दुनिया

जानबूझकर फैलाई जा रहीं फ़र्ज़ी ख़बरों से मीडिया के प्रति विश्वास घटता है: पत्रकार मारिया रेसा

साक्षात्कार: हाल ही में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित फिलीपींस की पत्रकार मारिया रेसा की वेबसाइट रैपलर को वहां की सरकार ने बंद करने का आदेश दिया है. द वायर की सीनियर एडिटर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी से बातचीत में मारिया ने कहा कि पत्रकारों को लोगों को यह बताने की ज़रूरत है कि अगर वे आज अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ते हैं, तो वे इन्हें हमेशा के लिए गंवा देंगे.

मारिया रेसा और आरफ़ा ख़ानम शेरवानी. (फोटो: द वायर)

होनोलुलु: किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जिसकी न्यूज वेबसाइट को बंद करने का आदेश कुछ घंटे पहले ही दिया गया हो, रैपलर की सीईओ मारिया रेसा भविष्य को लेकर उल्लेखनीय ढंग से प्रसन्नचित्त नजर आईं.

ईस्ट-वेस्ट सेंटर में जीरो ट्रस्ट वर्ल्ड में मीडिया के सामने दरपेश चुनौतियों पर दिए गए अपने भाषण में रेसा ने कहा कि वे और उनके साथी फिलिपींस सरकार द्वारा स्वतंत्र मीडिया के खिलाफ छेड़े गए युद्ध में इस अंजाम के लिए तैयार थे और वे अपना काम जारी रखेंगे.

‘अगर आप ऐसे देश में रहते हैं, जहां कानून के शासन को इस सीमा तक मोड़ दिया गया है, कि यह टूट गया है, कुछ भी मुमकिन है…इसलिए आपको तैयार रहना चाहिए.’

रेसा 2021 नोबेल शांति पुरस्कार की संयुक्त विजेता थीं. उन्हें यह पुरस्कार प्रेस की आजादी की रक्षा में उनके योगदान के लिए दिया गया था.

रेसा का कहना है कि यह आजादी अब कई देशों में सत्ताधारियों द्वारा बढ़ावा दिए जा रहे दुष्प्रचार के चलते खतरे में है. उन्होंने मर्ज की पहचान कर ली है- सोशल मीडिया का एल्गोरिदम ‘क्रोध और घृणा से लपेटे हुए झूठ को तथ्य की तुलना में ज्यादा तेजी और दूर तक प्रसारित होने’ में मदद करता है. यह बात आसानी से भारत पर भी लागू हो सकती है. साथ ही साथ इसके काम करने का वह तरीका भी, जो सर्वाधिकारवादी [totalitarian] नेताओं की खासियत है- नीचे से ऊपर तक लगातार बढ़ते हमले और उसके बाद ऊपर से नीचे तक वार.

उन्होंने यह सवाल करते हुए कि एक फासीवादी दुनिया में दाखिल होने में अभी कितना समय बचा है, कहा कि पत्रकारों को इस विकट स्थिति में भी कर्तव्य पथ पर डटे रहना होगा.

इस सम्मेलन में शिरकत कर रहे पत्रकारों से संवाद के दौरान रेसा ने द वायर  का उल्लेख करते हुए कहा कि वायर इस बात का उदाहरण है कि एक शत्रुतापूर्ण माहौल में मीडिया को किस तरह से काम करना चाहिए. वास्तव में उन्होंने अपने की-नोट (बीज वक्तव्य) की शुरुआत एक सवाल से की, जिसका उत्तर वे किसी भारतीय से चाहती थीं: ‘आप क्या करेंगे, अगर सरकार आपको बंद करने का आदेश देती है.’

मैंने जवाब दिया कि यह एक वास्तविक संभावना है, खासकर यह देखते हुए कि यूट्यूब खुशी-खुशी सरकार के सामग्री को हटाने के आदेश को लागू कर रहा है. मैंने कहा कि एक ऑडियो-विजुअल पत्रकार के नाते मुझे दशर्कों तक पहुंचने के लिए दूसरे रास्तों की तलाश करनी होगी और इनमें से एक यह होगा कि ट्रक पर सवार होकर हाथ में माइक लेकर लोगों के बीच जाया जाए और उन तक उन चीजों की रिपोर्टिंग की जाए, उनसे वह कहा जाए, जो मैं यूट्यूब पर कहती.

उनके सवाल का संदर्भ निश्चित तौर पर सिर्फ काल्पनिक नहीं था: उन्हें कुछ घंटे पहले ही रैपलर को बंद करने के आदेश के बारे में पता चला था. लेकिन इस सम्मलेन में शिरकत कर रहे दुनिया भर के 300 पत्रकारों को उनका संदेश साफ था: आपको सबसे बुरी स्थितियों के लिए तैयार रहना होगा, आपको अपनी सबसे बुरी स्थितियों का पूर्वाभ्यास करना होगा, आपको इसे अपनी याददाशत में जज्ब करना होगा… आपमें स्पष्टता, फुर्ती, संयम का होना जरूरी है, आपको खुद में बदलाव लाते हुए बचे रहना होगा.’

अपने भाषण के बाद उन्होंने दुष्प्रचार, मीडिया में विश्वास की कमी जैसी समस्याओं- और निश्चित तौर पर भारत में पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर बढ़ रहे हमलों पर द वायर  से बात करने के लिए 10 मिनट का समय निकाला.

रेसा ने कहा कि सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ और फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर की गिरफ्तारी ‘दुखद’ है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हर किसी को इसके बारे में बात करनी चाहिए, हर किसी को इसके बारे में लिखना चाहिए. इसे ज्यादा सुर्खियों में जगह मिलनी चाहिए.’

अपने जेल के अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्हें गिरफ्तार किया गया, ‘लोग सामने से लड़ाई के मैदान में नहीं आना चाहते हैं … इसका एक कारण उनके अपने हित हैं..’ लेकिन उन्होंने कहा, ‘आपको सबको साथ लाना होगा, सबको खींचकर एक जगह करना होगा.’

झूठी सूचनाओं के प्रसार और लोकतंत्र पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में पूछे जाने पर रेसा ने इसे सूचनाओं के सैलाब की समस्या के तौर पर देखा. ‘मुझे लगता है कि लोगों के सामने (सूचनाओं) की बाढ़ की स्थिति है. सोशल मीडिया ने एक सीमा तक यह काम करने का काम किया है. अतीत में आपको सूचनाएं कहां से मिलती थीं? समाचार संस्थानों से, जिन्हें वास्तव में संपादकीय प्रक्रियाओं और वितरण के लिए पैसे खर्च करने पड़ते थे.

उन्होंने जोड़ा, ‘आज यह वास्तव में झूठ के जंगल की तरह है… तो जब आपके सामने यह स्थिति है… साधारण लोग, जिनकी नौकरी चली गई हो, जो और कुछ नहीं बस एक आसान दुनिया चाहते हैं, जहां कोई और उनके बदले में उनके फैसले ले सके… हम यह होता हुआ देख रहे हैं. मेरा मतलब है. भारत पहला देश था, इंडोनेशिया दूसरा… 2014 के आसपास, एक मजबूत नेता के लिए एक प्रकार की तड़प थी और इंडोनेशिया में सुहार्तो [इंडोनेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री] के दामाद प्रबोवो [ सुबियांतो जोजोहादिकुसुमो, रक्षा मंत्री] बस जीतते-जीतते रह गए.. यही समय था, जब 2014 में मोदी जीतकर आए.’

रेसा ने इस बात पर जोर दिया कि मीडिया संस्थानों को अपने पाठकों और दर्शकों के समुदाय के साथ मजबूत संबंध रखना चाहिए.

उन्होंने जोड़ा, ‘हमें समुदायों को यह कहने की जरूरत है कि अगर आप अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ते हैं, तो आप इसे गंवा देंगे. अगर लोग संघर्ष करते हैं, तो यह पत्रकारों के काम को आसान बना देता है.’

उनसे हुई बातचीत का संपादित अंश नीचे पढ़ा जा सकता है.

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आरफ़ा: मारिया एक फिलिपिनो-अमेरिकी पत्रकार एवं लेखिका और रैपलर की सह-संस्थापक एवं सीईओ हैं. उन्होंने अपने की-नोट को समाप्त किया है और मैं अब उनसे लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी और वर्तमान समय का सामना पत्रकार कैसे कर सकता है, खासकर भारत के संदर्भ में- जिस तरह से पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं, जिस तरह से मानवाधिकार रक्षकों पर हमले हो रहे हैं, और हम इस बारे में क्या कर सकते हैं.

मारिया, मेरा सबसे पहला सवाल है कि आपको विश्वास की कमी की स्थिति क्यों लगती है? क्या इसके पीछे दो सालों की कोविड महामारी का भी हाथ मानती हैं, जिसमें हम एक एक तरह के अलग-थलग विश्व में रह रहे थे? क्या लगता है कि इसने इस विश्वास में कमी को और गहराने का काम किया.

मारिया: हां, क्या यह कहा जा सकता है कि कोविड का भी वास्तव में सूचना की ही भांति शस्त्रीकरण किया गया.. यह भी एक कारण है कि आप लोगों को मास्क पहने हुए देखते हैं या चिंता का स्तर देखते हैं…. कोविड ने वास्तव में पहले से मौजूद समस्या को और बढ़ाने का काम किया.

हम लोग जबरदस्त सूचना अभियानों (इंफॉर्मेशन ऑपरेशंस) का सामना कर रहे हैं और यह इसकी बस शुरुआत है. मुझे लगता है कि लोग यह सोचते हैं कि… उन पर बिना किसी योजना के अनायास हमला हो जाता है. लेकिन ऐसा नहीं है. यह निशाना लगाकर किया जाने वाला हमला है. और इसका मकसद विध्वंस करना होता है.

मेरे ख्याल से आपको यूनेस्को के बिग डेटा केस स्टडी का पता होगा. यह काफी सूचनाप्रद था. (सूचनाओं के) 60 फीसदी का मकसद प्रतिष्ठा की धज्जियां उड़ाना, 40 प्रतिशत का मकसद आपके जज्बे को ख़त्म करना होता है. ऐसे में कह सकते हैं कि कोविड ने एक और परत जोड़ने का काम किया और यह मैं कहूंगी कि यह एक कारण है, जैसे कि यह सौ सालों में आने वाला क्षण है. [अमेरिकी राष्ट्रपति के चीफ मेडिकल एडवाइजर] एंथनी फाउची ने कहा कि यह कोविड के कारण सौ साल में एक बार आने वाला क्षण है, लेकिन राजनीतिक दुष्प्रचार के उसी नेटवर्क का इस्तेमाल कोविड दुष्प्रचार के लिए किया गया न!

सूचनाओं के युद्ध से इसका वास्तव में आपसी रिश्ता है.

आपको क्या लगता है कि लोग तानाशाहों की बातों पर यकीन करने के लिए आतुर क्यों हैं? उस बात पर जो आज्ञापालक मीडिया उनसे विश्वास करने के लिए कहा रहा है. क्या आपको लगता है, लोगों ने अपनी तरह से सोचना बंद कर दिया है. क्या हम इन सभी चीजों का आरोप लोगों पर लगा सकते हैं या आपको लगता है कि वे (तानाशाह) सोशल मीडिया और अपने अनुगामी मीडिया के सहारे उनकी सोच पर कब्जा करने में सफल हो गए हैं.

यह सोच की बात उतनी नहीं हैं… मुझे लगता है कि लोग [सूचनाओं की] बाढ़ में डूबे हुए हैं. और कुछ अंशों में सोशल मीडिया का किया-धरा है. अतीत में आपको सूचनाएं कहां से मिलतीं? न्यूज संस्थानों से जिन्हें वास्तव में संपादकीय प्रक्रियाओं और वितरण के लिए पैसे खर्च करने होते हैं.

आज यह वास्तव में झूठ उगलने वाली नली की तरह है… तो जब आपके सामने यह स्थिति है….साधारण लोग, जिनकी नौकरी चली गई हो, जो और कुछ नहीं बस एक आसान दुनिया चाहते हैं, जहां कोई और उनके बदले में उनके फैसले ले सके…हम यह होता हुआ देख रहे हैं. मेरा मतलब है. भारत पहला देश था, इंडोनेशिया दूसरा…2014 के आसपास, एक मजबूत नेता के लिए एक प्रकार की तड़प थी और इंडोनेशिया में सुहार्तो [इंडोनेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री] के दामाद प्रबोवो [सुबियांतो जोजोहादिकुसुमो, रक्षा मंत्री] बस जीतते-जीतते रह गए.. यही समय था, जब 2014 में मोदी जीतकर आए.

तो इस तरह से देखें, तो यह मानव स्वभाव का मिश्रण है. मुझे लगता है कि हमें अपने समुदायों को यह बताने की जरूरत है कि अगर आप अपने अधिकारों के लिए आज नहीं लड़ते हैं, तो आप इसे गंवा देंगे. और (अगर वे ये लड़ाई लड़ेंगे, तो) वैसे पत्रकार जो लड़ाई जारी रखना चाहते हैं, उनके लिए चीजें थोड़ी आसान हो जाएंगी.

आपने एक बेहद दिलचस्प बात कही कि अगर यह तथ्यों के लिए जंग लड़ी जा रही है- अगर लोगों के दिमाग और तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है- तब आप पूरी चुनावी प्रक्रिया और चुनावी प्रणाली पर कैसे यकीन कर सकते हैं…

आप नहीं कर सकते हैं.

हमारे देश में चुनाव आम चुनाव होने में दो साल से भी कम का समय है और हम अभी से ही चुनावी मुद्रा में आ गए हैं. आपको क्या लगता है कि तथ्यों और मुख्यधारा के मीडिया की यह तथ्यों से छेड़छाड़ लोकतंत्रों को किस तरह से प्रभावित कर रही है?

यह इसकी हत्या कर रहा है, यह लोकतंत्र की हत्या कर रहा है और फिर उन लोगों की जो सत्ता के सामने खड़े होने की भरसक कोशिश कर रहे हैं. कह सकते हैं, यह सिसिफस और कासांद्रा के मेल के समान है. यह एक असंभव जैसी जंग है, लेकिन हम पत्रकार लोग कोशिश करने से बाज कहां आने वाले हैं. इसलिए आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं. मेरा मतलब है कि यही वजह है कि हमें साहस की जरूरत है.

मीडिया की भूमिका पर वापस लौटते हैं. रैपलर की ही तरह द वायर एक छोटा संस्थान है. हम नॉन-प्रॉफिट हैं और हम बस लोगों की मदद और समर्थन से चल रहे हैं.

आपका समुदाय.

क्या आपको लगता है कि क्या इस तरह का मॉडल वास्तव में तानाशाहों को चुनौती दे सकता है, क्योंकि हम कहीं नहीं हैं. मेरे कहने का मतलब है कि, निश्चित तौर पर हम वहां हैं और लोगों में ज्यादा जानने की, हमें सुनने और हमें पढ़ने की एक इच्छा है. हमें देखने और पढ़ने वालों की एक बड़ी संख्या है. लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि हम मेनस्ट्रीम मीडिया के आकार और उसकी पहुंच से कोई मुकाबला नहीं कर सकते हैं.

यही कारण है कि हम… साथ ही आप जानती हैं, सोशल मीडिया… इन टेक प्लेटफॉर्मों, इन्होंने इसे मुमकिन बनाया है. लेकिन एक कारण जिसके कारण मैं- हम दो फिलिपिनो फैक्ट चेकिंग फैक्ट चेकिंग पार्टनरों में से एक हैं- इसमें अभी भी लगी हुई हूं, क्योंकि उनमें अभी कुछ करने की शक्ति अभी है और मुझे लगता है कि हमें और बेहतर तरीके से साथ आने और ज्यादा सुरक्षा की मांग करने की जरूरत है.

आप ऐसा कैसे करती हैं?

मुझे नहीं पता. चलिए इसका पता लगाते हैं.

कौन-से नए मॉडलों का विचार आपके मन में आता है?

यह एक ऐसी चीज है, जिसे हमने बस तीन महीने में किया, जो काफी ज्यादा कम समय था. हमने जो किया वह एक छह महीने का प्रोजेक्ट था. लेकिन फिर से, इस आरआईएसजे की तरह, मेरे हिसाब से रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट हमारी विश्वसनीयता, जिसकी हमें जरूरत है, को काफी ठेस पहुंचाने वाली थी.

खैर, हम यह कैसे करते हैं? यह काफी मजेदार पहलू है. ठीक है, मुझे इस मजेदार पहलू के साथ समाप्त करना चाहिए था. यह काफी डरावना है, लेकिन यह एक निर्माण भी है, इसलिए इस पक्ष पर हमें अपने दिमाग, अपनी प्रतिभा, अपनी साझेदारियों को साथ लाना चाहिए और कुछ ऐसी चीज का निर्माण करने की कोशिश करनी चाहिए, जिसका अभी तक वजूद ही नहीं है. हम ऐसा कैसे करते हैं?

नवाचार (इनोवेशन)?

यह कुछ अंशों में इनोवेटिव है, लेकिन निश्चित तौर पर, मुझे लगता है कि यह लोगों से आएगा, यह हम सबके प्रभाव क्षेत्र और एक साथ आने से होगा. हम फेसबुक पर निश्चित तौर पर एक साथ जा सकते थे …. है न! मेरा मतलब है कि यह साझेदारी का एक भाग है, .. यूट्यूब दूसरा है. मुझे नहीं मालूम कि यह बात आपको पता है, हमारे लिए अब यूट्यूब अब पहले नंबर पर है.

भारत में अभी यूट्यूब एक समस्या है. जैसा कि मैं सिर्फ यूट्यूब पर हूं, क्योंकि टीवी को सत्ता द्वारा खरीद लिया गया है.

हां, लगभग पूरी तरह से…

तो अब वे यूट्यूब पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं, जो एकमात्र उपलब्ध माध्यम है और यूट्यूब ने खुशी-खुशी घुटने टेक दिए हैं और सरकार की मांगों के हिसाब से काम रहा है.

हां, तो यह एक वह स्टोरी है, जो हम सबको करनी चाहिए और सच कहूं, तो हम इस बात को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं, क्योंकि यह एक अहम सूचना है. इस तरह से देखें, तो मुझे लगता है कि हमारे बीच में काफी कुछ साझा है. यह दूसरा पहलू, मैं सोचती हूं कि हमें इसे मजबूत करना चाहिए.

आपने इस तथ्य पर जोर दिया कि ऑनलाइन हमला एक ऑफलाइन हमला है- आपने कहा कि यह एक वास्तविक जगत का हमला (रियल वर्ल्ड अटैक) है. भारत के मौजूदा सूरते-हाल में यह पहले ही ऑनलाइन से ऑफलाइन की ओर रुख कर चुका है.

कानून को हथियार बनाना!

एक राजनीतिक पत्रकार के तौर मैं जेल जाने से बस एक ट्वीट या एक एक लेख की दूरी पर हूं. यह वास्तविकता है. आपको क्या लगता है कि मुझ जैसे लोगों और मेरे संस्थान को इतने दबाव में किस तरह से काम करना चाहिए. मसलन जब आपके काम का खामियाजा आपको वास्तविक जीवन में भुगतने की नौबत आ रही हो?

तो, पहली बात यह है कि आपकों वकीलों की जरूरत है, जो आपकी इन स्थितियों में मदद करेंगे. आपको अपने समुदाय को यह बताने की जरूरत है कि क्या हो रहा है? आपको यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि आप सुरक्षित हैं. मसलन, प्लान ए के साथ ही प्लान बी और प्लान सी भी होना चाहिए. और आपको इसका आकलन लगभग रोज के रोज करना चाहिए और साथ ही साथ आपको सरकार तक भी पहुंचना चाहिए.

सरकार तक पहुंचना, जैसे किस तरह?

आपको उनसे बात करने और रास्ता निकालने की जरूरत है… मेरे हिसाब से यह हितधारकों वाला मामला है. क्योंकि जैसा कि मेरे लिए, उदाहरण के लिए हम मारकोस को लें…यह मारकोस प्रशासन के बारे में क्या बताता है? मैं अभी तक इसे तय नहीं कर पाई हूं. अगर मैं मारकोस प्रशासन को संदेह का लाभ (बेनेफिट ऑफ डाउट) देती हूं, तो क्या मैं बेवकूफ हूं? कुछ लोग कहेंगे, हां. मैं उम्मीद करती हूं, वे मुझे जेल में नहीं डालेंगे. लेकिन जैसा कि मैंने कहा, आपको उनसे संवाद करना होगा, ताकि…. आपके पास भी शक्ति है, और साथ मिलकर तो शक्ति है ही.

आखिरी दो सवाल. एक महिला पत्रकारों को लेकर है. क्या आपके पास उनके लिए खास संदेश है, क्योंकि आप जानती हैं कि उनको उनके लिंग के चलते निशाना बनाया जाता है, वैसे भी सामान्य तौर पर उन्हें उनके काम के लिए निशाना बनाया जाता है. हम एक हाशिये पर खड़े समुदाय हैं और फिर यह दबाव है, जो हम पर पड़ता है. कभी-कभी अपने तरह से काम करना असंभव हो जाता है.

हां, हमें इनका सामना करना पड़ता है. अब ऐसे समूह हैं, जो हमारी मदद कर रहे हैं. और इसके लिए हमें साथ आने की जरूरत है. आप अकेली नहीं हैं. ठीक है न? यह पहला संदेश है. आप अकेली नहीं हैं. ऐसे कई लोग हैं, जो इस तरह महसूस कर रही हैं, और इससे लड़ने का एक तरीका है. लेकिन ज्यादातर समय में सिर्फ आप ही यह लड़ाई अकेली नहीं लड़ रही होती हैं. क्योंकि कोई भी पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता या विपक्षी राजनीतिज्ञ, महिला राजनेता सब पर हमले हो रहे हैं. वे यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ सकते हैं. और यही कारण है कि हम मेरे तीन स्तंभों की तरफ देखते हैं- टेक्नोलॉजी, पत्रकारिता और समुदाय.

मैं हमेशा परेटो के सिद्धांत पर वापस जाती हूं. ‘मैं अपना सबसे ज्यादा समय कहां बिताती हूं. अगर हम ऐसी तकनीक की खोज कर सकते हैं, जो लगातार आ रहे जहर, झूठ के वायरस को नियंत्रण में रखे, तब हम पुननिर्माण की शुरुआत कर सकते हैं.

आखिरी सवाल. भारत में दो काफी महत्वपूर्ण लोग हैं. एक हैं तीस्ता सीतलवाड़ जो एक प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने 2002 के गुजरात दंगा पीड़ितों के साथ काम किया…

हां, मैंने यह देखा.

…जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. और दूसरे एक अग्रणी फैक्टचेकर हैं…

मैंने देखा.

अभी ये दोनों जेल में हैं. इस बारे में आपको क्या कहना है?

यह बेहद दुखद है… भारतीय पत्रकार, और आप इस बात को समझेंगी… आप इन चीजों को जानती हैं… मैं अपने अनुभव से कहूंगी… जब मुझे गिरफ्तार किया गया… पत्रकार लोग… लोग सामने नहीं आना चाहते हैं. यह कुछ हद तक अपने हित के लिए होता है. लेकिन आप सभी को एकजुट कैसे कर सकती हैं. आपको सबसे बात करनी होती है. आप लोगों को एक साथ लाते हैं. यही वह मोर्चा है, जहां सामाजिक कार्यकर्ता पत्रकारों से बेहतर होते हैं. हम लोग इस मोर्चे पर खराब हैं. ‘क्योंकि हमें लगता है कि स्टोरी को ही कहानी कहनी चाहिए. ठीक कहा न! लेकिन यह बेहद दुखद है और इसे ज्यादा सुर्खियों में जगह मिलनी चाहिए.

(अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)