पुस्तक अंश: निर्मला जैन की आत्मकथा ‘ज़माने में हम’ शिक्षा जगत में उनके पहले कदम की ईमानदार गवाही है

निर्मला जैन का 1956 में नवस्थापित लेडी श्रीराम कॉलेज (दिल्ली) में पहली नौकरी के लिए हुए इंटरव्यू का यह वृत्तांत न सिर्फ़ उस दौर की शैक्षिक राजनीति और सामाजिक संरचनाओं को उजागर करता है, बल्कि एक युवा शिक्षिका की आशंकाओं, संघर्षों और अप्रत्याशित सफलता की कहानी भी बयां करता है.

पुस्तक आवरण (साभार: राजकमल प्रकाशन)

डॉ. निर्मला जैन की आत्मकथा ‘ज़माने में हम’ का यह अंश शिक्षा जगत में उनके पहले कदम की ईमानदार गवाही है. 1956 में नवस्थापित लेडी श्रीराम कॉलेज (दिल्ली) में पहली नौकरी के लिए हुए इंटरव्यू का यह वृत्तांत न सिर्फ़ उस दौर की शैक्षिक राजनीति और सामाजिक संरचनाओं को उजागर करता है, बल्कि एक युवा शिक्षिका की आशंकाओं, संघर्षों और अप्रत्याशित सफलता की कहानी भी बयां करता है.

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शिक्षा की दुनिया में पहला कदम

परीक्षाएं ख़त्म हुईं और बेसब्री से परिणाम का इंतज़ार होने लगा. हमें लाख ताक-झांक, खुफ़ियागीरी करने पर भी किसका क्या हाल हुआ, इसका कोई सुराग नहीं मिला. परिणाम घोषित होने से कुछ दिन पहले लेडी श्रीराम कॉलेज ने स्टाफ़ की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला. कॉलेज उसी वर्ष (1956) खुला था. आनन-फ़ानन में लगभग आकस्मिक रूप से उसके खुलने की भी एक कहानी थी.

कहा यह जा रहा था कि शहर के सबसे पुराने लड़कियों के कॉलेज ‘इंद्रप्रस्थ’ में वित्तीय संकट पैदा हुआ तो डी.सी.एम. के मालिक शहर के विख्यात पूंजीपति सर श्रीराम ने कॉलेज की गवर्निंग बॉडी के सदस्य की हैसियत से उसे संकट से उबारने की पेशकश की—बशर्ते कॉलेज का नाम बदलकर ‘लेडी श्रीराम कॉलेज’ कर दिया जाए. बाकी के सदस्यों में भी शहर के कुछ पुराने रईस और प्रतिष्ठित लोग थे. उन्हें इस प्रस्ताव पर एतराज़ था. सुना यह गया कि सर श्रीराम उस मीटिंग से यह चुनौती देकर बाहर निकले कि वे जितना पैसा देने को तैयार हैं, उतने में वे चाहें तो नया कॉलेज खोल सकते हैं, और वे ऐसा करके दिखाएंगे. इतना ही नहीं, उन्होंने प्रस्तावित कॉलेज के लिए इंद्रप्रस्थ कॉलेज की ही एक पुरानी प्राध्यापिका डॉ. होमाई दस्तूर से संपर्क करके उन्हें प्रिंसिपल का पद संभालने के लिए तैयार कर लिया. डॉ. दस्तूर उस समय बंबई में रहती थीं. मैं अपने ऑनर्स के समय उनकी छात्रा रही ज़रूर थी, जिसकी उन्हें याद रहने का कोई सवाल नहीं था, क्योंकि समय काफ़ी गुजर चुका था और हिंदी ऑनर्स के विद्यार्थियों के लिए अंग्रेज़ी महज़ सबसीडियरी विषय होता था, जिसका निपटारा पहले साल में ही हो जाता था.

मुझे यह ज़रूर याद था कि वे बड़ी स्मार्ट और कड़क स्वभाव की महिला थीं. उनका नाम सुनकर घबराहट-सी ज़रूर हुई, लेकिन यह विश्वास भी जगा कि वे सूरत-सीरत और काबिलियत को महत्त्व देंगी. सर श्रीराम भी, जिन्हें लोग ‘सर’ कम, ‘लाला जी’ ज़्यादा कहते थे, अपनी निष्पक्ष गुणग्राहकता के लिए बहुत प्रसिद्ध थे. इसलिए पूरी नाउम्मीदी का आलम नहीं था. दरअसल हम नौसिखियों की तरह, ख़याली पुलाव पकाने में व्यस्त थे. इस बात की जानकारी ज़रूर हो गई थी कि एम.ए. में प्रथम श्रेणी आने पर, देर-सवेर, कहीं-न-कहीं नौकरी का जुगाड़ बैठ ही जाता है.

विज्ञापन सबसे पहले लेडी श्रीराम कॉलेज का ही आया. उस समय तक परीक्षा-परिणाम नहीं आया था. पेट में खलबली मची थी. इस बात का अंदाजा था कि मॉडरेशन हो चुका है, इसलिए अध्यक्ष और कमेटी के सदस्यों को प्रथम श्रेणी वालों की जानकारी ज़रूर होगी. किसी से पूछने की हिम्मत नहीं थी. मुझे चतुराई सूझी. एक दिन डॉ. साहब के यहां पेश होकर मैंने उन्हें विज्ञापन की सूचना देते हुए बड़ी विनम्रता से पूछा कि अगर वे अनुमति दें तो मैं अप्लाई कर दूं.

‘देवी जी! पहले रिज़ल्ट तो आ जाने दीजिए.’ उत्तर ऐसी निर्विकार मुद्रा और कड़क आवाज़ में मिला कि मेरे होश फ़ाख़्ता हो गए.

मैंने जब इस बात का ज़िक्र जैन साहब से किया तो उतनी ही निर्विकार मुद्रा में उनकी प्रतिक्रिया हुई, ‘तुम्हें जाना ही नहीं चाहिए था. उन्हें जानती नहीं हो क्या?’

डॉ. साहब के दो-टूक रूखे-से जवाब से मैंने लगभग मान लिया था कि मेरा परिणाम बहुत अनुकूल नहीं है, गो कि पर्चे तो अच्छे हुए थे.

परिणाम दो-तीन दिन बाद आ गया. प्रथम श्रेणी पानेवाले कुल चार थे. संतोष का स्थान पहला था, मेरा तीसरा. दोनों के बीच दूसरी की स्थिति एकदम अप्रत्याशित थी. उसने यों भी पढ़ाई छोड़कर गृहस्थी में प्रवेश कर लिया. मैं दुबारा डॉ. साहब के पास गई, फॉर्म भरने के बाद—टेस्टिमोनियल लेने. बड़ा ठंडा उत्तर मिला, ‘कल आकर ले जाना.’ मुद्रा उतनी ही निर्विकार.

पुज़ार् हाथ में आया तो उसकी भाषा भी उतनी ही तटस्थ, औपचारिक, जैसे कोई भी अध्यक्ष किसी भी विद्यार्थी को लिखकर पकड़ा दे! विद्यार्थी-रूप में, विभाग के साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मेरी तत्पर सक्रियता और नियमित उपस्थिति का कोई जि़क्र नहीं. मुझे निराशा नहीं हुई, यह कहना बेईमानी होगी, क्योंकि उससे कहीं बेहतर प्रमाण-पत्र तो मिसेज सिन्हा ने दिया था. मैंने अपनी समझ से निष्कर्ष निकाला कि वे एक बार फिर सिर्फ़ और सिर्फ़ विभागाध्यक्ष हो गए. उनके मन में क्या चल रहा था, इसका अंदाजा तो बाद में हुआ, जब कॉलेज में इंटरव्यू और नियुक्ति का अवसर आया. यह बात अलग है कि इस पूरे प्रसंग ने मुझमें मानव-स्वभाव को समझने-परखने का विवेक पैदा किया, जिसका साथ आनेवाले समय में बराबर बना रहा.

लेडी श्रीराम कॉलेज के खुलने की प्रक्रिया वर्ष 1956 की गर्मियों में शुरू हुई. उस समय शहर में लड़कियों के लिए सिर्फ़ दो कॉलेज थे—इंद्रप्रस्थ और मिरांडा. इंद्रप्रस्थ का नामकरण तो नगर के प्राचीन नाम का आधुनिक अवतरण था. ‘मिरांडा’ का नामकरण विश्वविद्यालय के विख्यात कुलपति सर मॉरिस ग्वायर की बेटी के नाम पर किया गया था. उस समय यह सम्भव था, किसी ने आपत्ति नहीं की, गोकि कॉलेज स्वतंत्र भारत में खुला था. पैसा किसी व्यक्ति या ट्रस्ट का नहीं—विश्वविद्यालय के माध्यम से सरकार का था.

बाद में ऐसे प्रस्तावों के कार्यान्वयन में दिक्कतें आने लगीं. जब विख्यात अर्थशास्त्री डॉ. वी.के.आर.वी. राव दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति हुए तो उन्होंने दौलतराम ट्रस्ट का प्रस्ताव इस शर्त के साथ स्वीकार किया था कि उनके द्वारा खोले जानेवाले कॉलेज का नाम उनकी दिवंगत पत्नी प्रमीला के नाम पर रखा जाए. और कॉलेज ‘प्रेमिला कॉलेज’ के नाम से खुला. यह बाद की बात है कि डॉ. राव के कुलपति न रहने पर ट्रस्ट ने प्रस्ताव पारित करके उसका नाम बदलकर संस्थापक के नाम पर—’दौलतराम कॉलेज’ कर दिया.

पर जब बात लेडी श्रीराम कॉलेज खुलने की उठी तो ऐसी कोई बाधा नहीं थी. कॉलेज जिस ट्रस्ट के प्रस्ताव पर खुला, उसके लिए आर्थिक आधार भी उसी ने मुहैया कराया था. दरअसल सर श्रीराम की हस्ती नगर के उन पूंजीपतियों में थी जिन्होंने उद्योग की दुनिया में ही नहीं, शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ी ख्याति पाई थी. श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स के संस्थापक तो वे थे ही, उसके अलावा इंद्रप्रस्थ कॉलेज, हिन्दू कॉलेज और रामजस कॉलेज की गवर्निंग बॉडीज़ के भी समय-समय पर चेयरमैन या सदस्य रहे. इसके अलावा, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में श्रीराम रिसर्च सेंटर के नाम से एक शोध-केन्द्र की स्थापना की, जो आज भी मुख्य विश्वविद्यालय मार्ग पर स्थित और सक्रिय है. उनके बाद भी यह परम्परा उनके वंशजों ने क़ायम रखी—काफ़ी समय तक. विश्वविद्यालयी शिक्षा में ही नहीं, उस परिवार ने स्कूली शिक्षा में भी रुचि लेकर सर श्रीराम के नाम पर दिल्ली में जो स्कूल खोला, उसकी शाखाएं गुड़गांव में भी लहलहा रही हैं.

अपनी रुचि और संकल्प को साकार रूप देने में लालाजी ने देर नहीं की. उन्होंने आनन-फ़ानन में डॉ. होमाई दस्तूर से सम्पर्क किया. उन्हें दिल्ली बुलाकर कॉलेज के प्रिंसिपल का दायित्व सौंपा और कॉलेज के लिए प्राध्यापिकाओं की भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर दी.

लालाजी उस समय सपरिवार 20 कज़र्न रोड (जो बाद में कस्तूरबा गांधी मार्ग कहलाने लगा) पर रहते थे. कॉलेज के लिए उस समय दरियागंज की कोतवाली के पीछे कमर्शियल स्कूल की इमारत तय कर दी गई. लालाजी अपनी योजना को किसी कीमत पर स्थगित नहीं करना चाहते थे. उस इमारत में जगह सीमित ही थी. बीच में बड़ा-सा आँगन, जिसके चारों तरफ़ गलियारों में बड़े-बड़े क्लास-रूम. बाहर बड़ा-सा फाटक, जिसमें तीन-चार सीढ़ियाँ चढ़ते ही दाएं-बाएं गलियारे शुरू हो जाते थे. दाईं तरफ वाले गलियारे के कोने में एक छोटा कमरा जिसमें प्रिंसिपल का दफ़्तर और उसके कुछ पहले बड़े कमरे में कॉलेज का दफ़्तर. बाईं तरफ कक्षाओं के लिए अपेक्षाकृत बड़े कमरों की कतार शुरू हो जाती थी. पहले साल तो चूँकि दाख़िला बी.ए. के प्रथम वर्ष में ही होना था और संख्या बहुत बड़ी होने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए किसी दिक्कत की आशंका नहीं थी. भविष्य के लिए लालाजी ने मन-ही-मन संकल्प कर रखा था कि कॉलेज से बी.ए. की डिग्री लेनेवाला पहला बैच कॉलेज की नई इमारत से निकलेगा.

कॉलेज में एक ऐसा हॉलनुमा बड़ा कमरा भी था जिसमें स्टेज की सुविधा थी जहां सब प्राध्यापिकाओं और विद्यार्थियों की प्रात: सभा होती थी, जिसे प्रिंसिपल संबोधित करती थीं. बाद में इसी सभा में बारी-बारी से प्राध्यापिकाओं में से कोई एक, विद्यार्थियों के लिए आचरण या ज्ञान-संबंधी किसी चुने हुए उद्धरण का पाठ करती थीं और आवश्यक सूचनाएं दी जाती थीं. यह परम्परा वर्षों चलती रही. अब क्या होता है, नहीं जानती.

समय जून का दूसरा या तीसरा सप्ताह रहा होगा जब प्राध्यापिकाओं की नियुक्ति के लिए इंटरव्यू शुरू हो गए. कॉलेज में नहीं—लालाजी के निवास-स्थान पर. इंटरव्यू का सूचना-पत्र मिला तो प्रतिक्रिया में खुशी से ज़्यादा घबराहट हुई. घर-परिवार में कोई ऐसा नहीं था जो इसमें कोई मार्गदर्शन करता. डॉ. साहब से सीधे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं थी.

मैंने सूचना देने के बहाने दरवाज़ा खटखटाया तो उत्तर में वही निर्विकार तटस्थ-सी प्रतिक्रिया, ‘हां, मुझे पता है…ठीक है..तो फिर आओ इंटरव्यू में.’

मैंने हिम्मत करके जानना चाहा कि कोई खास तैयारी करनी होगी?

फिर वही औपचारिक बेरुख़ी, ‘अलग से क्या करना है! जो पढ़ा-लिखा है, वही काम आएगा.’

मेरे फ़रिश्ते भी यह अनुमान नहीं लगा सकते थे कि उनके मन में क्या चल रहा है. मैंने लौटकर एक बार फिर वही नोट्स उलटे-पलटे जो परीक्षा के लिए तैयार किए थे और बाकी भाग्य पर छोड़ दिया.

नियत तिथि और समय पर कज़र्न रोड पहुंचे तो उस कमरे में पहुंचते ही—जहां अभ्यर्थियों को बैठाया गया था—पैर तले की ज़मीन खिसक गई. कुल मिलाकर छब्बीस लोग आए थे. अधिकांश हमसे पहले पहुंच गए थे, क्योंकि बाहर से आनेवालों की संख्या ज़्यादा थी. दिल्ली से तो बस हम दो ही थे—मैं और संतोष. आपसी बातचीत में पता लगा कि उन भांति-भांति की मूर्तियों में दो-तीन तो कॉलेजों की प्रिंसिपल ही थीं और शेष में से अधिकांश को दो-चार साल पढ़ाने का अनुभव था. ज़ाहिर है, उम्र में सभी हमसे बड़ी और तजुर्बेकार. हमने मान लिया कि हमारा कोई चांस नहीं है. इस बोध ने हमें एक हद तक चिन्तामुक्त भी किया. भविष्य के लिए इंटरव्यू का अनुभव ही एकमात्र उपलब्धि होती दिखाई पड़ रही थी.

आवाज़ लगनी शुरू हुई तो एक साथ दो नाम पुकारे गए. व्यवस्था यह थी कि जब पहले का साक्षात्कार चल रहा हो तो दूसरा कमरे के बाहर बनी गैलरी में कुर्सी पर विराजमान रहकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करे. कारण, उस विशाल कोठी में कमरों के बीच तो दूरी थी ही, उस हॉलनुमा कमरे में दरवाज़े से चलकर समिति के सामने की कुर्सी पर पहुंचने में भी खासा समय लगता था. इस व्यवस्था से समिति के समय की कुछ बचत हो जाती थी. मेरा नंबर चौबीसवां था. मुझे लगा कि सूची में क्रम, आनेवालों की योग्यता के हिसाब से तय किया गया होगा. इसलिए मन-ही-मन अपनी औकात और हैसियत का भी लगभग निश्चय हो गया. जो अंदर जाता, बाकी बचे बेसब्री से उसकी प्रतीक्षा करते. लौटने पर भीतर के माहौल और प्रश्नों की प्रकृति के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश करते. ज़ाहिर है, पूरा सच कोई बोलना नहीं चाहता था. ठीक-ठीक जानकारी सिर्फ़ बोर्ड के सदस्यों की गिनती और संरचना की हुई.

गनीमत यह थी कि हॉल के बाहर बैठे व्यक्ति को यह तो पता लगता था कि बातचीत कब जारी और कब खत्म हुई, ब्यौरा समझ में नहीं आता था. किस आवेदक के साथ समिति ने कितना समय लगाया, इससे भी उसकी स्थिति का कुछ-कुछ अंदाजा लगाने की नाकाम कोशिश में लगे थे हम सब. बड़ी व्यग्रता और कौतूहल की मिली-जुली मन:स्थिति में प्रतीक्षा की घड़ियां कट रही थीं.

सबसे बड़ा आश्चर्य तो प्रतीक्षा कर रहा था कमरे के भीतर. आवेदक की कुर्सी के ठीक सामने, अर्धचन्द्राकार खिड़की के नीचे बैठने की जो व्यवस्था थी, उसमें बीचोबीच श्रीमती दस्तूर और सर श्रीराम विराजमान थे. दाएं-बाएं, क्रमश: कोषाध्यक्ष, शहर के एक और रईस लाला हनुमान प्रसाद और डॉ. नगेंद्र एक ओर, और दूसरी ओर कला-संकाय के तात्कालिक डीन हिस्ट्री के प्रो. विशेश्वरप्रसाद के बगल में एक और सज्जन, जिन्हें मैं नहीं पहचानती थी. सब भारी-भरकम, चुस्त-दुरुस्त वेशभूषा में. इनमें सबसे क्षीणकाय, सामान्य-सा सफ़ेद मलमल का कुरता और पाजामा पहने सर श्रीराम. उनकी लगभग पारदर्शी गेहुएँ रंग की त्वचा के पीछे के हाड़-मांस के ढाँचे का बख़ूबी अंदाजा लगाया जा सकता था. मुद्रा बेहद गम्भीर, नज़र लक्ष्यभेदी, एक ही निक्षेप में सामने वाले को ताड़ लेने की क्षमता से लैस.

बैठते ही खोजी नज़र से वे सामने वाले का जायज़ा लेते. आवेदन-पत्र में भरी कुछ बातों के बारे में खुलासा कराते और फिर यदि इच्छा हुई तो विषय-संबंधी एकाध सवाल पूछकर बात आगे बढ़ा देते. मसलन एक महिला से उन्होंने कवि सूरदास की एक पंक्ति उद्धृत करके कहा कि अकबर के नौ रत्नों में से सात ने इस पंक्ति के अलग-अलग अर्थ बताए थे, आप कितने बता सकती हैं? ज़ाहिर है, उत्तर देनेवाले की सिट्टी-पिट्टी गुम. बात दो से आगे नहीं बढ़ सकी, वह भी खींच-खांचकर. ऐसे प्रश्नों से वे व्यक्ति के ज्ञान की नहीं, उसकी हाजि़रजवाबी और आत्मविश्वास की थाह लेने की कोशिश करते थे.

मुझसे उन्होंने कोई असुविधाजनक सवाल नहीं पूछा, इसलिए अब याद भी नहीं. मुझे इतने वर्षों बाद भी तीन संवाद याद हैं. और बातों के बीच डॉ. नगेंद्र ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा’ की प्रसिद्ध द्विपदी, ‘अबला जीवन…’ के निहितार्थ पर बात करते हुए सहसा कहा कि ‘अगर मैं इसका क्रम उलटकर कहूँ, ‘आँखों में है दूध और आँचल में पानी’ तो इसकी व्याख्या किस रूप में करोगी?’ यह सवाल इतना अप्रत्याशित और असुविधाजनक था कि उसका उत्तर सोच-विचार कर तो दिया जा सकता था, सहसा नहीं. ज़ाहिर है, मेरी ज़बान लड़खड़ा गई. मैंने जो उल्टी-सीधी व्याख्या की, उससे मुझे खुद ही संतोष नहीं था. बहरहाल, संकटमोचक का काम किया डॉ. विशेश्वरप्रसाद ने. गोकि नियत मुझे उबारने की नहीं और गहरे गड्ढे में धकेलने की थी. उन्होंने सहसा अंग्रेज़ी में मुझसे मेरी हिन्दी-इतर, विशेषकर अंग्रेज़ी साहित्य की जानकारी के बारे में पूछताछ शुरू की. वे नहीं जानते थे कि मेरी स्कूली शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम से हुई थी इसलिए मुझे उनके सवाल का न तो अंग्रेज़ी में जवाब देने में दिक्कत हुई, न हाल में ही पढ़े किसी उपन्यास का उल्लेख करने में. मैंने शायद थॉमस हार्डी के किसी प्रसिद्ध उपन्यास का नाम लिया, जो सम्भवत: उन्होंने नहीं पढ़ा था, इसलिए वे मैदान छोड़ गए.

आखिरी जिज्ञासा प्रिंसिपल डॉ. दस्तूर की थी. वे जानना चाहती थीं कि अपनी नृत्य-शिक्षा के बलबूते पर मैं कॉलेज की सांस्कृतिक गतिविधियों की जि़म्मेदारी ले सकूँगी? मैंने बड़े उत्साह से हामी भर दी. ज़ाहिर है, इस उत्तर से मुझमें उनकी अतिरिक्त दिलचस्पी पैदा हो गई.

इस पूरी प्रक्रिया से गुज़रकर जब वापस लौटना हुआ तो इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि जो जैसा हुआ, उसे ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ किस कोटि में रखा गया होगा. इंटरव्यू देने का वह जीवन में पहला अनुभव था. सफलता की कोई विशेष उम्मीद न होने पर भी नतीजा जानने की उत्कंठा तो बनी ही हुई थी. डॉ. साहब से कुछ पूछने में सदा की तरह संकोच आड़े आता रहा, पर बहुत लंबा इन्तज़ार नहीं करना पड़ा. तीसरे ही दिन नियुक्ति का संक्षिप्त-सा सूचना-पत्र हाथ में आ गया—निश्चित समय और स्थान पर उपस्थित होकर ज्वाइन करने के आदेश के साथ.

दिल बल्लियों उछलने लगा. कल्पना में यह बात दूर-दूर तक नहीं आई थी कि पहले ही प्रयास में हाथोंहाथ इस तरह नियुक्ति हो जाएगी. तब तक अपनी स्लेट बिल्कुल कोरी थी. नियुक्तियों से जुड़ी उठापटक, सिफ़ारिशों की महत्ता और शिक्षा-तंत्र की अपनी राजनीति से जुड़ी कोई इबारत नहीं लिखी थी उस पर. बस, हम थे, हाथ में नियुक्ति-पत्र था और इस बात का संतोष और उल्लास कि सब कुछ इतने अयाचित ढंग से घटित हो गया. मुझे केवल दो व्यक्तियों के प्रति आभार प्रकट करना ज़रूरी लगा—डॉ. नगेन्द्र और डॉ. सावित्री सिन्हा. डॉ. साहब के प्रति फर्ज़ समझकर और डॉ. सिन्हा के प्रति उनके मन में अपने प्रति स्नेहशीलता के कारण. डॉ. साहब ने तो लगभग निरपेक्ष मुद्रा में मेरा आभार स्वीकार करके चलता किया, पर डॉ. सिन्हा की प्रतिक्रिया बेहद उत्साहवर्धक थी. वे बहुत प्रसन्न थीं. उन्हीं से बातचीत के दौरान जानकारी मिली कि कॉलेज में नियुक्ति एक नहीं, दो हुई हैं. दूसरी नियुक्ति संतोष की हुई है. बड़े सहज ढंग से उन्होंने यह भी खुलासा कर दिया कि नियुक्तियां क्रमवार हुई हैं—पहले स्थान पर मेरी, दूसरे पर संतोष की.

ज़ाहिर है, इस क्रम से संतोष को निराशा हुई, क्योंकि परीक्षा में तो प्रथम स्थान उसने हासिल किया था. कुछ दिनों तक संतोष के मन पर इस बात का बोझ रहा, जो बेरुख़ी और उदासी की परत के रूप में उसके चेहरे पर लगभग चस्पा हो गया था. बात जब डॉ. सिन्हा के कान तक पहुँची तो उन्होंने कुछ अल्हड़-सी मुद्रा में टिप्पणी करते हुए कहा, ‘इसमें इतना बुरा मानने की क्या बात है? अगर मैं होती तो मैं भी तुम्हें ही लेती कॉलेज में. थोड़े नंबर ज़्यादा होने से क्या होता है!’

बाद में यह पता लगा कि डॉ. नगेंद्र तो उसी को पहले स्थान पर कराना चाहते थे. उन्होंने काफ़ी प्रयत्न भी किया. पर लालाजी और प्रिंसिपल मेरे नाम पर दृढ़ता से अड़े रहे, तब समझौता इस विकल्प पर हुआ कि कम-से-कम दूसरी जगह पर अजमेर से आई कान्ता मारवाह की बजाय कॉलेज संतोष को लेने को तैयार हो जाए. इस प्रसंग का ब्यौरा जानते ही मेरे दिमाग में डॉ. नगेंद्र के भीतरी असमंजस की गुत्थी सुलझ गई. अपने मित्र की इस अनाथ-सी बहन के प्रति उनके करुणा-संवलित सरोकार को समझा जा सकता था जो निबंध के पर्चे में अंक देने से लेकर उसकी नियुक्ति तक बराबर बना रहा.

(साभार राजकमल प्रकाशन)