‘अपने रंगों को संभाल लो… तुम्हारे सबसे प्रिय रंग के ख़िलाफ़ साज़िश हो रही है!’

होली आती है तो उसकी हंसी-ठिठोली के बीच यह तक पता नहीं चल पाता कि दुख और पछतावा किधर चले गए. होली के अवसर पर प्रस्तुत है हिंदी साहित्य के जाने-माने लेखकों और कवियों की कविताएं, जो रंगों के इस पर्व को और बेहतर समझने में मदद करती हैं.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: allison_b216/flickr/CC BY-NC 2.0)

अब, जीवन के उत्तरार्ध में, यह बात याद आती है तो हंसी तो आती ही है, अपनी ‘शिक्षक पीड़कता’ की प्रवृत्ति पर सोचकर दु:ख भी होता है और पछतावा भी. लेकिन होली आती है तो उसकी हंसी-ठिठोली के बीच यह तक पता नहीं चल पाता कि वह दुख और पछतावा किधर चले गए.

बहरहाल, कालेज के दिनों में हम (हां, मैं अकेले नहीं) हिंदी के दो कवियों सुमित्रानंदन पंत (20 मई, 1900-28 दिसंबर, 1977) और कुमार विकल (1935-1997) को आमने-सामने खड़ा करके अपने एक कविहृदय शिक्षक को उलझाने के इरादे से पूछते कि वे इनमें से किसकी तरफ हैं तो उनको मुश्किल में पड़ा देखकर लगभग वैसी ही खुशी पाते जैसी कोई पवित्र कर्तव्य पूरा कर लेने पर प्राप्त होती है.

दरअसल, ये शिक्षक जब भी हमें पंत को पढ़ाते, उनकी पंक्तियों- ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, निकलकर नयनों से चुपचाप, बही होगी कविता अंजान’-पर फिदा होकर रह जाते. इनका पाठ करते हुए झूम-झूम से जाते. कभी अनुभूति का कवि बताते उन्हें और कभी कोमलकांत पदावलियों का. छायावादी कवियों का सिरमौर तो बताते ही बताते.

लेकिन एक दिन हमारा एक साथी कहीं से कुमार विकल की ‘दुखी दिनों में’ कविता ढूंढ़ लाया और दे मारने के अंदाज में शिक्षक के सामने धर दिया. उसकी मुख-मुद्रा से लगता था कि उसका इरादा उसे शिक्षक पर ही नहीं, पंत पर भी दे मारने का है. बहरहाल, वह कविता यों थी:

दुखी दिनों में आदमी कविता नहीं लिखता
दुखी दिनों में आदमी बहुत कुछ करता है
लतीफ़े सुनाने से ज़हर खाने तक
लेकिन वह कविता नहीं लिखता.

दुखी दिनों में आदमी
दिन की रोशनी में रोने के लिए अंधेरा ढूंढता है
और चालीस की उम्र में भी
मां की गोद जैसी
कोई सुरक्षित जगह खोजता है.

दुखी दिनों में आदमी बहुत कुछ सोचता है
मसलन झील के पानी की गहराई
और शहर की सबसे बड़ी इमारत की मंज़िलें
और साथ ही साथ
एक ख़ामोश भाषा में चीख़ता है
कि उसके सारे प्रियजन
झील पर एक मज़बूत बांध बनकर खड़े हो जाएं
और इमारत में चलती लिफ़्ट को रोक लें
लेकिन प्रियजन तो पेड़ होते हैं.

छाया देते हैं
हवा से दुलरा सकते हैं
बांध नहीं बन सकते.
बांध तो ख़ुद ही बनता है.
दुखी दिनों में आदमी
एक मज़बूत या कमज़ोर बांध तो बनता है
लेकिन कविता नहीं लिखता.

कविता पढ़ते-पढ़ते शिक्षक की पेशानी पर बल पड़ने लगे तो उसने दिग्विजयी अंदाज में पूछा-अब बताइए सर? लेकिन शिक्षक ने कुछ नहीं बताया. यह कहकर घुड़क दिया कि इधर-उधर मुंह मारते रहने के बजाय अपने काम से काम रखो. मतलब पाठ्यक्रम से. कुमार विकल तुम्हारे पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं. वे तुम्हें एक अंक भी नहीं दिला पाएंगे.

यह बात तो खैर हम पहले से जानते थे. उस दिन से यह भी जानने लगे कि हमें ‘गहरे पानी पैठ’ का उपदेश देने वाले शिक्षक खुद बहुत ‘उथले पानी पैठ’ के अभ्यस्त थे.

इससे भी बड़ी ट्रेजेडी यह कि उसके बाद ‘हम रहे न हम, तुम रहे न तुम’ वाले वक्त के हसीं सितम ने अरसे तक हमें दीन-दुनिया दोनों से बाहर किए रखा. फिर भी जब कभी हम मिलते और बहुत स्वाभाविक था कि ऐसे मौके होली, ईद और बड़े दिन वगैरह पर ही मिल पाते, इस प्रसंग को जरूर याद करते. अभी भी करते हैं और मौका होली का हो तो पंत जी क्षमा करें, उनको गलत और कुमार विकल को सही ठहराने लग जाते हैं. यह सोचकर कि कविता सचमुच नयनों से निकलकर चुपचाप बहा करती तो होली के हुल्लड़ व हुड़दंग में कुलांचें मारती कैसे दिखती? नज़ीर अकबराबादी के मुंह से ‘तब देख बहारें होली की’ कैसे कहलवाती?

उसके ‘चुपचाप बहने’ का सच तो यह है कि दीवाली आती है तो वह धूम-धड़ाम धांय करने व पटाखे फोड़ने से भी परहेज नहीं कर पाती और होली आती है तो न सिर्फ छैल-छबीले और रसिये बल्कि ‘हम कौन थे क्या हो गए हैं’ जैसे गुरु गंभीर प्रश्नों को लेकर सिर धुनते रहने वाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त तक संयम खोकर प्रकृति की पीली-पीली चोली को फ़ाड़कर फूटा उसका यौवन निहारते नहीं लजाते! अपने ‘स्वर्ग से मिलने गगन को जा रहे’ साकेत में भी !

जैसे ‘बुरा न मानो होली है’ कहकर उन्होंने भी उससे नैन मटक्का करने का लाइसेंस पा लिया हो :

काली काली कोईल बोली-
होली-होली-होली!

हंस कर लाल लाल होठों पर हरयाली हिल डोली,
फूटा यौवन, फाड़ प्रकृति की पीली पीली चोली.

होली-होली-होली!
अलस कमलिनी ने कलरव सुन उन्मद अंखियां खोली,
मल दी ऊषा ने अम्बर में दिन के मुख पर रोली.

होली-होली-होली!
रागी फूलों ने पराग से भरली अपनी झोली,
और ओस ने केसर उनके स्फुट-सम्पुट में घोली.

होली-होली-होली!
ऋतु ने रवि-शशि के पलड़ों पर तुल्य प्रकृति निज तोली
सिहर उठी सहसा क्यों मेरी भुवन-भावना भोली?

होली-होली-होली!
गूंज उठी खिलती कलियों पर उड़ अलियों की टोली,
प्रिय की श्वास-सुरभि दक्षिण से आती है अनमोली.
होली-होली-होली!

गुप्त तो खैर गुप्त, होली का नशा छाया है तो हिंदी नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र भी अपने दिलदार से खुल्लमखुल्ला खुद को गले लगाने, नशीली आंखें दिखाने और उसके गुलाबी गाल पर कुछ रंग जमाने देने का निवेदन करने लगते हैं :

गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में

नहीं ये है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे
ये आशिक की है उमड़ी आहें आतिशबार होली में

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में

है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुछ है
बने हो ख़ुद ही होली तुम ऐ दिलदार होली में

रस गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी
नशीली आंख दिखाकर करो सरशार होली में!

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की बात करें तो वे इस मायने में भी निराले हैं कि अपनी एक कविता में गुप्त की तरह प्रकृति की पीली पीली चोली नहीं, होली खेलने के बाद नायिका की ‘प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस, कस कसक मसक गई चोली’ का जिक्र करते हैं, जबकि दूसरी में उनकी नायिका जो उसके हमजोली नहीं हैं, उनसे होली खेलकर उन्हें उपकृत करने से साफ मना कर देती है. इनमें पहले होली खेलने का जिक्र :

एक ओर नयनों के डोरे लाल गुलाल-भरे, खेली होली!
जागी रात सेज प्रिय पति-संग रति सनेह-रंग घोली,
दीपित दीप-प्रकाश, कंज-छवि मंजु-मंजु हंस खोली—
मली मुख-चुंबन-रोली.

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस, कस कसक मसक गई चोली,
एक-वसन रह गई मंद हंस, अधर-दशन, अनबोली—
कली-सी कांटे की तोली.

मधु-ऋतु-रात, मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खो ली,
खुले अलक, मुंद गए पलक-दल; श्रम-सुख की हद हो ली—
बनी रति की छबि भोली.
बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,
उठी संभाल बाल; मुख-लट, पट, दीप बुझा, हंस बोली—
रही यह एक ठठोली.

फिर कभी होली न खेलने की बात कहने वाली मालिनी नायिका का :

खेलूंगी कभी न होली
उससे जो नहीं हमजोली.
यह आंख नहीं कुछ बोली,
यह हुई श्याम की तोली,
ऐसी भी रही ठठोली,
गाढ़े रेशम की चोली-
अपने से अपनी धो लो,
अपना घूंघट तुम खोलो,
अपनी ही बातें बोलो,
मैं बसी पराई टोली.
जिनसे होगा कुछ नाता,
उनसे रह लेगा माथा,
उनसे हैं जोडूं – जाता,
मैं मोल दूसरे मोली.

और अब महादेवी वर्मा. नहीं जानते होंगे तो चौंक सकते हैं आप कि होली के सिलसिले में निराला के फौरन बाद महादेवी वर्मा के जिक्र का भला क्या तुक? वे तो ‘नीर भरी दुख की बदली’ थीं, जिसका ‘परिचय इतना इतिहास यही (कि) उमड़ी थी कल मिट आज चली.’ लेकिन बताते हैं कि होली आती तो वे अपने दुखों की नीर भरी बदली को खुद इस तरह तिरोहित कर डालती थीं कि होली की बीन तो बजाने ही लग जाती थीं, उसकी रागिनी भी खूब गाती थीं.

दरअसल, होली का दिन उनका जन्मदिन भी था, जिसे वे अपने इलाहाबाद स्थित घर पर खासी धूमधाम से मनाती थीं, अप्रतिम उल्लास के साथ. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हों या हरिवंशराय बच्चन, फिराक गोरखपुरी हों या सुमित्रानंदन पंत, उमाकांत मालवीय हों या रघुवंश, अमृत राय, सुधा चौहान, कैलाश गौतम और एहतराम इस्लाम, सबके सब उनके जन्मोत्सव पर उनके घर पहुंचते थे. कई बार वे ढोलक बजा-बजाकर होली के गीत गाते हुए भी आते थे.

तब पहले से चली आ रही परंपरा के विपरीत महादेवी के घर पर ही होलिका दहन होता और अगले दिन उसी परिसर में रंगोत्सव भी मनाया जाता था. महादेवी उसमें आने वालों की राई-नमक से नजर उतारने के बाद उन्हें अबीर लगातीं और अपनी बनाई गुझिया, पापड़, दही-बड़ा व ठंडई खिलाती-पिलाती थीं. इस अवसर के लिए टेसू के फूलों से रंग भी वे स्वयं तैयार करती थीं.

ऐसे मस्त-मस्त माहौल में हरिवंश राय बच्चन ही भला क्यों पीछे रह जाएं? मस्ती और मादकता पर तो यों भी उनका कॉपीराइट सबसे मजबूत है. फिर क्यों न वे अपनी प्रणय पत्रिका में कहें कि होली तो तभी होली है, जब प्रियतम अपने रंग में रंग ले :

तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है.
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छुए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है.
अंबर ने ओढ़ी है तन पर
चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आंगन में
सरसों पीली-पीली,
सिंदूरी मंजरियों से है
अंबा शीश सजाए,
रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है.
तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है.

फणीश्वरनाथ रेणु भी तब अपने साजन को क्यों न याद दिलाएं कि होली आ गई है :

साजन! होली आई है!
सुख से हंसना
जी भर गाना
मस्ती से मन को बहलाना
पर्व हो गया आज-
साजन! होली आई है!
हंसाने हमको आई है!

साजन! होली आई है!
इसी बहाने
क्षण भर गा लें
दुखमय जीवन को बहला लें
ले मस्ती की आग-
साजन! होली आई है!
जलाने जग को आई है!

साजन! होली आई है!
रंग उड़ाती
मधु बरसाती
कण-कण में यौवन बिखराती,
ऋतु वसंत का राज-
लेकर होली आई है!
जिलाने हमको आई है!

साजन! होली आई है!
खूनी और बर्बर
लड़कर-मरकर-
मधकर नर-शोणित का सागर
पा न सका है आज-
सुधा वह हमने पाई है!
साजन! होली आई है!

साजन! होली आई है!
यौवन की जय!
जीवन की लय!
गूंज रहा है मोहक मधुमय
उड़ते रंग-गुलाल
मस्ती जग में छाई है
साजन! होली आई है!

अंत में, कुमार विकल की एक और कविता, जो रंगांधता (वर्णांधता) की लाचारी और रंगों के ख़तरे में होने की बात करती और चेताती है:

मेरे प्रिय कवि ने कहा था
‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’
लेकिन मेरे शहर के किसी भी पार्क में जाकर देखो
ऐसा नहीं है.

सिर्फ़ वही लोग बोलते हैं
जो फूलों की पहचान से वंचित हैं
और रंगों को ग़लत ढंग से घोलते हैं
मसलन—

लाल रंग को
हरे, नीले और पीले रंगों को मिला रहे हैं
और काले रंग का एक ऐसा बिंब बना रहे हैं
जिसे देखकर मुझे लगता है
कि मेरे सामने

फिर वही चिर परिचित लंबी अंधेरी सुरंग है
जिससे मैं एक बार पहले ही
बड़ी मुश्किल से बाहर निकला हूं
क्या मेरी….लंबी लड़ाई का अंत
एक सुरंग से दूसरी सुरंग का अंधेरा है?
कहां हैं मेरी आकांक्षाओं के सात रंग?
मेरे सामने तो केवल काले रंग का एक घेरा है.

लेकिन वे कह रहे हैं
‘यह सुरंग नहीं—
काले बांस से बनी रंगों भरी पिचकारी है
मैं इससे निकलते रंगों को देख नहीं सकता
यह एक रंगांध की लाचारी है.’

पार्क में होली खेल रहे बच्चो, सुनो!
इससे पहले कि तुम्हें भी रंगांध घोषित कर दिया जाए
रंग खेलना छोड़ दो
अपनी पिचकारियां तोड़ दो
और चुपके से अपने घरों को लौट जाओ
इधर पार्क में एक नई सुरंग बनाने की तैयारी हो रही है.

मेरे प्यारे चित्रकार दोस्त!
अपने रंगों को सम्हाल लो
रंग ख़तरे में हैं.
इस समय जब रंगों भरी धूप
हर फूल पर सो रही है
तुम्हारे सबसे प्रिय रंग के ख़िलाफ़ साज़िश हो रही है.

वह रंग—
जो तुम्हारी धमनियों में दौड़ता है
जिसकी ताकत से तुम शेष रंगों की पहचान करते हो
और इस पहचान से एक नये रंग संसार को रचते हो.

वह रंग—
जो एक शब्द से
फूल तक की यात्रा में
एक दर्शन में बदल जाता है
ठीक वक़्त पर जब बोलता है
सुरंगों के भेद खोलता है.

वह रंग—
जो दर्शन से कर्म तक की यात्रा में
एक मज़बूत हथियार बन जाता है
अंधेरी सुरंगें तोड़ने के काम आता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)