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जोश मलीहाबादी: काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब, मेरा नारा इंक़लाब ओ इंक़लाब…

जन्मदिन विशेष: हर बड़े शायर की तरह जोश मलीहाबादी को लेकर विवाद भी हैं और सवाल भी, लेकिन इस कारण यह तो नहीं ही होना चाहिए था कि आलोचना अपना यह पहला कर्तव्य ही भूल जाए कि वह किसी शायर की शायरी को उसकी शख़्सियत और समय व काल की पृष्ठभूमि में पूरी ईमानदारी से जांचे.

जोश मलीहाबादी. [जन्म: 5 दिसंबर 1838 – अवसान: 22फरवरी 1982] (फोटो साभार: रेख्ता ब्लॉग)

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से कोई तीस किलोमीटर की दूरी पर अंतरराष्ट्रीय ख्याति से मंडित एक कस्बा है मलीहाबाद. कहना मुश्किल है कि देश की सरहद के पार उसे उसके (मलीहाबादी) आमों के लिए ज्यादा जाना जाता है या ‘शायर-ए-इंक़लाब’ कहलाने वाले उर्दू के भारतीय उपमहाद्वीप के अनूठे शायर जोश मलीहाबादी की जन्मस्थली होने के लिए.

और तो और, मलीहाबाद के लोग भी इस मुश्किल सवाल का सामना करने में झिझकते हैं. भले ही वे इस बात को लेकर जोश से अभी तक नाराज हैं कि विभाजन और आजादी के बाद के दस-ग्यारह साल हिंदुस्तान में गुजारने के बाद उन्हें जानें क्या सूझी कि यह कहकर पाकिस्तान चले गए कि ‘यहां’ उर्दू का कोई भविष्य नहीं है.

हालांकि ‘वहां’ जाकर भी वे न अपने लिए कुछ खास कर पाए, न उर्दू के लिए. न वहां उनकी शायरी को हिंदुस्तान जैसा जलवा नसीब हुआ, न कुछ नज्में और मरसिये छोड़ वे अपने खाते में कुछ और जोड़ पाए. इसके उलट चिंता और पीड़ा के बीच जैसे-तैसे उम्र बिताने के बाद जनरल जिया के सत्ताकाल में फरवरी, 1982 में इस्लामाबाद में अंतिम सांस ली और जनरल जिया ने उनके अंतिम संस्कार में शामिल होना भी जरूरी नहीं समझा तो कई भारतीयों द्वारा ही यह कहकर उन्हें शर्मिंदा किया गया कि ‘सदर साहब, अब कोई जोश से बड़ा आदमी तो आपके मुल्क की धरती पर दफ्न होने से रहा.’

उर्दू के प्रतिष्ठित आलोचक इकबाल हैदर की मानें, तो हिंदुस्तान ने जोश को ‘चले जाने’ को लेकर कभी माफ नहीं किया, तो पाकिस्तान ने ‘चले आने’ पर. फिर भी जोश को शायरों की अल्लामा इकबाल वाली पंक्ति में शामिल किया जाता है.

दिलचस्प यह कि इन दोनों की शायरी में ही नहीं, जीवन में भी समानताएं हैं. सबसे बड़ी यह कि दोनों ही अपने पाकिस्तान मोह के हाथों छले गए. कभी ‘हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा’ का उद्घोष करने वाले इकबाल अंततः विभाजन के पैरोकारों के साथी बन गए तो ‘हिंदू हूं न ऐ जोश मुसलमां हूं मैं/सद शुक्र न जुल्मत हूं, न तूफां हूं मैं/आबो गिलोहिंद से हूं और हिंदी हूं/नस्ले आदम से हूं और इंसां हूं मैं’ कहकर अपनी पहचान बताने वाले जोश बंटवारे के दस-ग्यारह साल बाद भी हिंदी से पाकिस्तानी होने का लोभ संवरण नहीं कर पाए.

जाते-जाते यह भी कहते गए: जो देश कि होता है खुशी का दुश्मन/देता नहीं आबो नानो काफूरो कफन/जिस देश में मिलता नहीं पैगामे हयात/उस देश से उगती ही नहीं हुब्बेवतन.

यह तब था, जब उनके देश छोड़ने के फैसले का पता लगते ही प्रायः सारे प्रगतिशील हिंदुस्तानी लेखकों व कवियों ने उसे बदलवाकर उन्हें रोकने की कोशिश की थी- तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी. इतना ही नहीं, 1954 में उन्हें पद्मभूषण से नवाजा गया था और उनकी रचनाओं का अंग्रेजी अनुवाद कराकर उनका नाम नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित करने की योजना बनाई गई थी. लेकिन उन्हें नहीं मानना था और वे नहीं माने.

तब कई जानकारों ने यह भी कहा था कि हिंदुस्तान में उर्दू के ‘भविष्य का अंधेरा’ तो जोश की हिजरत का बहाना भर था. हिजरत से पहले वे एक महफिल के सिलसिले में कराची गए तो वहां उन्हें उनके परिवार के शाही इस्तकबाल व आराम का सब्जबाग दिखाया गया, जिसके वे उसके शिकार हो गए. आज की तारीख में जो लोग इस शिकार होने को उनका गुनाह नहीं मानते, वे भी स्वीकारते हैं कि उस वक्त उन्होंने कमजोर सोच का सबूत दिया. उनके बाद से अब तक के समय ने सिद्ध कर दिया है कि उन जैसे बड़े शायर के लिए हिंदुस्तान ही ज्यादा मुनासिब था.

उनकी जन्मभूमि लौटें, तो पांच दिसंबर, 1898 को मलीहाबाद में उनकी पैदाइश हुई, तो माता-पिता ने उनका नाम शब्बीर हसन खां रखा था. बाद में उन्होंने शायरी के लिए जोश तखल्लुस अपनाकर खुद को मलीहाबाद का बताने के लिए उसमें मलीहाबादी शब्द जोड़ लिया.

उनके आफरीदी पठान पुरखे उनसे चार पीढ़ी पहले ही अवध में बसे थे और पिता बशीर अहमद खां और दादा मोहम्मद खां ही नहीं, परदादा फकीर मोहम्मद खां भी शायर थे. जाहिर है कि जोश को शायरी विरासत में मिली थी और कहते हैं कि वे नौ बरस की उम्र से ही शे’र कहने लगे थे.

उनके वक्त लखनऊ उर्दू शायरी का बड़ा स्कूल हुआ करता था और उन्हें अजीज लखनवी और हादी अली रुसवां जैसे उस्ताद शायरों की सेवाएं प्राप्त थीं. लेकिन जहां तक मकबूलियत की बात है, वह उन्हें 1916 में अपने पिता के देहांत के बाद हासिल हुई, जब कुछ परिजनों के संवेदनहीन व अन्यायी रवैये से तंग आकर उन्होंने लखनऊ छोड़ दिया.

उस वक्त वे महज 18 साल के थे. 1921 में वे अपने कलकत्ता प्रवास के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर से मिले तो जैसे उनके जीवन की धारा ही बदल गई. फिर तो टैगोर की प्रेरणा से उन्होंने उर्दू गद्य लेखन में भी हाथ आजमाए. 1924 में वे हैदराबाद गए तो उनकी जिंदगी ने एक और करवट ली. लेकिन वहां भी उनकी पारी लंबी नहीं हो पाई.

जिस उस्मानिया विश्वविद्यालय में वे अनुवाद के काम की निगरानी के लिए नियुक्त थे, वह हैदराबाद के निजाम द्वारा संचालित थी. इससे अवगत होने के बावजूद अपनी बेखौफ प्रकृति का परिचय देते हुए उन्होंने ऐसा निजाम विरोधी साहित्य रच डाला कि उन्हें निर्वासित कर दिया गया. उन्होंने निर्वासन कबूल कर लिया, लेकिन माफी मांगना गवारा नहीं किया.

अनंतर उन्होंने दिल्ली जाकर वहां से ‘कलीम’ नामक पत्रिका निकाली. फिर प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े और उसकी प्रेमचंद सज्जाद जहीर, रशीद जहां और फैज वगैरह जैसी ही सरपरस्ती व हिमायत की. बीच में नाकाबिल-ए-बर्दाश्त आर्थिक संकट से सामना हुआ तो पूना की एक फिल्म कंपनी में नौकरी की और कुछ वर्ष बंबई में गुजारे. बंटवारे के बाद उर्दू ‘आजकल’ का संपादन किया.

शब्दों में आग भरकर दिलों को दहका देने वाले उनके खास तेवर के मुरीद उन्हें उनके वक्त में ही शायर-ए-इंक़लाब कहने लगे थे. उन्होंने खुद भी अपने एक शे’र में लिखा है: काम है मेरा तगय्युर, नाम है मेरा शबाब/मेरा ना’रा इंक़लाब इंक़लाब इंक़लाब

दूसरी ओर कई आलोचक उन्हें ‘बीसवीं सदी का हाफिज-ओ-ख्ययाम’, ‘इकबाल के बाद का सबसे बड़ा उर्दू शायर’, ‘शायर-ए-हयात’, ‘शायर-ए-शबाब’ और ‘नंगे शब्दों का शायर’ वगैरह भी कहते हैं. उनके प्रशंसकों की यह शिकायत फिर भी बाकी रह जाती है कि उर्दू आलोचकों ने उनके साथ जिम्मेदार और ईमानदार बर्ताव नहीं किया. इसलिए उनकी शायरी के साथ जैसा इंसाफ होना चाहिए था, वह नहीं हुआ.

निस्संदेह, हर बड़े शायर की तरह उनके यहां भी पेंच और तहें हैं, विवाद भी और सवाल भी, लेकिन उनके कारण यह तो नहीं ही होना चाहिए था कि आलोचना अपना यह पहला कर्तव्य ही भूल जाती कि वह किसी शायर की शायरी को उसकी शख्सियत और समय व काल की पृष्ठभूमि में पूरी ईमानदारी से जांचे.

गौरतलब है कि पाकिस्तानी बनने से पहले जोश अपनी शायरी में इंसानों को बांटने वाली हर ताकत को ललकारते रहे थे. चाहे वह खुदा हो, राम हो, मजहब हो, सियासत हो, हुकूमत हो, मुल्ला हो, पंडित हो, कोई अंदरूनी ताकत हों या बाहरी. मिसाल के तौर पर: इंसान को कौमों में न बांटो यारो/तफरीक का लिल्लाह न काजल पारो. जिस पर है रवां कश्ती-ए-तौहीद-ए-बशर/उस खून के धारे पै न लाठी मारो.

कट्टरपंथियों को तो वे प्रायः निशाने पर लेते रहते थे: फर्ज भी कर लूं कि हिंदू हिंद की रुसवाई है/लेकिन इसका क्या करूं फिर भी वो मेरा भाई है… बाज आया मैं तो ऐसे मजहबी ताऊन से, भाइयों का हाथ तर हो भाइयों के खून से.

आज इसको लेकर अफसोस ही जताया जा सकता है कि ऐसी पंक्तियों की सर्जना के बावजूद उनका यह विश्वास अखंडित नहीं रह पाया कि देश बंट जाने से तहजीबें नहीं बंट जाया करतीं और अविश्वास कितना भी बढ़ जाए, हैवानियत की उम्र को बहुत लंबी नहीं ही कर पाता.

जोश की खुद की सैकड़ों नज्में भी तहजीबों के न बंटने की गवाह हैं और उनके पाकिस्तानी बन जाने के बावजूद खालिस हिंदुस्तानी बनी हुई हैं. उनकी जबान भी हिंदुस्तानी है, शैली भी, लहजा भी, उनमें उकेरा गया रंगारंगी का अक्स भी, इंसानी मूल्य भी और नजरिया भी. लेकिन क्या कीजिएगा, जोश की दो और पंक्तियां ये भी हैं: जिंदगी मुंह देखने लगती है जब तलवार में/रोशनी रहती नहीं महबूब के रुखसार में.

अन्यथा उनकी शायरी में बेगानगी कहीं है ही नहीं, केवल अपनापन है.

1947 में बंटवारे से वे इतने दुखी थे कि आजादी का इस्तकबाल नहीं बल्कि मातम कर रहे थे: अपना गला खरोश-ए-तरन्नुम से फट गया/ तलवार से बचा तो रग-ए-गुल से कट गया… दुश्मन गए तो दोस्त बने दुश्मने वतन/खिलअत की तह खुली तो बरामद हुआ कफन.

उनकी ‘एकतारा’ शीर्षक नज्म के बारे में तो कहा जाता है कि प्रतिबद्धता व सामाजिकता की उस जैसी मिसाल उर्दू अदब तो क्या दूसरी भाषाओं के अदब में भी नहीं मिलेगी. इसलिए कई आलोचक कहते हैं कि वे इस नज्म के बाद कुछ और न रचते तो भी हाली और इकबाल की सफ में ही बैठाए जाते.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)