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पूर्व भाजपा सांसद ने सुप्रीम कोर्ट में पूजा स्थल अधिनियम की कुछ धाराओं की वैधता को चुनौती दी

मध्य प्रदेश के उज्जैन निवासी भाजपा के पूर्व सासंद चिंतामणि मालवीय ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 2, 3 और 4 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए दावा किया गया है कि ये धाराएं धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं. उन्होंने कहा है इन धाराओं के माध्यम से बर्बर आक्रांताओं द्वारा अवैध रूप से बनाए गए ‘पूजा स्थलों’ को मान्य करने का प्रयास किया गया है.

New Delhi: A view of the Supreme Court of India in New Delhi, Monday, Nov 12, 2018. (PTI Photo/ Manvender Vashist) (PTI11_12_2018_000066B)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक पूर्व सांसद ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की कुछ धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.

पूर्व सांसद चिंतामणि मालवीय द्वारा दायर याचिका में 1991 के इस अधिनियम की धारा 2, 3 और 4 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए दावा किया गया है कि ये धाराएं धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं.

मध्य प्रदेश के उज्जैन निवासी मालवीय ने दलील दी कि अधिनियम कई कारणों से निष्प्रभावी और असंवैधानिक है.

याचिकाकर्ता ने अदालत से 1991 के अधिनियम की धारा 2, 3, 4 को निष्प्रभावी और असंवैधानिक घोषित करने के निर्देश देने की मांग की है, क्योंकि इन धाराओं के प्रावधान मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.

उन्होंने कहा है इन धाराओं के माध्यम से बर्बर आक्रांताओं द्वारा अवैध रूप से बनाए गए ‘पूजा स्थलों’ को मान्य करने का प्रयास किया गया है.

याचिका में दावा किया गया है कि कानून के प्रावधानों ने न केवल समानता, गैर-भेदभाव और धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है, बल्कि धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का भी उल्लंघन किया है, जो संविधान की प्रस्तावना और मूल संरचना का एक अभिन्न हिस्सा है.

इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाले भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर एक याचिका सहित कई अन्य याचिकाएं शीर्ष अदालत में पहले ही दायर की जा चुकी हैं.

जून 2020 में लखनऊ स्थित विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ ने सुप्रीम कोर्ट का रुख कर इस एक्ट को चुनौती दी थी. कुछ दिनों बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी अदालत का रुख कर कहा था कि इस मामले में नोटिस जारी होने से पूजा स्थलों के संदर्भ में मुस्लिम समुदाय के मन में भय पैदा होगा, विशेष रूप से अयोध्या विवाद के बाद से और इससे देश का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना भी नष्ट होगा.

हाल ही में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर कर एक लंबित याचिका में हस्तक्षेप करने की मांग की है, जिसमें 1991 के अधिनियम की धारा 2, 3 और 4 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)