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दर्शक बनती इस दुनिया के बीच हमें चाह है पाठक की…

हिंदी पत्रकारिता पर सेलेब्रिटी एंकर का, टीवी-यूट्यूब के दमकते चेहरों का वर्चस्व है. यह पत्रकारिता पाठक नहीं, दर्शक को संबोधित है. हमने अपने लिये एक भिन्न राह चुनी है. हम खोजी और दस्तावेज़ी पत्रकारिता के ज़रिये पाठक तक पहुंचना चाहते हैं.

आशुतोष भारद्वाज
31/05/2025
मीडिया
Illustration: The Wire, with Canva
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इस महीने द वायर के दस बरस पूरे हुए हैं. इन वर्षों का हमारा काम आपके सामने है. उस पर कुछ कहने से बचते हुए मैं इस अवसर पर पिछले वर्ष के अनुभवों को साझा कर रहा हूं.

ठीक एक बरस पहले द वायर हिंदी से जुड़ते वक्त, अंग्रेजी पत्रकारिता से हिंदी में प्रवेश करते वक्त मेरी प्राथमिकताएं स्पष्ट थीं. पहला, द वायर हिंदी खोजी, दस्तावेज़ी और ज़मीनी पत्रकारिता का गढ़ बने.

दूसरा, हम लिखित भाषा में पत्रकारिता करें. हमें दर्शक से पहले पाठक चाहिए.

जिस अंग्रेजी जगत से मैं ताल्लुक रखता था, वहां उत्कृष्ट पत्रकारिता के पैमाने यही हुआ करते थे. दुर्गम भूगोल में पहुंचने का दुस्साहस, ख़ुफ़िया दस्तावेज़ों को हासिल कर उन्हें निचोड़ सकने की काबिलियत, जटिल विषयों को सरल लेकिन सशक्त गद्य में अभिव्यक्त करने की योग्यता—इन गुणों का उस जगत में बड़ा मोल था.

अंग्रेजी के टीवी सितारे भी थे, लेकिन हमारा न्यूज़रूम उन्हें कोई ख़ास महत्त्व नहीं देता था. बेचेहरा बाइलाइन का आनंद सेलेब्रिटी या इन्फ्लुएंसर की चौंध से कहीं गहरा और स्थायी था.

हिंदी पत्रकारिता में एकदम भिन्न, दरअसल विपरीत अनुभव हुआ. हिंदी के न्यूज़रूम आठ सौ शब्दों की ख़बर के बाद विराम लगा देना चाहते हैं, जबकि अंग्रेजी में आठ हजार शब्दों के लॉन्ग-फॉर्म का जलवा मचा हुआ है. दरअसल, हिंदी पत्रकारिता पर दमकते चेहरों का मालिकाना हक़ है. देश के सर्वाधिक बिकने वाले अखबार हिंदी में प्रकाशित होते हैं. उनकी प्रसार संख्या बेहिसाब है, लेकिन अगर हिंदी पत्रकारिता की कुछ प्रमुख संज्ञाओं को गिना जाये, तो आम जनता से लेकर प्रबुद्ध वर्ग, सभी शायद सिर्फ़ टीवी-यूट्यूब एंकर का नाम लेंगे. आप अपनी पसंद और राजनीति के अनुसार नाम चुन सकते हैं, लेकिन जो नाम आपकी ज़ुबान पर तुरंत आएंगे, शायद वे सभी दृश्य माध्यम के निवासी होंगे.

इसके विपरीत यही कवायद अगर अंग्रेज़ी पत्रकारिता को लेकर हो, तो कुछेक चर्चित एंकर के अलावा वे बेशुमार बाइलाइन होंगी जिन्हें आप अख़बारों और पत्रिकाओं में पढ़ते हैं, लेकिन जिनमें से कइयों के आपको चेहरे भी नहीं पता. अंग्रेजी में ऐसे बेशुमार पत्रकार हैं जिन्हें आप सिर्फ़ उनकी ख़बरों के लिये जानते हैं, जो यूट्यूब पर ज्ञान नहीं बांचते. वे जोख़िम उठाकर सत्ता के तंत्र में सेंध लगाते हैं, दस्तावेज़ी और खोजी ख़बरें लिखते हैं, जिनकी इन्वेस्टिगेटिव ख़बरों की प्रतियां संसद और विधानसभाओं में लहरायी जाती हैं, राजनीतिक दलों की प्रेसवार्ता में उद्धृत होती हैं.

साथ ही, अंग्रेज़ी का एक बड़ा वर्ग ऐसा होगा जो अपने प्रिय पत्रकारों की सूची में किसी भी एंकर को नहीं रखेगा. क्योंकि उनका नाम भले बड़ा हो, सोशल मीडिया पर उपस्थिति भीषण हो, अंग्रेजी की प्रिंट पत्रकारिता अकड़ कर चलती है. उनके पाठक उनके काम की प्रतीक्षा करते हैं, उसे चहक कर प्रसारित करते हैं.

जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी, मेरे संपादक कहा करते थे कि अगर कच्चा काम करना है या हास्यास्पद दिखाई देना है, तो टीवी की नौकरी बेहतर है.

हिंदी के संख्या-बल का कमाल 

इसके विपरीत टीवी-यूट्यूब पत्रकार हिंदी समाज के मुकुट हैं. उन्हें ख़ुफ़िया दस्तावेज़ जुटाने का परिश्रम नहीं करना होता, किसी के कोट्स लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती. वे अंग्रेजी की कोई बड़ी ख़बर उठाते हैं, उसे रसीली हिंदी में कैमरे के सामने पढ़ देते हैं. कई बार ये अंग्रेजी के उस रिपोर्टर को अपने ‘शो’ में बुलाते हैं. उस ख़बर पर उससे दो-चार बात कर लेते हैं.

चूंकि हिंदी के एंकर की सोशल मीडिया पर महाकाय उपस्थिति है, और अंग्रेजी का पाठक वर्ग हिंदीभाषी दर्शक की संख्या में बहुत कम है (हिंदी साठ करोड़ से अधिक लोगों की पहली भाषा है, साथ ही देश भर के लोग बड़े आराम से बोली जा रही हिंदी समझ लेते हैं), यह ख़बर एक झटके से कई गुना अधिक लोगों तक पहुंच जाती है.

जनस्मृति में अब यह ख़बर उन एंकर महोदय की बन जाती है. खुद जिस पत्रकार ने यह ख़बर महीनों परिश्रम के बाद लिखी थी, वह एंकर को सार्वजनिक धन्यवाद देते हैं—‘अपने शो में मेरी ख़बर को जगह देने के लिये शुक्रिया.’

हिंदी के संख्या-बल की यह अद्भुत उपलब्धि है.

दूसरा, जब यह पत्रकारिता ज़मीन पर जाती है, अक्सर किसी वायरल वीडियो की तलाश में रहती है. किसी चौपाल या मोहल्ले में किसी स्थानीय ग्रामीण के चुटीले कथन पर एक एपिसोड तैयार हो जाता है, जो पूरे दिन सोशल मीडिया पर छाया रहता है. इस तरह यह पत्रकारिता देहात को सर्कस और नागरिक को जोकर में तब्दील कर देती है.

यहां उद्देश्य अंग्रेजी पत्रकारिता का गुणगान नहीं. अंग्रेजी जगत की अपनी विकट समस्याएं हैं, स्याह गलियारे हैं, आत्मसमर्पण हैं. यहां मुद्दा यह कि जिस हिंदी समाज ने एक समय देश के कुछ सबसे सम्मानित समाचार-पत्र और पत्रिकाओं को जन्म दिया था, वह अब छपे हुए शब्द को त्यागकर दृश्य माध्यम की ओर मुड़ चुका है. वीडियो पत्रकारिता भी उत्कृष्ट विधा हो सकती है. कैमरा अपूर्व रचनात्मक औजार है, लेकिन हिंदी में इसका प्रयोग अमूमन रीट्वीट और लाइक्स बटोरने के लिये हो रहा है.

इस परिघटना का हिंदी समाज, इसकी राजनीति और इसके लोकतंत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इसका आकलन समाजशास्त्री और इतिहासकार करेंगे.

 लेकिन हमने इस रास्ते से दूर जाकर पत्रकारिता की है. इस दर्शक होते समाज में, बीस सेकिंडी रील के दीवाने हुए जा रहे समाज में हम उस इंसान तक पहुंचना चाहते हैं जो ढाई हजार शब्दों को एक गहरी सांस के साथ अपने भीतर समेटना चाहता है.

हमने पिछले एक साल में बेशुमार इन्वेस्टिगेटिव ख़बरें की हैं–अडानी, सरकारी नौकरियों में भर्ती घोटाले, अग्निपथ योजना की विफलता, भाजपा की करीबी गुजराती कंपनी का भर्ती घोटालों में संलिप्तता, प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली संस्था में अनियमितताएं, स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड में चल रहा भ्रष्टाचार, रॉ एजेंट विकास यादव की पृष्ठभूमि इत्यादि, इत्यादि.

हमें गर्व है कि पिछले बरस हमारे पाठकों में अच्छी वृद्धि हुई है, लेकिन हमें यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं कि हमारे हिंदी वीडियो हमारी खबरों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रसारित और चर्चित होते हैं. हमारा वीडियो पर ध्यान कम है, ख़बरों पर बहुत अधिक—लेकिन हमारे दर्शक कहीं अधिक हैं, पाठक कम.

यहां तक कि हमारी किसी बड़ी ख़बर के बाद हमारे शुभचिंतक अक्सर हमसे कहते हैं—‘इसका वीडियो भी कीजिए न’. अर्थात, हिंदीभाषी जगत ख़बरों को पढ़ना कम, देखना अधिक चाहता है. इसका एक प्रमाण यह भी है कि जब हम अपनी हिंदी ख़बर को अंग्रेजी में अनुवाद कर पुनर्प्रकाशित करते हैं, उसका प्रसार झटके से बढ़ जाता है.

इसके बावजूद हम छपे हुए शब्द से आस लगाए बैठे हैं. यह मकान न छूटता है, न साथ छोड़ता है. इस आस के साथ हम आपको हिंदी पत्रकारिता दिवस की मुबारकबाद देते हैं.

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