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एल्गार परिषद मामला: अदालत ने ईडी को आरोपी सुरेंद्र गाडलिंग से पूछताछ की अनुमति दी

प्रवर्तन निदेशालय ने एल्गार परिषद मामले में जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ता सुरेंद्र गाडलिंग पर प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की गतिविधियां संचालित करने के लिए धन जुटाने का आरोप लगाया है. मुंबई की एक विशेष अदालत ने ईडी को तलोजा जेल में बंद गाडलिंग का बयान 17 से 19 अगस्त तक दर्ज करने की अनुमति दे दी है.

सुरेंद्र गाडलिंग (फोटो साभारः फेसबुक)

मुंबई: मुंबई की एक विशेष अदालत ने बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को एल्गार परिषद-माओवादी संपर्क मामले के एक आरोपी वकील सुरेंद्र गाडलिंग का कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बयान दर्ज करने की अनुमति दे दी.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के मामलों के विशेष न्यायाधीश राजेश जे. कटारिया ने कहा कि यदि अपराध से धन प्राप्त हुआ है तो यह जांच का विषय है और चूंकि शिकायत दर्ज कर ली गई है, गाडलिंग का बयान दर्ज किया जा सकता है.

गाडलिंग एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तारी के बाद 2018 से न्यायिक हिरासत में हैं.

ईडी ने एल्गार परिषद मामले में एनआईए द्वारा दर्ज की गई पहली सूचना रिपोर्ट के आधार पर पिछले साल मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामला दर्ज किया था.

ईडी ने अदालत को बताया कि गाडलिंग मामले में मुख्य आरोपी हैं और वह उनका बयान दर्ज करना चाहती है.

केंद्रीय जांच एजेंसी ने दावा किया कि गाडलिंग भाकपा (माओवादी) के सक्रिय सदस्य थे और उन्हें प्रतिबंधित संगठन के लिए धन जुटाने और धन के वितरण में शामिल होने का संदेह था.

याचिका का विरोध करते हुए गाडलिंग ने दावा किया कि एजेंसी उन्हें एक और मामले में ‘दुर्भावनापूर्ण और गुप्त एजेंडे’ के तहत फंसाना चाहती है. उन्होंने कहा कि इसके आरोप ‘बिल्कुल निराधार’ हैं.

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने ईडी को स्थानीय तलोजा जेल में बंद गाडलिंग का बयान 17 से 19 अगस्त तक दर्ज करने की अनुमति दे दी.

एजेंसी ने बीते जुलाई महीने में अदालत के समक्ष दायर अपनी याचिका में कहा था कि गाडलिंग प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की ‘गतिविधियां व्यवस्थित करने और चलाने’ के लिए धन प्राप्त करते थे.

आवेदन में ईडी ने दावा किया था कि गाडलिंग ने कथित तौर पर 31 दिसंबर 2017 को शनिवारवाड़ा में एल्गार परिषद आयोजित करने में भागीदारी निभाई थी. आरोप है कि एल्गार परिषद की गतिविधि नक्सल मोर्चा थी और शहरी क्षेत्र में विचारधारा का प्रसार करने के इरादे से आयोजित की गई थी.

गाडलिंग और अन्य 15 कार्यकर्ताओं पर ‘अर्बन नक्सल’ (शहरी नक्सली) होने का आरोप लगाया गया है, जो प्रतिबंधित संगठन की विचारधारा को शहरी युवाओं के बीच फैलाने की कोशिश कर रहे थे और उन्हें खुद से जोड़ भी लिया.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, इसमें कहा गया कि अपनी नियमित गतिविधियों को अंजाम देने के लिए आरोपियों ने अपने परिवार के सदस्यों के नाम से खोले गए विभिन्न बैंक खातों में धन प्राप्त किया था और गाडलिंग मुख्य संदिग्ध हैं.

गाडलिंग ने अपने जवाब में कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत अपराध नहीं बनते. गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की कुछ धाराओं को लागू करने मात्र से ही पीएमएलए के प्रावधान लागू नहीं हो जाते, न ही यह प्रवर्तन निदेशालय को अपने अधिकार का प्रयोग करने की शक्ति देता है.

उन्होंने तर्क दिया कि लगभग चार वर्षों तक मामले की जांच करने वाली एनआईए ने उनसे धन जब्त किए जाने का कोई उल्लेख नहीं किया है. अगर विधेय अपराध में फंडिंग के आरोपों का कोई जिक्र नहीं है, तो ईडी मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच कैसे कर रहा है?

ईडी की ओर से पेश हुए विशेष अभियोजक सुनील गोंजाल्विस ने कहा कि एनआईए की जांच अपराध तक सीमित थी और ईडी का काम अपराध से परे देखना और मनी ट्रेल का पता लगाना था.

उन्होंने कहा, ‘हम उसकी हिरासत की मांग नहीं कर रहे हैं. हम सिर्फ उसका बयान दर्ज करना चाहते हैं, क्योंकि हम अपराध की पूरी आय का पता लगाना चाहते हैं.’

गाडलिंग और कई अन्य कार्यकर्ताओं को एल्गार परिषद हिंसा मामले में गिरफ्तार किया गया है.

बता दें कि कई स्वतंत्र जांच इन दावों पर गंभीर सवाल उठा चुकी हैं और गिरफ्तार आरोपियों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से संभावित छेड़छाड़ की ओर इशारा कर चुकी हैं.

कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ मिलकर द वायर  द्वारा किए गए पेगासस प्रोजेक्ट ने भी इस ओर इशारा किया था कि गाडलिंग की पत्नी मीनल, उनके सहयोगी वकील निहाल सिंह राठौड़ और जगदीश मेश्राम के फोन पर संभावित मैलवेयर का हमला हुआ था.

मैसाच्युसेट्स स्थित डिजिटल फॉरेंसिक फर्म आर्सेनल कंसल्टिंग द्वारा की गई एक अन्य स्वतंत्र जांच में पाया गया था कि गाडलिंग के कंप्यूटर पर हमला किया गया था और उसमें उन्हें फंसाने वाले दस्तावेज डाले गए थे.

गौरतलब है कि यह मामला 31 दिसंबर 2017 में पुणे में आयोजित एल्गार परिषद के कार्यक्रम में कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने से जुड़ा है. पुणे पुलिस का दावा है कि इस भाषण की वजह से अगले दिन कोरेगांव-भीमा में हिंसा फैली और इस कार्यक्रम का आयोजन करने वाले लोगों के माओवादियों से संबंध हैं.

मामले की जांच बाद में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) को सौंप दी गई थी.

मामले में केवल एक आरोपी वकील और अधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. बीते 10 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने मामले के एक अन्य आरोपी तेलुगू कवि और कार्यकर्ता वरवरा राव को मेडिकल आधार पर स्थायी जमानत दे दी थी. 13 अन्य अभी भी महाराष्ट्र की जेलों में बंद हैं.

फादर स्टेन स्वामी की पिछले साल पांच जुलाई को अस्पताल में उस समय मौत हो गई थी, जब वह चिकित्सा के आधार पर जमानत का इंतजार कर रहे थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)