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उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित

उत्तराखंड सरकार के एक आदेश में कहा गया है कि पांच सदस्यीय समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई करेंगी, जो वर्तमान में भारत के परिसीमन आयोग की प्रमुख हैं. अन्य सदस्यों में दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रमोद कोहली, सामाजिक कार्यकर्ता मनु गौर, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह और दून विश्वविद्यालय की कुलपति सुरेखा डंगवाल शामिल हैं.

पुष्कर सिंह धामी. (फोटो साभार: फेसबुक)

देहरादून: चुनाव पूर्व किए अपने वादे को निभाते हुए उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने शुक्रवार को प्रदेश में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने और राज्य में रहने वालों के लिए व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने वाले सभी प्रासंगिक कानूनों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर दी.

राज्य सरकार के एक आदेश में कहा गया है कि पांच सदस्यीय समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई करेंगी, जो वर्तमान में भारत के परिसीमन आयोग की प्रमुख हैं.

इस समिति के अन्य सदस्यों में दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रमोद कोहली, सामाजिक कार्यकर्ता मनु गौर, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह और दून विश्वविद्यालय की कुलपति सुरेखा डंगवाल शामिल हैं.

सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड में ‘समान नागरिक संहिता’ को लागू करने की दिशा में कदम उठाते हुए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन कर दिया गया है.

उन्होंने बताया कि पांच सदस्यीय उच्च समिति की अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई होंगी. धामी ने कहा, ‘देवभूमि की संस्कृति को संरक्षित करते हुए सभी धार्मिक समुदायों को एकरूपता प्रदान करने के लिए समान नागरिक संहिता के क्रियान्वयन हेतु विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है.’

राज्य के गृह विभाग के आदेश में कहा गया है, ‘राज्यपाल ने उत्तराखंड में रहने वाले लोगों के व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने वाले सभी प्रासंगिक कानूनों की जांच करने और वर्तमान कानूनों में संशोधन पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति स्थापित करने की अनुमति दी है.’

इससे पहले मार्च में नवगठित सरकार की पहली कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बनाने की घोषणा की थी.

समान नागरिक संहिता को सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने वाले कानूनों के एक समान समूह के रूप में संदर्भित किया जाता है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो.

बैठक के बाद घोषणा करते हुए धामी ने कहा था कि कैबिनेट ने इस मुद्दे पर जल्द से जल्द एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति के गठन को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी है.

उन्होंने कहा था, ‘हमारे संविधान निर्माताओं के सपने को पूरा करने और संविधान की भावना को मजबूत करने’ के लिए राज्य में समान नागरिक संहिता लाना भाजपा का एक प्रमुख चुनावी वादा था.’

फरवरी में उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव प्रचार के आखिरी दिन धामी ने समान नागरिक संहिता के मसौदे के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाने की घोषणा की थी. धामी ने कहा था कि अगर भाजपा सत्ता में आई तो प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करेगी.

धामी ने कहा था, ‘उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की सुरक्षा, इसके पर्यावरण की सुरक्षा और इसकी सीमाओं की सुरक्षा न केवल राज्य के लिए बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है. शपथ ग्रहण समारोह के तुरंत बाद भाजपा सरकार समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने के लिए कानूनी प्रणाली, सेवानिवृत्त कर्मचारियों, समाज के प्रमुख लोगों और अन्य हितधारकों की एक समिति बनाएगी.’

प्रदेश में दो तिहाई से अधिक बहुमत के साथ भाजपा के सत्ता में वापसी करने के बाद दोबारा मुख्यमंत्री बने धामी ने मंत्रिमंडल की पहली बैठक में ही समान नागरिक संहिता के लिए ड्राफ्ट तैयार करने ​हेतु एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्णय लिया था.

उन्होंने कहा था, ‘समान ना​गरिक संहिता संविधान की भावना को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम होगा. यह संविधान के अनुच्छेद 44 की दिशा में भी एक प्रभावी कदम होगा, जो देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता हासिल करने की बात करता है. शीर्ष अदालत ने भी समय-समय पर इसे लागू करने पर जोर दिया है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)