशिक युग के कानून की आजादी के 75 साल बाद भी जरूरत है.

याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य वकील के रूप में पेश हुए सिब्बल ने कहा था कि मौलिक अधिकार न्यायशास्त्र में बाद के घटनाक्रमों के आलोक में पांच न्यायाधीशों की पीठ के 1962 के फैसले की अनदेखी करते हुए तीन न्यायाधीशों की पीठ अभी भी इस मुद्दे को देख सकती है.

राजद्रोह संबंधी दंडात्मक कानून के भारी दुरुपयोग से चिंतित शीर्ष अदालत ने पिछले साल जुलाई में केंद्र से पूछा था कि वह स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए महात्मा गांधी जैसे लोगों को चुप कराने के लिए अंग्रेजों द्वारा इस्तेमाल किए गए प्रावधान को निरस्त क्यों नहीं कर रही है.

प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना की अगुवाई वाली पीठ ने कहा था कि उसकी मुख्य चिंता ‘कानून का दुरुपयोग’ है और उसने पुराने कानूनों को निरस्त कर रहे केंद्र से सवाल किया कि वह इस प्रावधान को समाप्त क्यों नहीं कर रहा है.

न्यायालय ने कहा था कि राजद्रोह कानून का मकसद स्वतंत्रता संग्राम को दबाना था, जिसका इस्तेमाल अंग्रेजों ने महात्मा गांधी और अन्य को चुप कराने के लिए किया था.

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और पूर्व मेजर जनरल एसजी वोम्बटकेरे द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करने के लिए सहमति जताते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि इसकी मुख्य चिंता कानून के दुरुपयोग से मामलों की बढ़ती संख्या है.

दिसंबर 2021 में केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में सरकार की ओर से बताया था कि राजद्रोह से जुड़ी आईपीसी की धारा 124ए को हटाने से संबंधित कोई प्रस्ताव गृह मंत्रालय के पास विचाराधीन नहीं है.

जुलाई 2021 में सुप्रीम कोर्ट के चार पूर्व न्यायाधीशों- जस्टिस आफताब आलम, जस्टिस मदन बी. लोकुर, जस्टिस गोपाल गौड़ा और जस्टिस दीपक गुप्ता ने यूएपीए और राजद्रोह कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए कहा था कि अब इन्हें खत्म करने का समय आ गया है.

चार पूर्व न्यायाधीशों ने कहा था कि आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी की मौत एक उदाहरण है कि देश में आतंकवाद रोधी कानून का किस तरह दुरुपयोग किया जा रहा है. यूएपीए की असंवैधानिक व्याख्या संविधान के तहत दिए गए जीवन के मौलिक अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के अधिकार को खत्म करता है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)