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फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीक़ी को दूसरा पुलित्ज़र पुरस्कार, पिता ने कहा- अपने काम से अमर हो गया

समाचार एजेंसी ‘रॉयटर्स’ के फोटो पत्रकार रहे दानिश सिद्दीक़ी के अलावा उनके सहयोगियों अदनान आबिदी, सना इरशाद मट्टू और अमित दवे को ‘फीचर फोटोग्राफी श्रेणी’ में प्रतिष्ठित पुलित्ज़र पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. सिद्दीक़ी की पिछले साल अफ़ग़ानिस्तान में अफ़ग़ान सैनिकों और तालिबान के बीच गोलीबारी की तस्वीरें लेते समय मौत हो गई थी. 2018 में भी उन्हें रोहिंग्या शरणार्थी संकट संबंधी तस्वीरों के लिए पुलित्ज़र पुरस्कार मिल चुका है.

पुलित्ज़र पुरस्कार जीतने वाले समाचार एजेंसी रॉयटर्स के फोटो पत्रकार (बाएं से दाएं) अदनान आबिदी, सना इरशाद मट्टू, अमित दवे और दानिश सिद्दीक़ी. (फोटो: pulitzer.org)

नई दिल्ली/न्यूयॉर्क: दिवंगत फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी को दूसरा पुलित्ज़र पुरस्कार दिए जाने के बाद उनके पिता ने उन्हें याद करते हुए उन्हें बहादुर, दुनिया में दुख-दर्द के प्रति सहानुभूति रखने वाले एवं एक गंभीर पेशेवर और इसके साथ ही अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता करने वाला बेटा बताया.

दानिश के पिता अख्तर सिद्दीकी ने कहा, ‘हमें उस पर गर्व है, लेकिन हमें उसकी कमी खलती है.’

उल्लेखनीय है कि दानिश सहित चार भारतीयों को ‘फीचर फोटोग्राफी श्रेणी’ में प्रतिष्ठित पुलित्ज़र पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया गया है. 38 वर्षीय सिद्दीकी की पिछले साल जुलाई में अफगानिस्तान में मौत हो गई थी. अफगानिस्तान में अफगान सैनिकों और तालिबान के बीच गोलीबारी की तस्वीरें लेते समय उनकी मौत हो गई थी.

सिद्दीकी को दूसरी बार पुलित्ज़र पुरस्कार से नवाजा गया है. 2018 में भी रॉयटर्स के साथ काम करते हुए उन्हें रोहिंग्या शरणार्थी संकट संबंधी तस्वीरों के लिए पुलित्ज़र पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उन्होंने अफगानिस्तान तथा ईरान में युद्ध, हांगकांग में प्रदर्शन और नेपाल में भूकंप जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं की तस्वीरें ली थीं.

उनके पिता ने कहा, ‘इस पुरस्कार के बारे में जानकर उसे जरूर खुशी होती. उसने अपने समर्पण, कड़ी मेहनत, मूल्य-आधारित कार्य से हमें गौरवान्वित किया है, हमारे परिवार को और पत्रकारिता समुदाय को गौरवान्वित किया है.’

उन्होंने कहा कि उनका पुत्र अपने काम से अमर हो गया है.

उन्होंने कहा, ‘दुनिया उसे सम्मानित कर रही है. उसे इस साल अप्रैल में बोस्टन विश्वविद्यालय द्वारा सम्मानित किया गया. इससे पहले कई अन्य पुरस्कार दिए गए. दुनिया उसके काम और योगदान को मान्यता दे रही है. दुर्भाग्य से वह अपना काम और योगदान जारी रखने के लिए मौजूद नहीं है. हमें सुबह से ढेर सारे संदेश मिल रहे हैं. उसे सम्मानपूर्वक याद किया जा रहा है.’

परिवार ने उनकी विरासत का सम्मान करने के लिए दानिश सिद्दीकी फाउंडेशन की स्थापना की है.

दानिश के पिता ने कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान अपने बेटे के काम को याद करते हुए कहा कि सभी प्रकार के जोखिमों के बावजूद दानिश ने काम जारी रखा था.

उन्होंने कहा, ‘वह देश भर में अस्पतालों में, कोविड वार्डों, मुर्दाघरों, कब्रिस्तानों में गया. उसने उन दिनों काफी काम किया. उसका विचार यह दिखाना था कि लोग किस प्रकार पीड़ित हैं. उसने अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य और अपने परिवार की कीमत पर जोखिम उठाया.’

अख्तर सिद्दीकी ने कहा कि उनका बेटा अपने दो छोटे बच्चों और अपने वृद्ध माता-पिता की सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर भी बहुत सतर्क था. उन्होंने कहा कि वह संक्रमण से बचाव का खासा ध्यान रखता था.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘उसने अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य और अपने परिवार की कीमत पर जोखिम उठाया. उसे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से कोई नहीं रोक सकता था.’

उन्होंने कहा, ‘काम से घर लौटने के बाद वह बाहर के बाथरूम में नहाता था और फिर अंदर आकर अलग कमरे में रहता था. बच्चे संक्रमित हो गए थे लेकिन वे जल्द ही ठीक हो गए. वह सबसे ज्यादा ख्याल रखता था. उसे भी कोविड-19 संक्रमण हुआ था, लेकिन यह हल्का था.’

रिपोर्ट के अनुसार, दानिश महामारी के दौरान अपने माता-पिता से भी मिलने से परहेज करते थे, जो पांच से छह किलोमीटर दूर रहते थे और जब वह उनसे मिलने जाते तो एक अलग कमरे में रहते थे और वही से बातचीत करते थे.

दानिश सिद्दीकी ने उत्तराखंड के भागलपुर में दूरदराज के इलाकों की यात्रा की, कोविड वार्डों में समय बिताया और खबरों की तलाश में वह हर कहीं गए, चाहे वह मुर्दाघर हो या फिर कब्रिस्तान.

उनके पिता कहा, ‘यह सब उसके लिए भी बहुत दर्दनाक था. कभी-कभी वह इस अनुभव को साझा करता था, लेकिन अगली सुबह वह फिर से नौकरी पर निकल जाता. उस समय वह इसका भावनात्मक रूप से बहुत गहरा असर पड़ा था. वह कहता था कि उसने कभी भी इस तरह की मानवीय पीड़ा नहीं देखी है. उसने उस समय कई ऐसी चीजें देखीं, जिनके बारे में बात करना मुश्किल था.’

बता दें कि दिवंगत फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी सहित चार भारतीयों को ‘फीचर फोटोग्राफी श्रेणी’ में प्रतिष्ठित पुलित्ज़र पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया गया है.

‘द पुलित्ज़र प्राइज़’ की वेबसाइट के अनुसार, समाचार एजेंसी ‘रॉयटर्स’ के फोटो पत्रकार सिद्दीकी और उनके सहयोगियों अदनान आबिदी, सना इरशाद मट्टू और अमित दवे को इस पुरस्कार से नवाजा गया है, जिसकी घोषणा सोमवार (नौ मई) को की गई. भारत में कोविड-19 से जुड़ीं तस्वीरों के लिए उन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

सिद्दीकी ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से परास्नातक की उपाधि प्राप्त की थी.

वहीं, ‘लॉस एंजिलिस टाइम्स’ के मार्कस याम को ‘ब्रेकिंग न्यूज़ फोटोग्राफी श्रेणी’ में पुरस्कार मिला. उन्होंने अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के लौटने से लोगों के जीवन पर पड़े असर को दर्शाने वाली तस्वीरें ली थीं.

द वॉशिंगटन पोस्ट’ ने अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में 6 जनवरी के हुए विद्रोह के कवरेज के लिए सार्वजनिक सेवा पत्रकारिता में पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त किया.

पुरस्कार समिति के अनुसार, अखबार ने ‘6 जनवरी, 2021 को वॉशिंगटन पर हमले के बारे में सम्मोहक रूप से बताया और बेहतरीन रूप से प्रस्तुत किया, जिससे जनता को देश के सबसे काले दिनों में से एक के बारे में पूरी तरह से समझ मिली.’

‘गेटी इमेजेज’ के विन मैकनेमी, ड्रू एंगरर, स्पेंसर प्लैट, सैमुअल कोरम और जॉन चेरी को भी ‘ब्रेकिंग न्यूज फोटोग्राफी श्रेणी’ में पुलित्ज़र पुरस्कार मिला. उन्होंने अमेरिकी संसद पर हमले से जुड़ी तस्वीरें ली थीं.

वर्ष 1912 में कोलंबिया विश्वविद्यालय ने विभिन्न श्रेणियों में पुलित्ज़र पुरस्कार प्रदान करने की योजना को मंजूरी दी. इसकी स्थापना हंगरी मूल के अमेरिकी फोटो पत्रकार जोसेफ पुलित्ज़र ने की थी. 1917 में पहली बार पुलित्ज़र पुरस्कार दिए गए थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)