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द्रमुक ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- नागरिकता संशोधन क़ानून मनमाना है

तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत एक हलफ़नामे में कहा है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 मनमाना है क्योंकि धार्मिक अल्पसंख्यकों पर विचार करते हुए भी यह भारतीय मूल के तमिलों को बाहर रखता है, जो उत्पीड़न के कारण श्रीलंका से भागकर भारत में रह रहे हैं.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन. (फोटो साभार: फेसबुक पेज)

नई दिल्ली: द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि 2019 का नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) मनमाना है क्योंकि यह केवल तीन देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों पर विचार करता है, जबकि भारत में रह रहे श्रीलंकाई तमिलों को शरणार्थी के रूप में देखता है.

द हिंदू के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में द्रमुक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन प्रस्तुत हुए थे. द्रमुक ने अपने हलफनामे में कहा, ‘अधिनियम मनमाना है क्योंकि यह केवल तीन देशों – पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से संबंधित है – और केवल छह धर्मों – हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों तक ही सीमित है. यह स्पष्ट रूप से मुसलमानों को बाहर रखता है.’

हलफनामे में आगे कहा गया, ‘इसके अलावा, धार्मिक अल्पसंख्यकों पर विचार करते हुए भी यह भारतीय मूल के तमिलों को बाहर रखता है, जो उत्पीड़न के कारण श्रीलंका से भागकर वर्तमान में भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं.’

हलफनामे में कहा गया है कि ‘अधिनियम तमिल जाति के खिलाफ’ है.

डीएमके ने आगे कहा, ‘अधिनियम इस वास्तविकता को नजरअंदाज करता है कि कई दशकों से तमिलनाडु में बसे तमिल शरणार्थी गैर-नागरिकता और गैर-देशीकरण के कारण अपने मौलिक अधिकारों और अन्य अधिकारों से वंचित हैं.’

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, हलफनामे में कहा गया है, ‘श्रीलंका की सिंहली आबादी, जो बौद्ध बहुमत है, ने ऐतिहासिक रूप से तमिलों को आक्रमणकारियों माना है, जिन्होंने सिंहली क्षेत्र को लांघा है …. श्रीलंकाई संविधान के खंड 9 के अनुसार, श्रीलंका गणराज्य बौद्ध धर्म को सबसे महत्वपूर्ण स्थान देता है और तदनुसार यह राज्य का कर्तव्य होगा कि वह सभी धर्मों के लिए सभी अधिकारों का आश्वासन देते हुए, बुद्ध शासन की रक्षा और पोषण करे.

यह इशारा करते हुए हुए कि सीएए के ‘उद्देश्यों और कारणों’ के अनुसार, ‘पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश को शामिल करने का आधार यह था कि उनके संविधान में एक विशिष्ट धर्म के लिए प्रावधान किया गया था जिसके कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों को धर्म के आधार पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा’ द्रमुक ने कहा, ‘श्रीलंका में स्थिति बाकी तीन देशों में एक जैसी है… क्योंकि न केवल भारतीय तमिलों ने धार्मिक उत्पीड़न का सामना किया है क्योंकि वे मुख्य रूप से हिंदू थे, उन्होंने ब्रिटिश शासन से सीलोन की स्वतंत्रता के बाद से अपने अल्पसंख्यक दर्जे के कारण बड़े पैमाने पर उत्पीड़न का सामना किया है.’

तमिल आबादी के पुनर्वास और प्रत्यावर्तन के लिए भारत और श्रीलंका सरकार के बीच विभिन्न क़रारों की ओर इशारा करते हुए हलफनामे में कहा गया है कि 4 जनवरी, 2010 तक इन पंजीकृत प्रवासियों की कुल संख्या 4,61,631 थी.

इसने कहा कि भारत सरकार द्वारा दायर जवाबी हलफनामे में ‘तमिल शरणार्थियों की दुर्दशा पर स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा गया है.’

इसमें आगे जोड़ा गया है कि तमिल शरणार्थियों के प्रति केंद्र के ‘सौतेले व्यवहार’ ने उन्हें लगातार निर्वासन और अनिश्चित भविष्य डर में रहने के लिए छोड़ दिया है. स्टेटलेस (बिना किसी देश के) होने के कारण उन्हें एक समझौता होने के बावजूद सरकारी सेवाओं या संगठित निजी क्षेत्रों में रोजगार, संपत्ति, वोट देने के अधिकार, नागरिकों और अन्य लोगों को प्राप्त सरकारी लाभों को लेने से वंचित कर दिया गया है.’