2014 में नरेंद्र मोदी के ‘महानायक’ बनकर प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद देश में कुछ और हुआ हो या नहीं, यह तो हुआ है कि विपक्ष के सवालों के समक्ष निरुत्तर रहने या उनकी अनसुनी करती रहने वाली भाजपा सरकारों द्वारा जानबूझकर उसका अनादर करने व उल्टे उससे ही प्रश्न पूछने लग जाने को अब उलटबांसी नहीं बल्कि ‘न्यू नॉर्मल’ माना जाता है. सत्ता संचालन की इस नई शैली को देखकर कई बार लगता है कि इन सरकारों में प्रतिद्वंद्विता-सी चल रही है कि उनमें से कौन अपने विपक्ष का सर्वाधिक मानमर्दन कर दिखाती है.
सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश में इन सरकारों की यह प्रतिद्वंद्विता सबसे स्पष्ट नजर आती है, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले में नरेंद्र मोदी को छकाकर उनसे आगे बढ़ने का एक भी मौका नहीं छोड़ते.
कई लोग उनके इस मौका न छोड़ने के पीछे भाजपा में खुद को मोदी का एकमात्र विकल्प साबित करने की उतावली भी देखते हैं. यह भी कि मोदी उनकी इस उतावली को लेकर इतने संवेदनशील व असहनशील हैं कि उनका वश चले तो मुख्यमंत्री पद से बेदखली कराकर उनकी ऐसी सारी संभावनाओं के एकमुश्त खात्मे में एक पल भी न लगाएं. लेकिन क्या करें, अभी स्थितियां उनके वश में नहीं हैं.
विपक्ष का अनादर
बहरहाल, इस प्रतिद्वंद्विता में पिछले दिनों योगी प्रदेश की विधानसभा में इलाहाबाद में हुए महाकुंभ में भगदड़ से मौतों और गंगा के पानी में प्रदूषण को लेकर अपनी सरकार की आलोचनाओं को लेकर अपने विरोधियों पर बरसते हुए ‘गिद्ध’ व ‘सुअर’ तक जा पहुंचे, साथ ही विपक्ष के स्वभाव व चरित्र पर सवाल उठाकर उसके अनादर व अपमान की ‘परंपरा’ को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया तो कई हल्कों में उनकी ‘दिग्विजय की घोषणाएं’ की जाने लगीं.
उन्होंने कहा, ‘एक सोशल मीडिया हैंडल पर एक बात बहुत अच्छी लिखी गई है… कुंभ में जिसने जो तलाशा उसे वही मिला. गिद्धों को केवल लाश मिली, सूअरों को गंदगी मिली, संवेदनशील लोगों को रिश्तों की खूबसूरत तस्वीर मिली, आस्था वालों को पुण्य मिला, सज्जनों को सज्जनता मिली, गरीबों को रोजगार मिला, अमीरों को धंधा मिला, श्रद्धालुओं को साफ-सुथरी व्यवस्था मिली, पर्यटकों को अव्यवस्था मिली, सद्भावना वाले लोगों को जाति रहित व्यवस्था मिली, भक्तों को भगवान मिले. मतलब, सबने अपने-अपने स्वभाव और चरित्र के अनुसार चीजों को देखा.’
यहां पल भर को रुककर जान लेना चाहिए कि गिद्ध और सूअर वास्तव में उतने अवांछनीय होते नहीं हैं, अपने पोच-सोच के तहत (जिसके शिकार लोगों द्वारा गंदगी साफ करने को भी गंदा काम माना जाता है) जितने अवांछनीय रूप में योगी ने उनका उल्लेख किया. गिद्ध हों या सूअर, वैज्ञानिक नजरिये से देखें तो वे हमारे लिए प्रकृतिप्रदत्त सफाईकर्मियों जैसे हैं, जो नि:शुल्क अपना दायित्व निभाते रहते हैं और बदले में कोई मेहनताना नहीं मांगते.
इनमें गिद्धों के विलुप्ति के कगार पर जा पहुंचने को लेकर तो वैज्ञानिक चिंताएं ही नहीं, उनके संरक्षण के उपायों की जरूरत भी जताते रहते हैं. वैज्ञानिकों की इन चिंताओं को संबोधित करते हुए खुद योगी ने गत वर्ष सितंबर में अपने गृह जिले गोरखपुर के कैम्पियरगंज रेंज में एशियन किंग कहलाने वाले गिद्धों के संरक्षण व प्रजनन के केंद्र का उद्घाटन किया तो उसका नाम रामकथा के बहुचर्चित पात्र गिद्धराज जटायु के नाम पर रखा था.
प्रतिप्रश्न कम नहीं
लेकिन अब उन्होंने बदले हुए संदर्भ में गिद्धों को लाशखोर ठहराकर विपक्ष (समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव के अनुसार महाकुंभ में लापता अपनों को खोज रहे लोगों की भी) उनसे तुलना कर डाली है. ऐसे में विपक्ष के सवालों के जवाब देने की परंपरा में उनका विश्वास होता और उनकी जमात ने सवाल-जवाब की संस्कृति का टेंटुआ न दबा रखा होता तो सबसे मौजू प्रतिप्रश्न यही होता कि कुंभ में गिद्धों को लाशों और सूअरों को गंदगियों की ‘सौगातें’ किसकी कृपा से मिलीं?
आखिरकार, न गिद्ध खुद लाशें गिराते हैं, न सूअर गंगा में गंदगी डालने जाते हैं. उनका ‘कुसूर’ सिर्फ यह है कि वे उन लाशों और गंदगियों (जिन्हें देखकर दूसरे नाक भौं सिकोड़ते हैं) में अपने लिए जीवनरस तलाशते हैं.
दूसरा मौजू सवाल यह होता कि वह सरकार, जिसने अपने बुलावे व चाक-चौबंद इंतजाम के चतुर्दिक प्रचार से प्रभावित होकर वहां पहुंचे और भगदड़ के शिकार हुए निर्दोष श्रद्धालुओं की लाशों को देखकर भी नहीं देखा, उनका आंकड़ा बढ़ जाने के अंदेशे से घबराकर मुंह चुराती फिरती रही और गंगा के पानी के नहाने योग्य न होने को लेकर अभी तक अपने मुंह मियां मिट्ठू बनती आ रही है, वह क्योंकर कुछ कम गैरजिम्मेदार है? क्या प्रदेश की सत्ता उसके बजाय विपक्ष चला रहा है जो वह सारा ठीकरा उसके सिर पर फोड़कर बच निकलेगी?
क्या उसके पास इस सवाल का कोई तर्कसंगत जवाब है कि अपने परिजनों व प्रियजनों की लाशों को देखकर भी बेरहमी से उनकी अनदेखी करने वाली सरकार को क्या कहना चाहिए? खासकर जब एक शंकराचार्य का कहना है कि महाकुंभ में भगदड़ के दिन उसकी गलतबयानी के चलते वे भगदड़ में अपनी जान गंवाने वाले श्रद्धालुओं का शोक तक नहीं मना पाए.
अवध के अपने समय के लोकप्रिय शायर चंद्रमणि त्रिपाठी ‘सहनशील’ ने ऐसे ही किसी अवसर पर पूछा था: क्या यहां दो चार कंधे भी नहीं हैं, रास्ते में लाश कब से सड़ रही है? तो अब यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि जब गिद्धों को लाशें मिल रही थीं तो इस सरकार के कंधों को क्या हो गया था? क्या उन्हें लकवा मार गया था और वे इतने निरुपाय हो चुके थे कि यह भी स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि: लाश की तरह सर-ए-आब हूं मैं और शाहिद, डूबने वाले मददगार समझते हैं मुझे? (काव्य पंक्ति: शाहिद जकी) या कि वे जौन एलिया की इन पंक्तियों का सर्वथा अभिधात्मक अनुकरण कर रहे थे: पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें, जमीं का बोझ हल्का क्यों करें हम?
वैसे, जो भी करते रहे हों, उर्दू को लेकर योगी के पूर्वाग्रहों व मिथ्या धारणाओं के चलते इन पंक्तियों और इनके मुताबिक अपनी करनी को स्वीकार करने का साहस नहीं ही दिखाने वाले. लेकिन उन्होंने हिंदी के रघुवीर सहाय व श्रीकांत वर्मा जैसे कवियों की ही इतिहास के बहाने सत्ता प्रतिष्ठान को चेताने वाली एक-दो कविताएं पढ़ी होतीं, तो अपनी कर्तव्यहीनता को और जिस भी आवरण में छिपाने की कोशिश करते, लाशों को ‘मुर्दा’ समझकर इतने हल्के में लेने की हिमाकत नहीं करते.
तब मुर्दा हस्तक्षेप करता है
श्रीकांत वर्मा ही समझा देते उनको कि जब मगध में सत्ताधीशों के डर के मारे, हस्तक्षेप करने की कौन कहे, कोई छींकता तक नहीं, तब नगर के बीच से गुज़रता हुआ मुर्दा यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है कि मनुष्य क्यों मरता है?
प प्रसंगवश, ‘हस्तक्षेप’ शीर्षक श्रीकांत वर्मा की यह कविता इस प्रकार है:
कोई छींकता तक नहीं/इस डर से/कि मगध की शांति/भंग न हो जाए/मगध को बनाए रखना है तो/मगध में शांति/रहनी ही चाहिए/मगध है, तो शांति है/कोई चीखता तक नहीं/इस डर से/कि मगध की व्यवस्था में/खलल न पड़ जाए/मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए/मगध में न रही/तो कहां रहेगी?/क्या कहेंगे लोग?/लोगों का क्या?/लोग तो यह भी कहते हैं/(कि) मगध अब कहने को मगध है/रहने को नहीं/कोई टोकता तक नहीं/इस डर से/कि मगध में/टोकने का रिवाज न बन जाए/एक बार शुरू होने पर/कहीं नहीं रुकता हस्तक्षेप/वैसे तो मगध निवासियों/कितना भी कतराओ/तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से/जब कोई नहीं करता/तब नगर के बीच से गुज़रता हुआ/मुर्दा/यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है/(कि) मनुष्य क्यों मरता है?
स्मृतिशेष श्रीकांत वर्मा अपनी ‘कोसल में विचारों की कमी है’ शीर्षक कविता में भी योगी जैसे सत्ताधीशों को ही चेता गए हैं कि विचारों की इस कमी के रहते उनकी कोई जय ज्यादा दिनों तक जय नहीं बनी रह पाती और अंततः उनका चक्रवर्ती होना भी किसी काम नहीं आता:
महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो !/युद्ध नहीं हुआ / लौट गए शत्रु/वैसे हमारी तैयारी पूरी थी !/चार अक्षौहिणी थीं सेनाएं/दस सहस्र अश्व/लगभग इतने ही हाथी./कोई कसर न थी./युद्ध होता भी तो/नतीजा यही होता./न उनके पास अस्त्र थे/न अश्व/न हाथी/युद्ध हो भी कैसे सकता था!/निहत्थे थे वे.
उनमें से हरेक अकेला था/और हरेक यह कहता था/प्रत्येक अकेला होता है !/जो भी हो/जय यह आपकी है./बधाई हो!/राजसूय पूरा हुआ/आप चक्रवर्ती हुए./वे (दुश्मन) सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं/जैसे कि यह/ कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता/ (क्योंकि) कोसल में विचारों की कमी है .
सरकारों का जानें क्या हो
अंत में, रघुवीर सहाय की ‘पैदल आदमी’ शीर्षक कविता, जो बताती है कि जब लाशें पड़ी होती हैं, तो इस डर से पीड़ित सत्ताएं कि ‘जानें उनका क्या हो’, किस तरह भूखों, पैदलों और मिट्टी के मिट्टी से मिल जाने के खिलाफ हो जाती हैं:
जब सीमा के इस पार पड़ी थीं लाशें
तब सीमा के उस पार पड़ी थीं लाशें
सिकुड़ी ठिठरी नंगी अनजानी लाशें
वे उधर से इधर आ करके मरते थे
या इधर से उधर जा करके मरते थे
यह बहस राजधानी में हम करते थे
हम क्या रुख लेंगे यह इस पर निर्भर था
किसका मरने से पहले उनको डर था
भुखमरी के लिए अलग-अलग अफ़सर थे
इतने में दोनों प्रधानमंत्री बोले
हम दोनों में इस बरस दोस्ती हो ले
यह कह कर दोनों ने दरवाज़े खोले
परराष्ट्र मंत्रियों ने दो नियम बताए
दो पारपत्र उसको जो उड़कर आए
दो पारपत्र उसको जो उड़कर जाए
पैदल को हम केवल तब इज़्ज़त देंगे
जब देकर के बंदूक उसे भेजेंगे
या घायल से घायल अदले-बदलेंगे
पर कोई भूखा पैदल मत आने दो
मिट्टी से मिट्टी को मत मिल जाने दो
वरना दो सरकारों का जानें क्या हो.
टोह लगाकर देख लीजिए, गिद्ध व सूअर तक पहुंच गई योगी की बेहिस आक्रामकता के पीछे भी लोकसभा चुनाव के बाद शिद्दत से पैदा हुआ यह उनकी सरकारों का ‘जानें क्या हो’ का डर ही है, जिसे छिपाने की कोशिश करते-करते वे कभी विधानसभा के उपचुनावों को हर हाल में जीतने के चक्कर में उनकी निष्पक्षता को दांव पर लगाकर प्रदर्शित कर देते हैं और कभी महाकुंभ की व्यवस्था में अपनी सरकार का नाकारापन छिपाने के लिए बेहिस चोंचले दिखाकर.
ऐसे में उन्हें कौन समझा सकता है कि देश-प्रदेश के बचे-खुचे लोकतंत्र का कभी उनसे आमना-सामना हो जाए तो शायद वह मशहूर शायर अज्म शाकरी के शब्दों में उनसे यही फरियाद करे: मुझे एक लाश कहकर न बहाओ पानियों में, मेरा हाथ छू के देखो मेरी नब्ज चल रही है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)