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पंजाब: 18 सालों में 6 ज़िलों के नौ हज़ार किसानों ने आत्महत्या की, 88 फीसदी क़र्ज़ में थे- अध्ययन

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा संगरूर, बठिंडा, लुधियाना, मनसा, मोगा और बरनाला ज़िलों के सभी गांवों में घर-घर जाकर किया गया सर्वे बताता है कि साल 2000 से 2018 के बीच आत्महत्या करने वालों में सीमांत और छोटे किसानों की संख्या अधिक है. इनमें से 75 फीसदी किसान 35 वर्ष से कम उम्र के थे.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

चंडीगढ़: इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के नवीनतम संस्करण में प्रकाशित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के एक अध्ययन से पता चला है कि पंजाब के छह जिलों में 2000 से 2018 के बीच 9,291 किसानों की आत्महत्या की. यह सर्वे संगरूर, बठिंडा, लुधियाना, मनसा, मोगा और बरनाला में हुआ.

अध्ययन में पाया गया कि आत्महत्या के इन मामलों में से 88 फीसदी में यह कदम उठाने का कारण किसानों पर भारी कर्ज होना था. ज्यादातर कर्ज गैर-संस्थागत स्रोतों से लिया गया था.

अध्ययन में कहा गया है कि ऐसे किसानों में मुख्य तौर पर सीमांत और छोटे किसान अधिक हैं. आत्महत्या करने वाले किसानों में 77 फीसदी के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन थी.

जमीनी अध्ययन से यह भी पता चला कि करीब 93 फीसदी प्रभावित परिवार ऐसे थे जहां आत्महत्या से एक मौत हुई थी. सात फीसदी परिवारों में दो या दो से अधिक मामले आत्महत्या के पाए गए. आत्महत्या के कुल मामलों में 92 फीसदी संख्या पुरुषों की थी.

अध्ययन के मुताबिक, कर्ज से जुड़े आत्महत्या के मामलों की संख्या 2015 में सबसे अधिक (515) थी. उस साल कपास की फसल खराब हो गई थी.

कपास बठिंडा, मनसा और बरनाला जिलों की प्रमुख व्यावसायिक फसल है, और साथ ही अमेरिकी कपास की उत्पादकता पिछले तीन दशकों में 2015 में सबसे कम (197 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) थी.

अध्ययन पीएयू के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र विभाग के तीन वरिष्ठ फैकल्टी सदस्यों- सुखपाल सिंह, मंजीत कौर और एचएस किंगरा ने किया था. उन्होंने इन छह जिलों के सभी गांवों में घर-घर जाकर सर्वे के माध्यम से मौतों की कुल संख्या का पता लगाया था.

जिन जिलों में सर्वे किया गया उनमें संगरूर, जो वर्तमान में आम आदमी पार्टी सरकार का मुख्य केंद्र है, में आत्महत्या से सबसे ज्यादा मामले (2506) देखे गए. उसके बाद मनसा (2,098), बठिंडा (1,956), बरनाला (1,126), मोगा (880) और लुधियाना (725) का नंबर आता है.

भारी कर्ज़ बना वजह

क्षेत्र में किसानों का कर्ज़ में डूबे रहने का इतिहास रहा है. 1920 के दशक की शुरुआत में, ब्रिटिश शोधकर्ता मैल्कॉम ल्याल डार्लिंग ने टिप्पणी की थी, ‘पंजाब का किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है और कर्ज में ही मर जाता है.’

यह समझने के लिए कि कैसे स्थायी बारहमासी कर्ज़ की समस्या घातक परिणामों की ओर ले जाती है, अध्ययन में पिछली शताब्दी के बदलते कृषि के स्वरूप का अध्ययन किया गया. राज्य में हरित क्रांति से पहले ऐसी खेती प्रचलन में थी जहां अपना भोजन उत्पादित करने के लिए खेती की जाती थी.

लेकिन 1960 के दशक के मध्य के बाद हरित क्रांति की रणनीतियों ने व्यावसायिक खेती शुरू की, जो बाजार से जुड़ी हुई थी. इसलिए खेती के लिए कर्ज लेने की जरूरत पड़ी, और ये कर्ज विशेष तौर पर निजी संस्थाओं द्वारा अत्यधिक ब्याज दर पर दिए गए, जिसने किसानों को कर्ज के जाल में धकेल दिया. इसके अलावा, नवउदारवाद की नीतियों ने कृषि में लाभ प्राप्ति को कम कर दिया.

इसी तरह, सामाजिक सेवाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा आदि) के निजीकरण ने किसान परिवारों के बजट को बिगाड़ दिया. यह स्थिति पूंजी की कमी वाले किसानों को आर्थिक तंगी की ओर ले गई.

आत्महत्या करने वाले 75 फीसदी किसान 35 वर्ष से कम उम्र के हैं

अध्ययन से पता चलता है कि आत्महत्या से मरने वाले किसानों में करीब 75 फीसदी 19 से 35 साल की उम्र के बीच के थे. वहीं, आत्महत्या से मरने वालों में लगभग 45 फीसदी अशिक्षित थे और 6 फीसदी हायर सेकेंडरी तक पढ़े थे.

अध्ययन के मुताबिक, आत्महत्या करने वाले पीड़ितों के परिवार अपनी सामाजिक असुरक्षा को लेकर गहरे भय में पाए गए. ऐसे परिवारों में से एक तिहाई ने अपने कमाने वाले मुख्य सदस्य को आत्महत्या के चलते खो दिया और उनके पास आजीविका का कोई जरिया नहीं बचा. अध्ययन में करीब 28 फीसदी परिवार अवसाद से घिरे पाए गए.

लगभग 13 फीसदी परिवारों को मौत के बाद अपनी जमीन बेचनी पड़ी जो कि उनकी आजीविका का एकमात्र साधन थी. 11 फीसदी परिवारों के बच्चों को अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी.

अध्ययन में पाया गया कि जिन परिवारों के सदस्यों की मौत कर्ज के बोझ तले हुई थी, उनसे समाज ने भी दूरी बना ली.

नीतिगत हस्तक्षेप

अध्ययन के अनुसार, पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा देने की व्यवस्था थकाऊ है.

मार्च 2013 में राज्य सरकार ने एक नीति तैयार की थी, जिसके अनुसार मौत के बाद पीड़ित के परिवार को एक निश्चित अवधि के भीतर 3 लाख रुपये का मुआवजा अन्य सहायता के साथ दिया जाना चाहिए. लेकिन, कई मामलों में ये परिवार पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, क्रेडिट रिकॉर्ड आदि जैसे जरूरी दस्तावेजों की कमी के चलते इस मुआवजे से वंचित रहे.

अध्ययन के अनुसार, उन सभी किसान परिवारों को मुआवजा देना आवश्यक है जिनमें किसी सदस्य की मौत की वजह आत्महत्या है क्योंकि वे सभी गंभीर आर्थिक संकट में होते हैं.

अध्ययन में इस पर भी प्रकाश डाला गया है ऋण निपटान (सेटलमेंट) पहुंच के बाहर होने के चलते भी कई किसान आत्महत्या के लिए प्रेरित हुए.

अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि संस्थागत ऋण, जो पीड़ितों के परिवारों द्वारा लिए गए कुल ऋण का करीब 43 फीसदी है, माफ किया जाना चाहिए.

अध्ययन में कहा गया है कि गैर-संस्थागत स्रोतों द्वारा दिए गए ऋणों का निपटान करने के लिए, गैर-संस्थागत ऋण को संस्थागत ऋण में परिवर्तित करने के लिए ‘उधारकर्ताओं का ऋण अदला-बदली योजना’ को प्रभावी बनाया जाना चाहिए.

इसके अलावा, अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि कृषि ऋण पर ब्याज दर को कम किया जाए और गैर-संस्थागत ऋण एजेंसियों के कार्यों और गतिविधियों को विनियमित किया जाए और उन पर निगरानी रखी जाए.

साथ ही, किसानों की उपज का भुगतान सीधे किसानों को किया जाना चाहिए, न कि कमीशन एजेंटों को, ताकि किसान कमीशन एजेंटों या साहूकारों के बंधन से बाहर आएं.

अध्ययन में दिया गया तीसरा सुझाव है कि फसल खराब होने पर मुआवजा दिया जाना चाहिए. दीर्घकालिक समाधान के लिए उत्पादन और विपणन/व्यापार के जोखिमों को कम करके कृषि लाभप्रदता को बढ़ाया जाना चाहिए.

अध्ययन के अनुसार, अगली समस्या कृषि में उपयोग होने वाले भारी कृषि यंत्रों से संबंधित है, जिसने किसानों को और अधिक कर्ज में धकेल दिया है. कई छोटे किसान ट्रैक्टर खरीदने के लिए कर्ज लेते हैं. यह कदम आर्थिक रूप से अव्यवहारिक साबित हुआ है.

पंजाब में, राज्य के लगभग चौथाई किसान ट्रैक्टर के मालिक हैं, जो उनकी खेती को उच्च लागत और अन्य कारणों से अव्यवहारिक बना देता है. इसलिए हर गांव में सहकारी आधार पर कृषि मशीनरी सेवा केंद्र स्थापित करने की जरूरत है. इनमें छोटे किसानों को मशीनें किराए पर लेने में प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

अध्ययन में सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों को मजबूत करने की भी बात कही गई है, ताकि आम लोगों को और विशेष तौर पर संकटग्रस्त परिवारों को प्रभावी और कुशल सेवाएं मुफ्त मिल सकें.

 नई सरकार पर नज़र

पंजाब चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी (आप) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने दावा किया था कि अगर पंजाब में उनकी पार्टी सरकार बनाती है तो वह किसानों के बीच आत्महत्या से होने वाली मौतों को रोक देगी.

उनकी पार्टी ‘आप’ के सत्ता में आने के बाद से दो महीनों में दो दर्जन किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारिंग समेत विपक्ष ने इसको लेकर भगवंत सरकार की आलोचना की है कि वह अपना वादा नहीं निभा रही है.

आम आदमी पार्टी के पंजाब प्रवक्ता मलविंदर सिंह कांग ने द वायर से कहा कि भगवंत मान सरकार पंजाब में किसानी को फायदे का सौदा बनाने और किसानों को कर्ज से बाहर निकालने के लिए पर्याप्त कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है.

उन्होंने आगे कहा कि नतीजे जल्द ही दिखाई देने लगेंगे.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)