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अमर चित्र कथा में मणिपुरी योद्धा को आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी बताने पर प्रकाशक ने माफ़ी मांगी

‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ के तहत संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से कॉमिक बुक ‘अमर चित्र कथा’ ने ‘स्वतंत्रता संग्राम के आदिवासी नेता’ नामक एक संग्रह प्रकाशित किया था, जिसमें ब्रिटिशराज के मणिपुरी सेनानायक पाउना ब्रजवासी की कहानी को भी शामिल किया था. मणिपुर के छात्र संगठनों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि ब्रजवासी न तो आदिवासी थे और न ही उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था.

अमर चित्र कथा का स्वतंत्रता संग्राम के आदिवासी नेता संग्रह का कवर.(फोटो: pib.gov.in)

नई दिल्ली: आजादी का अमृत महोत्सव समारोह के हिस्से के तौर पर ‘अमर चित्र कथा’ कॉमिक बुक में ‘स्वतंत्रता संग्राम के आदिवासी नेता’ संग्रह प्रकाशित हुआ था, जिसमें मणिपुरी सेनानायक पाउना ब्रजवासी को भी जगह दी गई थी.

इसके बाद मणिपुर की राजधानी इंफाल के छात्र संगठनों- ऑल मणिपुर स्टूडेंट्स यूनियन (एएमएसयू), मणिपुरी स्टूडेंट्स फेडरेशन (एमएसएफ), कंगलेईपाक स्टूडेंट्स एसोसिएशन (केएसए) और स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ कंगलेईपाक (एसयूके) ने संस्करण में ब्रजवासी को शामिल करने पर आपत्ति जताते हुए इस कॉमिक बुक पर प्रतिबंध लगा दिया था.

संगठनों ने आपत्ति जताते हुए कहा है कि पाउना ब्रजवासी न तो आदिवासी थे और न ही उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, प्रतिबंध के दो दिन बाद रविवार (14 अगस्त) को अमर चित्र कथा की कार्यकारी संपादक रीना पुरी ने इसके लिए माफी मांगी है.

अमर चित्र कथा केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के साथ सहभागिता में कॉमिक्स का संस्करण लेकर आया है.

गौरतबल है कि कंगलेईपाक के मणिपुरी साम्राज्य में ब्रजवासी सैन्य अधिकारी थे और 1891 के एंग्लो-मणिपुर युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे. युद्ध तब हुआ जब अंग्रेजों ने मणिपुर के शासन को नियंत्रित करने की कोशिश की, उन्होंने राजा की गद्दी पर अपने खुद के शासक को बैठा दिया, जिसने विद्रोह को जन्म दिया.

ऐसा माना जाता है कि ब्रजवासी को अंग्रेजों के लिए काम करने का प्रस्ताव मिला था और जब उन्होंने इसे ठुकरा दिया तो उन्हें मार दिया गया.

संयुक्त छात्र समन्वय समिति के संयोजक एस. बिद्यानंद ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ‘1891 के युद्ध का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जरा भी कुछ लेना-देना नहीं है. मणिपुरी सेना अपने साम्राज्य की रक्षा कर रही थी. फिर इसे इस अमर चित्र कथा नामक किताब में कैसे शामिल किया जा सकता है? इसके अलावा पाउना ब्रजवासी आदिवासी नहीं हैं, इसलिए सरकार आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में किताब में उनकी कहानी को कैसे शामिल कर सकती है? यह अत्यधिक निंदनीय है.’

माफी मांगते हुए अमर चित्र कथा की कार्यकारी संपादक पुरी ने कहा, ‘आजादी का अमृत महोत्सव के तहत संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से प्रकाशित ‘स्वतंत्रता संग्राम के आदिवासी नेता’ संग्रह में मणिपुरी योद्धा पाउना ब्रजवासी की कहानी का इस्तेमाल करने पर अमर चित्र कथा खेद व्यक्त करता है. आदिवासी योद्धाओं की सूची में उनका नाम अनजाने में जुड़ गया. हमने संग्रह से उस कहानी को हटा दिया है और मणिपुरी लोगों को हुई किसी भी पीड़ा के लिए माफी मांगते हैं.’

इस बीच संस्कृति मंत्रालय के सूत्रों ने कहा है, ‘गलतियां हो सकती हैं.’

मंत्रालय के एक सूत्र ने कहा, ‘हम सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों के नामों पर विचार कर रहे हैं और नामों को छांटना एक लंबी प्रक्रिया है. हम हर राज्य का प्रतिनिधित्व करने की कोशिश कर रहे हैं. हमने अमर चित्र कथा को गुमनाम नायकों की सूची भेजी थी और उन्होंने अपने शोध के आधार पर नामों को छांटा. उन्होंने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों पर लिखी किताब से 4-5 नाम पहले ही यह जानकर काट दिए थे कि प्रस्तावित नाम आदिवासी नहीं हैं. इसलिए यह संभव है कि कोई गलती हुई हो.’

मणिपुरी विश्वविद्यालय के शिक्षक होमेन थंगजाम ने कहा, ‘ब्रजवासी मणिपुर की महत्वपूर्ण शख्सियत हैं. उनकी कहानी केवल राज्य के लाभ उठाने के लिए नहीं है. यह केंद्र द्वारा उनके नाम को हथियाने के लिए जान-बूझकर किया गया कृत्य है. हालांकि यह ऐसा पहला मामला नहीं है, लेकिन सरकार को सही इतिहास ध्यान में रखना चाहिए था. वह न तो आदिवासी थे और न ही युद्ध स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित था.’

उन्होंने कहा कि केंद्र मणिपुरियों को अपनी अनूठी सामूहिक यादों को बनाए रखने की अनुमति नहीं दे रहा है.