बाबासाहेब, जिन्होंने अपनी राहों के कांटे बुहारकर समाज को सुधारने का संकल्प लिया

बाबासाहेब का अर्थ होता है पिता और बाबासाहेब कहलाने की पात्रता तक की डॉ. बीआर आंबेडकर की राह अनेकानेक कांटों से गुज़रती रही थी. जाति व्यवस्था के विरुद्ध बाबासाहेब के गुस्से को इस तथ्य के आईने में ही ठीक से समझा जा सकता है कि इस व्यवस्था का शायद ही कोई अनर्थ रहा हो जो उनके जीवन और संघर्षों के आड़े न आया हो.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

अभी आपसे बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की बाबत बात करने का मन बना रहा था, तो एक विचित्र-सा (हां, वर्तमान हालात में उसे विचित्र-सा ही कहा जाएगा) खयाल आया. यह कि ब्रिटेन की राजधानी में स्थित ऐतिहासिक लंदन संग्रहालय में पास-पास लगी हुई बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर और कार्ल मार्क्स की प्रतिमाएं बोल सकतीं तो एक दूजे से क्या कहतीं?

क्या वे एक दूजे से अपना यह दुख साझा नहीं करतीं कि उक्त संग्रहालय में उन्हें एक साथ रहते हुए अरसा बीत जाने के बावजूद भारत के उनके अनुयायी साथ रहना कौन कहे, साथ आना भी नहीं सीख पाए और अपने-अपने अंतर्विरोधों में ही उलझे रह गए. बावजूद इसके कि अलग-अलग वे सब के सब दुर्दिन झेल रहे हैं और जिन दुश्मनों से लड़ने का दावा करते हैं, उन्होंने उन सबको स्वप्नध्वंस के कगार तक पहुंचा दिया है-‘प्रतिक्रांति’ तक.

तब क्या उन्हें इसका गिला नहीं होता कि लेखक-चिंतक प्रोफेसर तुलसीराम समेत कई शख्सियतों (जो यावत्जीवन इन अनुयायियों के साथ आने के लिए उनके बीच समन्वय की कोशिशें करती रहीं) की कोशिशों से उनको जरा-भी सद्बुद्धि आई होती तो समन्वय चाहने वालों को इस संसार से विफलमनोरथ न जाना पड़ता.

प्रोफेसर तुलसीराम के अनुसार इस समन्वय के लिए महज इतना अभीष्ट था कि खुद को मार्क्सवादी कहने वाले थोड़े दलित आंदोलनोन्मुख हो जाते, केवल मजदूरों के पक्ष या सत्ताविरोध के क्षेत्र में ही सक्रिय न रहते और दलित आंदोलनकारी कहलाने वाले समझते कि मार्क्सवाद व आंबेडकर-विचारधारा के अंतर्विरोधों को उनके ऐतिहासिक संदर्भों में ही देखा जाना बेहतर है. वे यह समझ जाते तो और अच्छा होता कि बाबासाहेब डाॅ. भीमराव आंबेडकर मार्क्सवादी नीतियों से नहीं, उनसे जुड़ी कुछ घटनाओं व संदर्भों से असहमत थे.

दोनों पक्षों में इतनी समझदारी कहें या दुनियादारी आ जाती तो उनके बीच परस्पर सामंजस्य की कोई न कोई राह जरूर निकल आती और इन दिनों वे जो दुर्दिन झेलने को अभिशप्त हैं, उससे बच जाते.

प्रोफेसर तुलसीराम ऐसी राह निकालने के प्रयत्नों को सारे मुक्तिकामियों की जिम्मेदारी मानते थे. क्योंकि उनकी समझ थी कि मार्क्सवाद व दलित आंदोलन के बीच दूरियों का सबसे ज्यादा लाभ उन शक्तियों को ही मिल रहा है जो किसी भी तरह दलितों व वंचितों की मुक्तिकामना को फूलती-फलती नहीं देखना चाहतीं.

इस बात को आगे बढ़ायें तो पूछ सकते हैं कि बाबासाहेब ने दलितों से ‌’शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ के नारे पर एकजुटता का जो आह्वान किया था, वह मार्क्सवाद के उद्देश्यों से भला कहां टकराता है?

खासकर, जब बाबासाहेब कोई परउपदेशकुशल भी नहीं थे. अपने जीवन में उन्होंने खुद भी अपनी स्थिति के लिए कदम-कदम पर भरपूर संघर्ष किया और शिक्षार्जन व ज्ञानार्जन के नये कीर्तिमान बनाये थे.

प्रसंगवश, बाबासाहेब का अर्थ होता है पिता महोदय और बाबासाहेब कहलाने की पात्रता तक की उनकी राह अनेकानेक कांटों से गुजरती रही थी. आज यह यों ही नहीं है कि उनके परिनिर्वाण के इतने दशकों बाद नोबेल पुरस्कारविजेता अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन उनका बाबासाहेब होना यह कहकर सार्थक कर रहे हैं कि वे बाबासाहेब को अर्थशास्त्र में अपना बाबासाहेब यानी पिता मानते हैं.

निस्संदेह, बाबासाहेब राजनेता नहीं बने होते तो बड़े अर्थशास्त्री कहलाते. कौन नहीं जानता कि वे विदेश जाकर अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट करने वाले पहले भारतीय थे और तकनीकी किस्म के मतभेदों के बावजूद उस सामाजिक आर्थिक समानता में उनका अगाध विश्वास था, जो मार्क्सवादियों को भी तहेदिल से अभीष्ट है.

स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान सबसे पहले ‘मुकम्मल आज़ादी’ मांगने और ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ का नारा बुलंद करने वाले मार्क्सवादी हसरत मोहानी से बाबासाहेब की निकटता का तो आधार ही यही था कि उनकी निगाह में वही एकमात्र ऐसे नेता थे जो समानता का ढोंग करने के बजाय अपने हर आचरण में उसे बरतते थे. बाबासाहेब को लेकर मोहानी की राय भी कुछ ऐसी ही थी.

जाति व्यवस्था के विरुद्ध

हां, जैसा कि प्रोफेसर तुलसीराम कह गए हैं, परमाणु बम की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी समता की संभावनाओं का संहार करती आ रही जाति व्यवस्था के विरुद्ध बाबासाहेब के अधीरता भरे गुस्से को इस तथ्य के आईने में ही ठीक से समझा जा सकता है कि इस व्यवस्था का शायद ही कोई अनर्थ रहा हो जो उनके जीवन और संघर्षों के आड़े न आया हो.

उन दिनों शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था पर सवर्णों का आधिपत्य था और शिक्षा संस्थाओं में ‘अस्पृश्यों’ का प्रवेश सर्वथा निषिद्ध. अस्पृश्यों के अवर्ण बच्चे सवर्ण बच्चों के साथ कक्षाओं में कौन कहे, उनके बाहर भी बैठ या खेल नहीं सकते थे. ऐसी सामाजिक संवेदनहीनता के बीच अलग से सिर्फ अवर्णों को शिक्षा देने वाली संस्थाओं के होने का तो सवाल ही नहीं उठता था.

उस दौर में अवर्णों की परछाईं भी छू जाए तो सवर्ण अपने को अपवित्र समझते थे. इसलिए अवर्णों को रास्ता चलते हुए जोर-जोर से आवाज लगाते रहना पड़ता था, ताकि दूसरी ओर से कोई सवर्ण आ रहा हो तो वह सावधान होकर खुद ‘धर्मभ्रष्ट’ होने और उसे करने से बच जाए. सवर्णों से बातचीत करते हुए भी अवर्णों को उनसे सुरक्षित दूरी बरतनी पड़ती थी. शिक्षा संस्थाओं की ही तरह मठ-मंदिर, कुएं, तालाब, घाट व राजमार्ग भी उनके लिए बंद थे. धोबी उनके कपड़े नहीं धोते थे, हज्जाम उनके बाल नहीं काटते थे और गाड़ीवान उन्हें अपनी गाड़ियों पर नहीं बैठने देते थे.

अवर्णों के अपने अलग देवी-देवता और देवालय जरूर हुआ करते थे, लेकिन न अवर्ण सवर्णों के सामने अच्छा भोजन कर सकते थे, न ही अपने बच्चों के अच्छे नाम रख सकते थे. वे आहार-विहार सब कुछ लुक-छिपकर और सवर्णों की निगाहें बचाकर करने को मजबूर थे. यहां तक कि शादियों में उनके दूल्हे बरात निकालकर घोडे पर भी नहीं चढ़ सकते थे.

बाबासाहेब के पिता रामजी राव अंग्रेजों की सेना में सूबेदार के पद पर नियुक्त थे, जबकि बाबा भालोजी राव और उनके पिता भी अंग्रेज सेना में ही कार्यरत रहे थे. परिवार की इस सैनिक पृष्ठभूमि के पीछे दो बड़े कारण थे. पहला यह कि अस्पृश्य करार दिए जाने के बावजूद महार जाति को बहादुर और लड़ाकू माना जाता था. इसलिए अंग्रेजों की ही नहीं, मुगलों व पेशवाओं की सेनाओं में भी उनकी बहुतायत थी. हालांकि इसका दूसरा पहलू यह था कि उसके नवयुवक बिना किसी प्रतिबद्धता के प्रायः सारी तत्कालीन सेनाओं के लिए उपलब्ध थे और स्वामिभक्ति के अपने खास गुण के लिए प्रशंसा पाते थे. वे जिन गांवों में रहते, उनकी सुरक्षा का दायित्व भी निभाते थे और इसे लेकर ‘कृतज्ञ’ ग्रामवासी उनकी वीरता के किस्से भी सुनाया करते थे.

दूसरा कारण यह कि रोजी-रोजगार के अन्य क्षेत्रों में उन पर लागू {अ}सामाजिक बंदिशें उनकी नाक में इतना दम किए रखती थीं कि उन्हें सेनाओं में, वे किसी की भी क्यों न हों, भर्ती होकर कठिन सैनिक अभ्यास से गुजरना और वक्त आ पड़े तो मरना-मारना अपेक्षाकृत आसान लगता था. कई बार दो प्रतिद्वंद्वी सेनाएं आपस में भिड़तीं तो उनमें चाचा एक की ओर से लड़ रहे होते थे और भतीजे दूसरी की ओर से. गो कि वहां भी उच्च पदों के दरवाजे उनके लिए बंद ही थे.

चौदहवीं संतान

खैर, बाबासाहेब अपने पिता रामजी राव और माता भीमाबाई की चौदहवीं और अंतिम संतान थे. चूंकि उन दिनों बच्चों की कई जानलेवा बीमारियों के निदान का कोई उपाय नहीं था और वे प्रायः अकाल मौत के शिकार होने को अभिशप्त थे, इसलिए अशिक्षा व असुरक्षा के शिकार दंपत्ति एक के बाद एक संतानें पैदा करते जाते थे. बाबासाहेब के भी चौदह भाई-बहनों में भी कुल पांच ही बच पाए. उनके दो बड़े भाइयों के नाम थे बाला राव और आनन्द राव, जबकि दो बहनों के मंजुला और तुलसी.

बचपन में बाबासाहेब ने एक दिन कुछ बच्चों को पढ़़ने जाते देखकर अपने माता-पिता से आग्रह किया कि वे उन्हें भी पढ़़ने भेजें, तो बड़ी समस्या खड़ी हो गई. पिता उन्हें जिस भी विद्यालय में ले जाते, वही महार होने के कारण उन्हें प्रवेश देने से मना कर देता. जैसे-तैसे सतारा के एक विद्यालय में उन्हें प्रवेश मिला भी तो वहां उनके बालमन को कई शारीरिक व मानसिक प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ा. उन्हें महज लंगोटी पहनकर और अपने बैठने के लिए अलग टाटपट्टी लेकर विद्यालय जाना पड़ता और जब तक अध्यापक न आ जाते, कक्षा के बाहर खड़े रहना व इंतजार करना पड़ता. अध्यापक के आने पर भी कक्षा में सारे बच्चों से अलग और सबसे पीछे बैठना पड़ता था. वहां से वे श्यामपट्ट भी ठीक से नहीं देख पाते थे.

वे स्वयं अपनी मर्जी से विद्यालय के जलस्रोतों का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे और बारम्बार याचना के बावजूद कोई उन्हें ऊपर से भी पानी नहीं पिलाता था. इसलिए कई बार वे विद्यालय में दिन-दिन भर प्यासे रह जाते थे. उनके बाल बढ़ जाते तो कोई नाई उन्हें काटने को तैयार नहीं होता था. तब उनकी एक बहन उनके बाल काटकर उन्हें विद्यालय भेजा करती थी.

एक बार उन्हें अपने एक भाई के साथ अपने पिता से मिलने जाना हुआ तो वे मुंहमांगे किराये पर एक बैलगाड़ी में बैठे. उन दिनों बैलगाड़ियां ही यात्राओं का सबसे सुगम व सुलभ साधन थीं. लेकिन जैसे ही गाड़ी वाले को पता चला कि वे दोनों महार जाति के हैं, वह आपे से बाहर होकर उन पर बरस पड़ा. न सिर्फ उन्हें अपशब्द कहे बल्कि जाति छिपाकर बैलगाड़ी पर बैठ जाने की तोहमत जड़कर कोसा भी. इसके बाद वह उन्हें मंजिल तक पहुंचा देता तो भी गनीमत थी, लेकिन उसने बीच रास्ते उन्हें उतारकर दम लिया. बाबासाहेब ने बढ़ा हुआ किराया देने का प्रस्ताव किया तो भी वह टस से मस नहीं हुआ.

क्या गांव क्या शहर

बाद में बाबासाहेब का परिवार बंबई आ गया तो उन्हें उम्मीद थी कि वहां के अपेक्षाकृत उदार नगरीय वातावरण में उन्हें सामाजिक भेदभावों से छुटकारा मिल जाएगा. लेकिन उन्हें छुटकारा तो क्या ठीक-ठाक राहत भी हाथ नहीं आयी. एक दिन विद्यालय में अध्यापक ने उनसे श्यामपट्ट पर कुछ लिखने को कहा तो जैसे ही वे उठकर जाने को हुए, सवर्ण छात्र श्यामपट्ट के पास रखे अपने टिफिन करियर हटाने दौड़ पड़े ताकि वे बाबासाहेब से छूकर अपवित्र न हो जाएं.

उपेक्षाएं और अपमान झेलते हुए बाबासाहेब ने जैसे-तैसे बीए किया और तत्कालीन बड़ौदा राज्य की सेना में नौकरी पाई तो उन्हें उसे इसलिए छोड़ देना पड़ा क्योंकि रहने का ठौर तलाशना नौकरी पाने से भी दुष्कर सिद्ध हुआ. दरअसल, उन दिनों कोई भी ‘अछूत’ जातियों के लोगों को अपना कमरा किराये पर नहीं देता था. होटलों के दरवाजे भी उनके लिए बंद ही रहते थे. लेकिन बाबासाहेब के मामले में हद यह थी कि अपने जिन दोस्तों पर उन्हें बहुत गुमान था, उन्होंने भी बरबस हाथ खड़ेकर उनकी किंचित भी मदद में असमर्थता जता दी थी. इससे निराश बाबासाहेब बंबई लौट आए, लेकिन उम्मीदों का पीछा करना नहीं छोड़ा था.

अंततः वे इस रूप में सफल हुए कि बड़ौदा के राजा सयाजीराव गायकवाड़ ने उनकी आगे की शिक्षा के लिए तीन साल की मासिक छात्रवृत्ति स्वीकृत कर दी. इस शर्त पर कि शिक्षा पूरी होने के बाद वे दस साल तक उनके राज्य की ही सेवा करेंगे. इस छात्रवृत्ति ने बाबासाहेब को दोहरी खुशी प्रदान की: पहली विदेश जाकर अध्ययन का अप्रत्याशित अवसर मिलने की और दूसरी पढ़ाई पूरी होने पर दस साल तक नौकरी की गारंटी की.

21 जुलाई, 1913 को अमेरिका में न्यूयार्क स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र में एमए के लिए नामांकन के बाद उन्होंने पाया कि वहां वे सफलतापूर्वक अपने भविष्य की राह के कांटे बुहार सकते हैं, तो उन्होंने खुद को इस काम में पूरी तरह झोंक दिया. अध्ययन-मनन के प्रति उनके समर्पण ने जल्दी ही उन्हें उनके शिक्षकों का स्नेहभाजन भी बना दिया.

गरीबी का खेल

एमए कर लेने के बाद उन्होंने पीएचडी की उपाधि पाने की ठानी तो शोध का विषय चुना-भारत का राष्ट्रीय लाभ. लेकिन इस शोध के निर्देशक और परीक्षक द्वारा की गई उसकी अप्रत्याशित सराहना भी बाबासाहेब के पीएचडी उपाधि धारणकर डाॅक्टर बनने की अंतिम बाधा दूर नहीं कर पाई. गरीबी ने यहां भी अपना खेल दिखाया ही दिखाया.

नियमों के अनुसार, यह उपाधि उन्हें शोधपत्र छपने पर ही मिल सकती थी, लेकिन न उनके पास इतना धन था कि वे उसे स्वयं छपा सकते और न ही कोई प्रकाशक उसे बिना धन लिए छापने को तैयार था. कई साल बाद 1924 में यह शोधपत्र ‘भारत में प्रांतीय अर्थव्यवस्था का विकास’ नाम से प्रकाशित हुआ, तब जाकर उनको पीएचडी की उपाधि और अपने नाम से पहले डाॅक्टर लिखने का हक मिला. अलबत्ता, इसके बाद उन्हें विद्वान व विचारक के रूप में मान्यता मिलने लगी.

यों, डाॅक्टर बनने से पहले ही वे आगे और अध्ययन की अभिलाषा से लंदन चले गए थे- अर्थशास्त्र में एमएससी और ‘बार ऐट लाॅ’ करने. लेकिन इसी बीच उनकी छात्रवृत्ति की बढ़ाई गई साल भर की अवधि भी समाप्त हो गई और उन्हें बताया गया कि आगे किसी भी हालत में उसे जारी रखना संभव नहीं होगा. ऐसे में भला वे करते तो क्या करते?

पहले विश्व युद्ध के भीषण घमासान के बीच अध्ययन अधूरा रह जाने से उद्धिग्न होकर वे भारत लौट रहे थे तो जिस जहाज में उनका सामान लदा था, उसे समुद्र में डुबो दिया गया. गनीमत थी कि वे खुद दूसरे जहाज में थे और सकुशल बंबई पहुंचने में सफल रहे.

अब छात्रवृत्ति की शर्त के अनुसार, उन्हें बड़ौदा जाकर नौकरी करनी थी, लेकिन उनके पास इतने रुपये भी नहीं थे कि वे अपने खर्चे पर वहां जा पाते. किसी तरह एक दोस्त से कर्ज लेकर वे वहां गए तो उन्हें सैनिक सचिव का पद मिला. लेकिन सिर छुपाने की समस्या फिर मुंह बाये आ खड़ी हुई. न उन्हें किराये पर कमरा मिला, न ही किसी होटल या धर्मशाला में प्रवेश. एक पारसी ने किसी तरह अपने होटल में ठहराना स्वीकार भी किया तो कुछ विघ्नसंतोषियों ने हंगामा खड़ा कर उन्हें वहां से भी निकलवाकर दम लिया.

अफसर बनकर भी अछूत!

तिस पर राज्य के ‘ऊंची’ जातियों के कर्मचारी फाइलों के आदान-प्रदान के वक्त भी उनसे छू जाना बर्दाश्त नहीं कर पाते थे. इसलिए वे फाइलें उनके हाथ में देने को कौन कहे, उनकी टेबल के नजदीक आकर उस पर भी शिष्टतापूर्वक नहीं रखते थे- दूर से उस पर फेंक दिया करते थे.

बाबासाहेब स्वयं उनकी टेबल के पास जाकर फाइलें लेना चाहते, तो भी नाक-भौं सिकोड़ा करते थे. एक दिन तो उन सबने एकजुट होकर उन्हें अपनी-अपनी टेबलों के पास फटकने से भी मना कर दिया. राजा को भी कोसने लगे कि उन्होंने एक अछूत को उनका अफसर बना दिया है.
राजा से शिकायत और उनके हस्तक्षेप से भी यह भेदभाव खत्म नहीं हुआ तो बाबासाहेब एक बार फिर नौकरी छोड़ने को विवश हुए और वापस बंबई चले गए. वहां जीविका के लिए कंपनियों व व्यापारियों से फीस लेकर उन्हें परामर्श देने वाली संस्था खोली, तो भी उनका ‘अछूत’ होना आड़े आया. ऊंची जातियों के लोग उनके ग्राहकों को यह कहकर भड़काने लगे कि क्या उन्हें यह अछूत सलाहकार ही मिला. एक कॉलेज में प्रोफेसर बने तो वहां भी छात्रों को मजबूर किया जाने लगा कि वे अछूत प्रोफेसर से न पढ़ें.

उन्हीं दिनों परिवार के साथ मजदूरों व कुलियों के लिए बनी चाल के एक कमरे में रहते हुए बाबासाहेब ने कोल्हापुर के राजा की मदद से मराठी में ‘मूकनायक’ नाम का पत्र निकाला. लेकिन भाई आनंदराव के असमय निधन के बाद घर-गृहस्थी पत्नी रमाबाई के हवाले कर लंदन चले गए- वह पढ़ाई पूरी करने, जो पहले अधूरी छोड़ आए थे. वहां उन्होंने एमएससी, डीएससी व बार ऐट लाॅ की उपाधियां प्राप्त कीं और 1923 में भारत लौटकर बाम्बे हाईकोर्ट में वकालत आरंभ की. इसके लिए जिस सनद की जरूरत थी, उसकी फीस भी उन्हें कर्ज लेकर ही अदा करनी पड़ी.

वकालत के पेशे में भी भेदभावों से पीछा नहीं छूटा तो उन्होंने समाज सुधार के संकल्प के साथ ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ बनाई और ‘बहिष्कृत भारत’ नाम का पत्र निकालना आरंभ किया. ऐसे में वे जाति व्यवस्था के प्रति असहनशील क्यों नहीं होते और उसका उन्मूलन उनकी पहली प्राथमिकता में क्यों नहीं होता?

यह समझने के लिए भला और क्या चाहिए कि उन्होंने अपनी राहों के कांटे बुहारकर उच्च शिक्षा ग्रहण करने से लेकर असामाजिक समाज व्यवस्था को बदलने के लिए समाज सुधार कार्यक्रमों के नेतृत्व और संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने तक की अपनी यात्रा जाति व्यवस्था के नाश के कैसे दृढ़ संकल्प से संभव की होगी?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)