एक क्रांतिकारी का सफ़र: माओवादी आंदोलन और गुमुडावेल्ली रेणुका

31 मार्च को दक्षिण छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले में पुलिस फायरिंग में गुमुडावेल्ली रेणुका की मौत हो गई. दंतेवाड़ा पुलिस ने इसे 'एनकाउंटर' बताया है, हालांकि इस इलाके में ऐसे दावों की सत्यता संदिग्ध ही रही है.

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गुमुडावेल्ली रेणुका. (फाइल फोटो साभार: papanna.lanka/फेसबुक)

मुंबई: 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश के वरंगल जिले के युवाओं के लिए स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर सशस्त्र संघर्ष ने शामिल हो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी, खासकर कडावेंडी गांव में. हर घर में इस तरह की एक कहानी है. 

उसी दशक की शुरुआत में छिड़े तेलंगाना संघर्ष का दूसरा चरण अपने चरम पर था, और कडावेंडी अलग तेलंगाना और माओवादी आंदोलनों दोनों का एक केंद्र बन चुका था. पर यह वह राह नहीं थी, जिसे गुमुडावेल्ली रेणुका ने अपने लिए चुना था. 

रेणुका बस कॉलेज में पहुंची ही थीं जब उनके माता-पिता ने उनकी शादी करवाने का फैसला किया- संभवतः इस डर से कि वह अपने भाई जीवीके प्रसाद की तरह सशस्त्र संघर्ष की ओर रुख कर लेंगी.

लेकिन यह विवाह जल्द ही टूट गया, क्योंकि अपने पति की लगातार हिंसा से आजिज़ आकर रेणुका ने यह रिश्ता ख़त्म कर दिया. प्रसाद बताते हैं कि यह पहली बार हुआ था कि जब रेणुका ने पितृसत्ता पर सवाल उठाए थे. 

करीब दस साल पहले सशस्त्र संघर्ष का रास्ता छोड़ चुके प्रसाद सरेंडर कर चुके हैं और अब एक तेलुगु चैनल में पत्रकार के तौर पर काम करते हैं. 

बीते 31 मार्च को दक्षिण छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में पुलिस फायरिंग में रेणुका की मौत हो गई. ऑपरेशन का नेतृत्व करने वाली दंतेवाड़ा पुलिस ने दावा किया कि वह एक ‘मुठभेड़’ में मारी गईं- इस इलाके में इस तरह की सभी हत्याओं में लगातार यही दावा किया जाता है, जिससे इसकी सत्यता संदिग्ध ही रहती है.

प्रसाद बताते हैं कि चौवन वर्षीय रेणुका, जिन्होंने नक्सल आंदोलन में एक ओवरग्राउंड वर्कर और एक भूमिगत गुरिल्ला दोनों के रूप में लगभग तीन दशक बिताए, वे लघु कहानियां लिखा करती थीं और ‘बहुत अच्छी पत्रकार’ भी थीं.

जिस समय उनकी मृत्यु हुई, तब रेणुका दंडकारण्य विशेष जोनल कमेटी की सदस्य थीं और उन पर कुछ 45 लाख रुपये का इनाम रखा गया था-  25 लाख रुपये छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा और तेलंगाना सरकार द्वारा 20 लाख रुपये का.

गुमुडावेल्ली लोग पद्मशाली, या बुनकर समुदाय से आते हैं, जिन्हें तेलंगाना और आंध्र प्रदेश दोनों में पिछड़े समुदाय के रूप में वर्गीकृत किया गया है. कडावेंडी गांव में मिली-जुली आबादी रहा करती है, जहां ज्यादातर परिवार भूमिहीन थे, अगर किसी के पास भूमि थी, तो वह भी बेहद कम. प्रसाद बताते हैं, ‘यहां तक ​​कि गांव में रेड्डी (आमतौर पर एक जमींदार समुदाय) भी ज्यादातर भूमिहीन थे.’

प्रसाद 1980 के दशक के मध्य में नक्सल आंदोलन में शामिल हुए थे और तब स्कूल में ही पढ़ते थे. उनसे दो साल छोटी रेणुका का  उस समय आंदोलन की तरफ कोई झुकाव नहीं था. 

द वायर से बातचीत में प्रसाद ने बताया, ‘लेकिन उनकी शादी टूटने के बाद उन्होंने पारिवारिक संरचनाओं पर सवाल उठाना शुरू कर दिया. उन्होंने एक बार मुझे लंबी चिट्ठी भेजी थी, जिसमें पूछा था कि पितृसत्ता को मार्क्सवादी किस रूप में देखते हैं और पितृसत्तात्मक प्रणालियों के भीतर महिलाओं के दैनिक संघर्षों को लेकर कैसी राय रखते हैं. मुझे नजर आ रहा था कि उनके भीतर मंथन शुरू हो गया था. टूटी हुई शादी ने एक तरह से उन्हें आजाद कर दिया.’ 

इसके बाद वो जल्द ही कानून की पढ़ाई करने के लिए सुदूर जिले चित्तूर चली गईं. कानून की पढ़ाई करते हुए रेणुका एक महिला समूह- महिला शक्ति का हिस्सा बन गईं, जो दहेज हत्या, महिला प्रताड़ना और स्वच्छता जैसे मुद्दों पर काम करता था. जल्द ही उन्होंने क्रांतिकारी मासिक पत्रिका ‘महिला मार्गम् के लिए लिखना शुरू कर दिया. अपनी कानून की शिक्षा पूरी करने के बाद वे विशाखापत्तनम चली गईं, जहां उन्होंने वकील के तौर पर काम किया.

1996 तक रेणुका ने एक ओवरग्राउंड नक्सली के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था, वे लघु कथाएं लिखा करतीं, बैठकें बुलातीं और और भूमिगत नक्सलियों के परिवारों को कानूनी सहायता देतीं.

रेणुका कई नामों से कहानियां, लेख, रिपोर्ताज आदि लिखा करती थीं. साल 2003 की शुरुआत की बात है, जब उनके छोटे भाई, अपने माता-पिता के साथ प्रसाद से मिलने जंगल में जा रहे थे. प्रसाद को उस समय भगोड़ा घोषित किया गया था. तब  पुलिस ने उन सभी को पकड़ लिया और रेणुका के छोटे भाई को प्रताड़ित किया. उस वक़्त रेणुका ने अपनी कानूनी शिक्षा का इस्तेमाल किया और भाई को अवैध हिरासत से रिहा करवाया. उस वाकये मे दमयंती नाम की एक युवा लड़की पुलिस फायरिंग में मारी गई थी. इसके बाद से रेणुका ने बी.डी. दमयंती नाम से भी लिखना शुरू कर दिया. 

प्रसाद कहते हैं, ‘उनका पत्रकारिता का ज़्यादातर काम (पार्टी के मुखपत्र में प्रकाशित) इसी नाम से होता था.’ 

प्रसाद कहते हैं कि उनके कुछ बेहतरीन लेखन में वह सब है जो उन्होंने सरकार प्रायोजित मिलिशिया समूह सलवा जुडूम द्वारा बस्तर के आदिवासियों पर की गई हिंसा पर लिखा था. उन्होंने विस्थापन और आदिवासी समुदायों के घटते संसाधनों के बारे में भी लिखा. बाद में उन्होंने मिड़को नाम से लघु कहानियां लिखीं. गोंडी भाषा के इस शब्द का अर्थ ‘जुगनू’ होता है. बाद के समय में पार्टी में उन्हें भानु या चैते के नाम से जाना जाता था. 

2003 के अंत में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की ‘हत्या’ की कोशिश के बाद राज्य में व्यापक गिरफ्तारियां हुई थीं. उसी समय उनके छोटे भाई को भी गिरफ्तार किया गया था. हिरासत में उन्हें प्रताड़ित किया गया, मगर अंततः सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. इसके बाद उनके भाई वकील बने और क्षेत्र के अन्य मानवाधिकार संगठन के साथ काम करने लगे. वहीं रेणुका ने भूमिगत होने का फैसला किया. 2004 में वह गुरिल्ला आंदोलन में शामिल हो गईं. 

दुबली-पतली सी रेणुका ने जल्द ही हथियारों का प्रशिक्षण ले लिया. प्रसाद के अनुसार, जब वे दोनों भूमिगत थे, तो उनकी बमुश्किल ही मुलाकात होती थी. ‘हम अलग-अलग इकाइयों में थे और बहुत अलग-अलग क्षेत्रों में भी चले गए थे,’ वे याद करते हैं.

साल 2005 में रेणुका ने एक अन्य पार्टी नेता से शादी की, पर 2010 में हुई एक और कथित ‘मुठभेड़’ में उनकी भी मौत हो गई. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

आंदोलन में शामिल होने बाद भी रेणुका की प्रेम की तलाश खत्म नहीं हुई थी. 1997 के करीब जब वो शहरी आंदोलन में ही थीं, तब पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने उन्हें संतोष रेड्डी (महेश) से शादी करने का सुझाव दिया. संतोष उस समय पार्टी के आंध्र प्रदेश राज्य समिति के सचिव और केंद्रीय समिति के सदस्य थे, और यही सुझाव उन तक भी पहुंचा था. संतोष भी कडावेंडी गांव से ही थे, लेकिन आंदोलन में शामिल होने के लिए बहुत पहले ही गांव छोड़ चुके थे. उन दोनों के बीच शायद ही कोई जान-पहचान थी. 1997 में ही एक मौके पर रेणुका आंध्र प्रदेश के नल्लमाला के जंगलों में संतोष से मिलने गईं थीं. उन्हें पार्टी की तिरुपति इकाई में पेश आ रही समस्याओं से निपटने के लिए उनके सुझाव लेने थे. यहीं से दोनों के बीच प्रेम का बीज पड़ा.

चूंकि संतोष पार्टी के एक वरिष्ठ नेता थे और रेणुका शहरों में खुले तौर पर काम करने वाली कार्यकर्ता, तो उन्हें अपनी शादी सभी से छिपाकर रखनी पड़ी. 2 दिसंबर 1999 को संतोष पुलिस की कथित ‘मुठभेड़’ में मारे गए. प्रसाद ने बताया, ‘रेणुका सबके सामने अपनी शादी के बारे में खुलकर बोल भी नहीं पायी, न जी भरकर रो सकी. उनकी प्रेम कहानी का हमेशा त्रासद अंत हुआ. उन्होंने संतोष को सच्चे मन से चाहा था.’

साल 2005 में रेणुका ने एक अन्य पार्टी नेता से शादी की, पर 2010 में हुई एक और कथित ‘मुठभेड़’ में उनकी भी मौत हो गई. प्रसाद कहते हैं कि सबको लगता है कि वो सशस्त्र आंदोलन से मेरी वजह से जुड़ीं, लेकिन ऐसा नहीं है. वे इसकी वजह क्षेत्र के राजनीतिक परिवेश और रेणुका की धीरे-धीरे बढ़ती चेतना और सवाल करने की क्षमता को मानते हैं. वे बताते हैं, ‘वो एक आज़ाद ख़याल इंसान थीं जो उनके आसपास हो रही घटनाओं से काफी परेशान हो जाती थीं और सवाल उठाया करती थीं.’ 

इस महीने की शुरुआत में जब उनकी मौत के बारे में तेलंगाना के एक पुलिस अधिकारी ने प्रसाद को फोन किया तब वो अपने दफ्तर में काम कर रहे थे. वो बताते हैं कि इस खबर ने उन्हें हिलाकर रख दिया, पर वो यह भी मानते हैं कि उनका अंत इसी तरह होने का अंदेशा थी. 

प्रसाद कहते हैं, ‘हर सुबह मेरी पत्नी (जिन्होंने 2014 में प्रसाद के साथ ही सरेंडर किया था) सारे अख़बार और चैनल खंगालती रहती, ये देखने के लिए कि कहीं (बस्तर) इलाके में कोई नई मौत तो नहीं हुई है. हैदराबाद में मेरी मां भी यही किया करती थीं. पिछले एक साल में सरकार ने माओवादी आंदोलन से लड़ने के नाम पर सैकड़ों लोगों को बेदर्दी से मारा है. कोई बातचीत नहीं, बस निर्मम हत्या.’

प्रसाद रेणुका का शव लेने दंतेवाड़ा गए थे जहां पुलिस ने उनकी मृत देह को पॉलिथीन बैग में पैक करके प्रदर्शन के लिए रखा हुआ था. प्रसाद के अनुसार, ‘उस वक़्त तक मुझे ऐसा लग रहा था कि रेणुका की मौत अन्य कामरेड्स के साथ हुई है. एक दिन पहले ही पड़ोसी सुकमा जिले में 17 नक्सलियों की मौत की खबर आई थी. लेकिन फिर मुझे संदेह होने लगा.’

वे आगे बताते हैं, ‘रेणुका कभी कान की बाली, कुंडल वगैरह नहीं पहनती थीं, न बिंदी लगाती थीं, लेकिन अब अचानक उन्होंने ये सब पहना हुआ था. इसका यही मतलब हो सकता था कि वो गांव में रह रही थीं और ग्रामीणों के बीच आम जीवन जी रही थीं. फिर पुलिस ने उन्हें पकड़ा क्यों नहीं?’

पुलिस का दावा है कि रेणुका की हत्या इंद्रावती नदी के किनारे दंतेवाड़ा-बीजापुर सीमा पर हुई ‘गोलीबारी’ में हुई. वहीं परिवार का कहना है कि उनके हाथ क्षत-विक्षत थे, जिससे पता चलता है कि पुलिस ने या तो उन्हें प्रताड़ित किया या फिर मारने के बाद किसी तरह के फॉरेंसिक सबूत को मिटाने की जानबूझकर कोशिश हुई. पुलिस ने उनके पास से कथित तौर पर हथियार बरामद होने की बात कही थी. पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने की इजाज़त भी दी, लेकिन परिवार को इसकी रिपोर्ट नहीं मिली.

इसके बाद 2 अप्रैल को प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) संगठन की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी ने एक प्रेस नोट जारी किया, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि रेणुका को बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लॉक के बेलनार गांव में एक छोटे-से घर से पकड़ा गया था. प्रेस नोट में कहा गया है कि रेणुका वहां तब से थीं, जब से उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी.

नोट में माओवादियों ने कहा है, ‘31 मार्च को सुबह 4 बजे के आसपास पुलिस ने उनके घर को घेर लिया. सुबह 9-10 बजे के आसपास वे चैते (पार्टी में उन्हें इसी नाम से जाना जाता था) को इंद्रावती नदी की ओर ले गए और उनकी हत्या कर दी.’

प्रेस नोट में प्रतिबंधित माओवादी संगठन ने कहा है कि इस क्षेत्र में 400 से अधिक हत्याएं हो चुकी हैं, जिनमें सशस्त्र आंदोलन और कई आम नागरिक शामिल हैं. अब वे सरकार से बातचीत करना चाहते हैं. 

प्रसाद और उनकी पत्नी जब रेणुका के शव को उनके पैतृक गांव कडावेंडी लेकर पहुंचे, तो पूरे क्षेत्र से हजारों लोग वहां जमा हो हुए थे. प्रसाद ने बताया कि उन्हें शहीद की तरह विदा किया गया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)