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यूपी: सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को 57 लाख रुपये के नुकसान की भरपाई के नोटिस भेजे गए

बिजनौर के नहटौर थाने के प्रभारी ने बताया है कि दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाले नहटौर के 60 प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने नोटिस जारी कर 57 लाख रुपये के नुकसान की भरपाई करने का निर्देश दिया है.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

बिजनौर: लगभग तीन साल पहले नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों में शामिल नहटौर के 60 प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने नोटिस जारी कर 57 लाख रुपये के नुकसान की भरपाई करने का निर्देश दिया है.

नहटौर के थाना प्रभारी पंकज तोमर ने शनिवार को बताया कि 20 दिसंबर 2019 को नहटौर में सीएए/एनआरसी के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया था. भीड़ ने सरकारी संपत्ति में तोड़-फोड़ की थी और थाने पर खड़ी पुलिस की जीप और मोटरसाइकिलों में आग लगा दी थी. इस दौरान भीड़ ने पुलिस पर पथराव भी किया था और जवाब में पुलिस को गोली चलानी पड़ी थी.

मालूम हो कि 20 दिसंबर, 2019 को हुई हिंसा में कम से कम 26 लोग घायल हुए थे, जिसमें 20 पुलिसवाले शामिल हैं. इसमें सुलेमान के अलावा 23 वर्षीय अनस की भी मौत हो गई थी.

मामले में गठित एसआईटी ने मृतक छात्र सुलेमान पर ही हिंसा में शामिल होने का आरोप लगाया था, जबकि सुलेमान के बड़े भाई शोएब मलिक का आरोप था कि नमाज पढ़कर वापस लौटते समय पुलिसकर्मियों ने उनके भाई को उठा लिया और एक गली में ले जाकर गोली मार दी. 

जनवरी 2020 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, बिजनौर पुलिस प्रदर्शनकारियों द्वारा गोली चलाने का दावा ​कोर्ट में साबित नहीं कर पाई थी.

उस समय प्रदर्शनों के दौरान दंगा कराने और हत्या के प्रयास के दो आरोपियों को जमानत देते हुए उत्तर प्रदेश के बिजनौर के एक सत्र अदालत ने पुलिस के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने ऐसा कोई सबूत नहीं दिखाया जिससे पता चले कि आरोपी गोलीबारी या आगजनी में लिप्त थे या पुलिस ने आरोपियों से कोई हथियार जब्त किया हो या कोई पुलिसकर्मी गोली से घायल हुआ हो.

नहटौर के थाना प्रभारी तोमर के अनुसार, प्रशासन ने प्रदर्शन के दौरान 57 लाख रुपये की सरकारी संपत्ति के नुकसान का आकलन किया था.

उन्होंने बताया कि पुलिस ने अब हिंसा में शामिल 60 आरोपियों को 57 लाख रुपये की भरपाई के लिए नोटिस जारी किए हैं.

उल्लेखनीय है कि इसी साल फरवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर, 2019 में सीएए के विरोध में आंदोलन कर रहे लोगों को वसूली के नोटिस भेजे जाने पर उत्तर प्रदेश सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि ऐसा करना उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित क़ानून के विरुद्ध है और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती.

अदालत ने सरकार से इन नोटिसों को निरस्त करने का निर्देश देते हुए सवाल किया था कि अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) संपत्ति के नुकसान का आकलन कैसे कर रहे थे जबकि यह कार्य एक न्यायिक अधिकारी द्वारा किया जाना था.

हालांकि अदालत ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक और निजी संपत्ति के नुकसान की वसूली अधिनियम, 2020 के तहत नोटिस भेजे की अनुमति दी थी.

इसके बाद 18 फरवरी को यूपी सरकार ने अदालत को बताया था कि उसने सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान की वसूली के लिए जारी किए गए 274 नोटिस को वापस ले लिए हैं और वह प्रदर्शनकारियों से वसूली गई करोड़ों रुपये की पूरी धनराशि वापस करेगी.

हालांकि इसके कुछ दिन बाद भी कई लोगों को क्लेम ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश होने के नोटिस प्राप्त हुए थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)