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बिलक़ीस मामला: दोषियों को सज़ा सुनाने वाले जज ने उन्हें रिहा किए जाने को ग़लत मिसाल बताया

बिलक़ीस बानो सामूहिक बलात्कार मामले में 11 लोगों को साल 2008 में उम्रक़ैद की सज़ा सुनाने वाले जज जस्टिस यूडी साल्वी ने उन्हें रिहा किए जाने के क़दम की निंदा करते हुए सवाल उठाया है कि दोषियों को गुजरात सरकार की 1992 में बनी क्षमा नीति के तहत रिहा किया गया है अगर सरकार द्वारा 2014 में बनी वर्तमान क्षमा नीति का पालन किया जाता तो ये दोषी रिहा नहीं हुए होते.

जस्टिस यूडी साल्वी (फोटो: greentribunal.gov.in)

नई दिल्ली: बिलकीस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में 11 दोषियों को गुजरात सरकार की क्षमा नीति के तहत जल्द रिहाई दिए जाने के कुछ दिनों बाद उन्हें सजा सुनाने वाले के बॉम्बे हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस यूडी साल्वी ने इस कदम की निंदा करते हुए कहा है कि इससे ‘एक बहुत गलत मिसाल’ कायम हुई है.

समाचार वेबसाइट बार एंड बेंच से बातचीत में उन्होंने बताया, ‘एक बहुत बुरी मिसाल स्थापित की गई है. मैं कहूंगा कि यह गलत है. अब सामूहिक बलात्कार के अन्य मामलों के दोषी भी ऐसी राहत पाने की मांग करेंगे.’

जस्टिस साल्वी ने आगे कहा कि फैसले के व्यापक दुष्प्रभाव होंगे.

उन्होंने कहा, ‘निश्चित तौर पर यह एक विडंबना है. हमारे प्रधानमंत्री ने महिला सशक्तिकरण की बात की और जिस राज्य से वह आते हैं, उसने उन लोगों को रिहा कर दिया, जिन्होंने एक असहाय महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया था.’

जस्टिस साल्वी ने 2008 में 11 लोगों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. उन्होंने 7 अन्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी भी कर दिया था.

हालांकि मई 2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस विजया ताहिलरमानी और मृदुला भटकर की पीठ ने 11 आरोपियों की दोषसिद्धि बरकरार रखी और साथ में जस्टिस साल्वी द्वारा बरी कर दिए गए सात लोगों को भी दोषी ठहराया.

दोषियों को गुजरात सरकार की 1992 में बनी क्षमा नीति के तहत रिहा किया गया था. हालांकि, ये दोषी रिहा नहीं हुए होते अगर राज्य सरकार 2014 में बनी वर्तमान क्षमा नीति का पालन करती.

इसके अलावा केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन को भी बलात्कार के मामले में इन दोषियों को क्षमा देते हुए नजरअंदाज किया गया.

इस साल जून में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भारत की आजादी के 75वें वर्ष के हिस्से के रूप में गाइडलाइन जारी की थी कि 15 अगस्त 2022, 26 जनवरी 2023 और 15 अगस्त 2023 कैदियों को विशेष क्षमा प्रदान की जाएगी. हालांकि, गाइडलाइन में यह स्पष्ट था कि राज्य सरकार द्वारा बलात्कार और हत्या के दोषियों को रिहा नहीं किया जा सकता है.

1992 की क्षमा नीति के उपयोग की आलोचना करते हुए जस्टिस साल्वी ने कहा, ‘मुझे यह विश्वास दिलाइए कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को 1992 की नीति के तहत इन दोषियों की याचिकाओं पर विचार करने का आदेश दिया था. फिर भी हमारे देश की शीर्ष अदालत इस तरह के फैसले की अनुमति कैसे दे सकती है?’

उन्होंने आगे बताया कि कैसे 1992 की नीति को इन दोषियों पर लागू किया गया था.

उन्होंने बताया, ‘यह स्पष्ट नहीं है कि क्या राज्य ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)जी और इसकी परिभाषा में संशोधन किया है. क्या राज्य सरकार ने सामूहिक बलात्कार के इस अपराध की गंभीरता की परिभाषा बदल दी है? अगर इसकी परिभाषा में संशोधन हुआ है, तो ही 1992 की नीति लागू होगी. लेकिन अगर सामूहिक बलात्कार की परिभाषा और गंभीरता बिना संशोधन के समान बनी हुई है तो 2014 की नीति लागू होगी, जिसका आशय है कि उन्हें क्षमा नहीं दी जानी चाहिए थी.’

उन्होंने आगे कहा, ‘सजा यह सुनिश्चित करने के लिए दी जाती है कि आरोपी को पता चले कि उसने कुछ गलत किया है. आरोपी को पछतावा होना चाहिए और उसे पश्चाताप करना चाहिए. यह स्पष्ट नहीं है कि इन लोगों ने वर्तमान मामले में ऐसा पछतावा या पश्चाताप व्यक्त किया है. क्या उन्होंने यह व्यक्त किया है कि उन्हें खेद है और उन्हें अपने अपराध का एहसास हो गया है.’

उन्होंने दोषियों के रिहा होने के बाद उन्हें जेल के बाहर मिठाई खिलाकर और माला पहनाकर स्वागत किए जाने की भी निंदा की.

उन्होंने कहा, ‘यह बेहद ही बुरा है. पता नहीं कि लोग उनका इस तरह क्यों स्वागत कर रहे हैं. मेरा मानना है कि दोषियों को सम्मानित करने वाले लोगों के राजनीतिक उद्देश्य और एजेंडा है. ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए.’

उल्लेखनीय है कि द वायर  ने एक लेख में बताया है कि इस साल जून में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दोषी ठहराए गए कैदियों की रिहाई के संबंध में राज्यों को दिशानिर्देश जारी किए थे. ये दिशानिर्देश भारत की स्वतंत्रता के 75वें वर्ष को लेकर तैयार की गई एक विशेष नीति के तहत जारी किए गए थे.

दिशानिर्देशों के अनुसार, कैदियों को 15 अगस्त, 2022, 26 जनवरी, 2023 (गणतंत्र दिवस) और 15 अगस्त, 2023 को विशेष छूट दी जानी थी. हालांकि, दिशानिर्देशों में यह स्पष्ट किया गया था कि आजीवन कारावास की सजा पाने वाले और बलात्कार के दोषी समय से पहले रिहाई के हकदार नहीं होंगे.

ऐसे में इस निर्णय के बाद कई विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं कि क्या गुजरात सरकार ने बिलकिस बानो मामले के दोषियों को रिहा करने में  केंद्रीय दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया है.

गौरतलब है कि 27 फरवरी, 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में आग लगने की घटना में 59 कारसेवकों की मौत हो गई. इसके बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़क गए थे. दंगों से बचने के लिए बिलकीस बानो, जो उस समय पांच महीने की गर्भवती थी, अपनी बच्ची और परिवार के 15 अन्य लोगों के साथ अपने गांव से भाग गई थीं.

तीन मार्च 2002 को दाहोद जिले की लिमखेड़ा तालुका में जहां वे सब छिपे थे, वहां 20-30 लोगों की भीड़ ने बिलकीस के परिवार पर हमला किया था. यहां बिलकीस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, जबकि उनकी बच्ची समेत परिवार के सात सदस्य मारे गए.

बिलकीस द्वारा मामले को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में पहुंचने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे. मामले के आरोपियों को 2004 में गिरफ्तार किया गया था.

मामले की सुनवाई अहमदाबाद में शुरू हुई थी, लेकिन बिलकीस बानो ने आशंका जताई थी कि गवाहों को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, साथ ही सीबीआई द्वारा एकत्र सबूतों से छेड़छाड़ हो सकती, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2004 में मामले को मुंबई स्थानांतरित कर दिया.

21 जनवरी 2008 को सीबीआई की विशेष अदालत ने बिलकीस बानो से सामूहिक बलात्कार और उनके सात परिजनों की हत्या का दोषी पाते हुए 11 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. उन्हें भारतीय दंड संहिता के तहत एक गर्भवती महिला से बलात्कार की साजिश रचने, हत्या और गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने के आरोप में दोषी ठहराया गया था.

सीबीआई की विशेष अदालत ने सात अन्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी.

इसके बाद 2018 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी व्यक्तियों की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सात लोगों को बरी करने के निर्णय को पलट दिया था. अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को बिलकीस बानो को 50 लाख रुपये का मुआवजा, सरकारी नौकरी और आवास देने का आदेश दिया था.