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एल्गार परिषद केस: सुप्रीम कोर्ट ने गौतम नवलखा को नज़रबंद करने की अनुमति दी

एल्गार परिषद मामले में आरोपी 70 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा के मुंबई की तलोजा जेल में पर्याप्त चिकित्सा और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी के मद्देनज़र घर में नज़रबंदी के अनुरोध को स्वीकारते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि उनकी मेडिकल रिपोर्ट को ख़ारिज करने की कोई वजह नहीं है.

गौतम नवलखा (फोटो: यूट्यूब)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में जेल में बंद सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा को उनकी स्वास्थ्य स्थिति और बुढ़ापे को देखते हुए घर में नजरबंद रखने की अनुमति दी.

नवलखा ने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया था कि उन्हें महाराष्ट्र के तलोजा जेल में न्यायिक हिरासत में रखने के बजाय घर में नजरबंद रखा जाए.

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जेल में बंद गौतम नवलखा को एक महीने के लिए घर में नजरबंद करने का आदेश 48 घंटे के भीतर अमल में लाया जाए.

शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रथमदृष्टया गौतम नवलखा की चिकित्सीय रिपोर्ट को खारिज करने की कोई वजह नहीं है.

बुधवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू को इस बारे में निर्देश मांगने को कहा था और नवलखा को कुछ दिनों के लिए नजरबंद रखने के दौरान उन पर लगाए जा सकने वाले प्रतिबंधों के बारे में अवगत कराने को भी कहा था.

जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने कहा कि वह एएसजी की दलीलें सुनने के बाद गुरुवार को आदेश पारित किया.

बुधवार को पीठ ने कहा था, ‘वह 70 वर्षीय व्यक्ति हैं. हम नहीं जानते कि वह कब तक जीवित रहेंगे. निश्चित रूप से, वह अपरिहार्य (मौत) की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसा नहीं है कि हम उन्हें जमानत पर रिहा करने जा रहे हैं. हम सहमत हैं कि एक विकल्प के रूप में घर में नजरबंद करने के निर्णय पर सावधानी से अमल किया जाना चाहिए.’

नवलखा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट से पता चलता है कि उनके जेल में उपचार की कोई संभावना नहीं है. सिब्बल ने कहा था, ‘दुनिया में कोई रास्ता नहीं है कि आप जेल में इस तरह का इलाज/निगरानी कर सकें. उनका वजन काफी कम हो गया है. जेल में इस तरह का इलाज संभव नहीं है.’

एनआईए की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा, ‘हम (नवलखा को) गद्दा और बेड सब कुछ मुहैया कराएंगे. हम उन्हें घर का खाना भी लाने देंगे.’

ज्ञात हो कि शीर्ष अदालत ने 29 सितंबर को तलोजा जेल अधीक्षक को नवलखा को तुरंत उपचार के लिए मुंबई के जसलोक अस्पताल में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था. इसने कहा था कि उपचार प्राप्त करना एक कैदी का मौलिक अधिकार है.

नवलखा ने मुंबई के पास तलोजा जेल में पर्याप्त चिकित्सा और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी की आशंकाओं के मद्देनजर नजरबंदी का अनुरोध बंबई उच्च न्यायालय से किया था, लेकिन इसने 26 अप्रैल को यह अनुरोध ठुकरा दिया था. इसके बाद उन्होंने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है.

अगस्त 2018 में अपनी गिरफ्तारी के बाद से मानवाधिकार कार्यकर्ता जेल में है. उन्होंने कई बार दावा किया है कि जेल अधिकारियों ने उसे वह चिकित्सा देखभाल प्रदान नहीं की है जिसकी उन्हें आवश्यकता है.

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपने आवेदन में नवलखा ने कहा था कि वह गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, जिसमें त्वचा की एलर्जी और दांतों की समस्या शामिल है. संदिग्ध कैंसर के लिए उन्हें कोलोनोस्कोपी (colonoscopy) से भी गुजरना पड़ता है. इसलिए, उन्हें अपनी बहन के घर भेजा जाना चाहिए और वहां उन्हें नजरबंद रखा जा सकता है.

उल्लेखनीय है कि 31 दिसंबर 2017 को पुणे में एल्गार परिषद सम्मेलन में कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने के मामले में पुलिस ने नवलखा को आरोपी बनाया है. पुलिस का दावा है कि सम्मेलन में भड़काऊ भाषण देने की वजह से अगले दिन पश्चिमी महाराष्ट्र के इस शहर के बाहरी इलाके स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के नजदीक हिंसा हुई.

पुणे पुलिस ने यह भी दावा किया था कि माओवादियों ने इस सम्मेलन का समर्थन किया था. एनआईए ने बाद में इस मामले की जांच संभाली और इसमें कई सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा शिक्षाविदों को आरोपी बनाया गया.

मामले के 16 आरोपियों में से केवल दो आरोपी वकील और अधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और तेलुगु कवि वरवरा राव फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. 13 अन्य अभी भी महाराष्ट्र की जेलों में बंद हैं.

आरोपियों में शामिल फादर स्टेन स्वामी की पांच जुलाई 2021 को अस्पताल में उस समय मौत हो गई थी, जब वह चिकित्सा के आधार पर जमानत का इंतजार कर रहे थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)