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जब लोग सरकार से डरें तो समझो उन पर अत्याचार हो रहा है: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने दक्षिण कन्नड़ ज़िले के 23 वर्षीय अधिवक्ता द्वारा दायर याचिका पर दिए अपने फैसले में कहा कि जब सरकार या उसके एजेंट लोगों से डरते हैं, तो इसका अर्थ है कि वहां स्वतंत्रता है, और जब लोग सरकार या उसके एजेंटों से डरते हैं, तो समझो उन पर अत्याचार होता है.

कर्नाटक हाईकोर्ट. (फोटो साभार: फेसबुक)

बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि जब लोग सरकार या उसके एजेंटों से डरना शुरू कर दें तो समझो वहां पर अत्याचार है.

जस्टिस नागप्रसन्ना ने दक्षिण कन्नड़ जिले के 23 वर्षीय अधिवक्ता कुलदीप द्वारा दायर याचिका पर दिए अपने फैसले में कहा, ‘जब सरकार या उसके एजेंट लोगों से डरते हैं, तो इसका अर्थ है कि वहां स्वतंत्रता है; और जब लोग सरकार या उसके एजेंटों से डरते हैं, तो समझो उन पर अत्याचार होता है.’

पुथिला गांव के रहने वाले अधिवक्ता कुलदीप ने सब इंस्पेक्टर सुथेश केपी के खिलाफ मारपीट की शिकायत न दर्ज किए जाने के बाद अदालत का रुख किया था. अदालत के निर्देश के बावजूद सब इंस्पेक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में देरी की गई.

इसके बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) को अधिवक्ता की अवैध गिरफ्तारी और उसके साथ मारपीट में शामिल पुलिसकर्मियों की पहचान कर सुथेश और उनके साथियों या किसी अन्य अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया.

हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की जांच तीन महीने में पूरी कर ली जानी चाहिए. उसने पीड़ित अधिवक्ता को तीन लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया, जिसकी राशि विभागीय जांच में दोषी पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों की तनख्वाह से वसूली जाएगी.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, कुलदीप ने अपने पड़ोसियों के. वसंत गौड़ा और उनकी पत्नी भवानी के खिलाफ एक गेट बनाने से रोकने का आदेश प्राप्त किया था, जो उन्हें अपनी कृषि भूमि तक पहुंचने से रोकता था. पुलिस ने अदालत के अंतरिम आदेश पर कोई कार्रवाई नहीं की और कुलदीप द्वारा दायर शिकायत को बंद कर दिया.

उसी दिन, 2 दिसंबर, 2022 को भवानी ने कुलदीप के खिलाफ अनअधिकृत प्रवेश और चोरी का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई कि उन्होंने गेट चोरी किया था.

शिकायत रात 8:15 बजे दर्ज की गई, लेकिन पुलिस रात 8 बजे कुलदीप के घर पहुंची और बिना शर्ट पहने ही उन्हें घसीटते हुए स्टेशन ले गई. उनकी मां को भी एक तरफ धकेल दिया गया. उन्हें अगले दिन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और जमानत दे दी गई. उन्होंने मजिस्ट्रेट को पुलिस द्वारा दुर्व्यवहार, पिटाई और प्रताड़ित किए जाने की जानकारी दी थी.

मजिस्ट्रेट ने जमानत आदेश में दर्ज किया, ‘आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए पुलिस अधिकारी के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करने के लिए अपने उच्च अधिकारी को सूचना जारी करें.’ कुलदीप ने अगले दो दिन अस्पताल में बिताए.

इसके बाद कुलदीप ने सब-इंस्पेक्टर सुथेश केपी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, लेकिन दर्ज नहीं की गई. उसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट से संपर्क किया, जिसने स्थिति रिपोर्ट मांगी. आखिरकार 5 जनवरी, 2023 को ही एफआईआर दर्ज की गई थी.

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस अधीक्षक (एसपी), मंगलुरु सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ जांच की निगरानी करेंगे.

हाईकोर्ट ने कहा कि कुलदीप की गिरफ्तारी अवैध थी.

अदालत ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर के उद्धरण के साथ अपना फैसला दिया कि, ‘शिकायत/सूचना की सत्यता और प्रामाणिकता के बारे में जांच के बाद उचित संतुष्टि के बिना कोई गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि किसी भी गिरफ्तारी से व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से वंचित कर दिया जाता है, जो एक बहुत ही गंभीर मामला है, क्योंकि गिरफ्तारी से अपमान होता है, स्वतंत्रता को कम कर देता है और हमेशा के लिए एक कलंक लग जाता है.’

न्यायाधीश ने कहा, ‘अगर एक वकील के साथ उस तरह से व्यवहार किया जा सकता है, जैसा कि मामले में किया गया है, तो एक आम आदमी इस तरह के व्यवहार के दोहराव को सहन नहीं कर पाएगा. इसलिए ऐसे अवैध कृत्य और कानून का उल्लंघन करने वालों को छोड़ा नहीं जा सकता है. जवाबदेही तय करने और आपराधिक कानून के तहत किसी भी तरह की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए दोनों के खिलाफ विभागीय जांच की कार्रवाई की जाए.’

मार्टिन लूथर किंग जूनियर को कोट करते हुए अदालत ने कहा, ‘कहीं भी अन्याय, हर जगह न्याय के लिए खतरा है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)