कर्नाटक: कांग्रेस की राजनीति में फंसा सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों का मुआवज़ा

कर्नाटक में मंगलुरु के एक गांव में बीते मई में हुए सांप्रदायिक हमले में कलंदर शफी नाम के एक श्रमिक गंभीर रूप से घायल हुए और उनके सामने उनके दोस्त की हत्या कर दी गई. घटना के बाद से वे अपने गांव नहीं लौट सके और अब तक उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं मिला. इस बारे में कांग्रेस सरकार की चुप्पी से नाराज़गी बढ़ रही है.

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बाएं से- कलंदर शफी, अब्दुल रहमान और कर्नाटक का दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र.

दक्षिण कन्नड़: मंगलुरु के एक निजी अस्पताल के आईसीयू में 10 दिन से ज़्यादा समय बिताने के बाद, 30 वर्षीय कलंदर शफी कहते हैं कि अब उन्हें अपने गांव कोल्टमजालु लौटने का ख़याल भी डरा देता है.

शफी के मुताबिक, जिस गांव में वे पले-बढ़े, जिन लोगों के साथ काम किया — वही लोग अब उनकी जान के पीछे पड़े हैं. शफी एक हिंसक सांप्रदायिक घटना में बचे हुए पीड़ित हैं, जो 27 मई को कोल्टमजालु में हुई थी. उस घटना के बाद से वे अपने गांव छोड़कर, अपनी बहन के पास 20 किलोमीटर दूर अडदूर गांव में रह रहे हैं.

शफी बताते हैं कि उनके सहकर्मी और बचपन के दोस्त अब्दुल रहमान की हत्या उनके सामने कर दी गई. ‘यह घटना बार-बार मेरी आंखों के सामने आ जाती है,’ वे कहते हैं. ‘आज भी मुझे यकीन नहीं होता कि दीपक पुजारी (हमलावरों में से एक) हम पर हमला कर सकता है. हम उसे बचपन से जानते थे, वह और मैं कई सालों से एक साथ राजमिस्त्री का काम करते थे,’ शफी कहते हैं.

अब्दुल रहमान कोल्टमजालु जुम्मा मस्जिद के सचिव थे और निर्माण कार्य के लिए कच्चा माल ढोने वाली एक पिक-अप गाड़ी चलाते थे.

शफी और पुलिस स्टेशन बंटवाल में दर्ज एफआईआर के अनुसार, 27 मई को दीपक पुजारी ने रहमान को अपने घर में निर्माण कार्य के लिए बुलाया था. रहमान ने शफी से साथ चलने को कहा, और दोनों निर्माण सामग्री के लिए रेत लेकर दीपक के घर की ओर रवाना हुए.

‘रास्ते में हमें दीपक की मां मिलीं, हमने उन्हें भी घर छोड़ने की पेशकश की.’ शफी बताते हैं.

जब वे दीपक के घर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहां पहले से कुछ लोग जमा थे. वही लोग बाद में हमलावर साबित हुए. उन्होंने जल्दी ही रहमान से झगड़ा शुरू कर दिया और देखते ही देखते उसे बेरहमी से काट डाला.

शफी भी हमले में बुरी तरह घायल हुए — उनके बांह, सीने, पेट और कमर पर तलवारों से कई वार किए गए. ‘मुझे पता था कि अगला निशाना मैं ही हूं. मैं उस घायल हालत में तीन किलोमीटर से ज़्यादा दौड़ा.’ शफी कहते हैं.

इस मामले के मुख्य आरोपी (दीपक पुजारी) मज़दूर परिवार से हैं और किराए के मकान में रहते हैं. पुजारी और अन्य आरोपी ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) से आते हैं. शफी के मुताबिक, इन सभी का संबंध कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी संगठन बजरंग दल से है.

डॉक्टरों का कहना है कि शफी को हाथों में रॉड डलवानी पड़ी है, और अब उन्हें फिर से मज़दूरी के काम पर लौटने में कम से कम दो साल लगेंगे. शफी मजदूरी करके ही अपने परिवार को पाल रहे थे. अब उन्हें अपने गांव वापस जाने में भी डर लग रहा है.

शफी अब अडदूर गांव रह रहे हैं. वह कहते हैं, ‘यहां थोड़ा सुरक्षित लगता है क्योंकि वहां ज़्यादातर घर मुसलमानों के हैं.’ वे बताते हैं, ‘कोल्टमजालु में हम मुसलमान कम संख्या में हैं और मेरा घर ऐसे इलाक़े में है, जहां चारों तरफ हिंदू समुदाय के लोग रहते हैं.’

दंगों, सांप्रदायिक हिंसा और जातीय हमलों के बाद पीड़ितों का अपने मूल घरों को छोड़ने को मजबूर होना कोई नई बात नहीं है — यह एक आम चलन बन गया है.

घटना के बाद से शफी के पास न कोई नौकरी है, न कोई घर जिसमें वह लौट सकें, और न ही राज्य सरकार की ओर से कोई मदद मिली है.

हालांकि पुलिस ने दीपक पुजारी समेत आठ लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन इसके बाद न पुलिस और न ही कांग्रेस सरकार की ओर से शफी से कोई संपर्क किया गया है.

‘हमारा परिवार कांग्रेस नेताओं से मुआवज़े की गुहार लगा रहा है. लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं मिला है.’ शफी कहते हैं.

सरकार और पार्टी दोनों की नाकामी

अप्रैल और मई के बीच हेट क्राइम से जुड़े तीन अलग-अलग मामलों में तीन लोगों की हत्या हुई और एक व्यक्ति — शफी — गंभीर रूप से घायल हुआ. मारे गए लोगों में शामिल हैं:

मोहम्मद अशरफ, एक मानसिक रूप से अस्थिर मुस्लिम व्यक्ति, जो केरल के वायनाड क्षेत्र से थे और मेंगलुरु शहर में कबाड़ बीनने का काम करते थे

सुहास शेट्टी, एक हिंदुत्व कार्यकर्ता जिनके खिलाफ नफ़रत फैलाने के कई मामले दर्ज हैं, जिनमें 2022 में मोहम्मद फाज़िल की हत्या का आरोप भी शामिल है

अब्दुल रहमान, जिनकी हत्या कोल्टमजालु गांव में की गई.

ये सभी घटनाएं साफ़ तौर पर हिंसा के मामले हैं, इसके बावजूद कांग्रेस सरकार ने किसी भी पीड़ित को मुआवज़ा देने की घोषणा नहीं की है. अब्दुल रहमान के भाई मोहम्मद हनीफ कहते हैं कि राज्य सरकार की ओर से कोई भी प्रतिनिधि अब तक परिवार से मिलने नहीं आया है.

हनीफ ने द वायर से कहा, ‘पुलिस बयान लेने आई, बस वही. न कोई विधायक आया, न कलेक्टर यह देखने कि परिवार कैसे जी रहा है.’ हनीफ भी पिकअप वैन चलाते हैं.

इस घटना पर कांग्रेस की ओर से त्वरित कार्रवाई न होने के कारण मुस्लिम समुदाय में असंतोष फैल गया. घटना के कुछ ही समय बाद लगभग 200 कांग्रेस कार्यकर्ताओं, जिनमें मुस्लिम समुदाय के लोग और पूर्व मेयर के. अशरफ भी शामिल थे, ने सामूहिक विरोध के रूप में इस्तीफा दे दिया.

अशरफ ने घटना के बाद द वायर से कहा, ‘कांग्रेस सत्ता में इसलिए आई क्योंकि इस क्षेत्र और पूरे राज्य के मुसलमानों ने एकजुट होकर पार्टी को वोट दिया. यह सोच-समझकर लिया गया फैसला था, ताकि दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता में लौट न सकें और और ज़्यादा तबाही न मचाएं. लेकिन देखिए, कांग्रेस सरकार के राज में भी क्या हो रहा है?’

सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास

दक्षिण कन्नड़ इलाक़ा हमेशा से सांप्रदायिक रूप से तनावग्रस्त रहा है. इस क्षेत्र में हिंसा और नफ़रत से जुड़े मामलों की लगातार निगरानी कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता शब्बीर अहमद बताते हैं कि नाराज़गी केवल पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समुदाय में है.

शब्बीर उन जांचकर्ताओं में शामिल थे जिन्होंने हाल ही में मोहम्मद अशरफ की हत्या पर एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट प्रकाशित की. केरल निवासी 30 वर्षीय अशरफ को 27 अप्रैल को कुडुपु गांव में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार दिया गया.

यह इलाका वामंजूर, मैंगलोर ग्रामीण पुलिस थाने के अंतर्गत आता है. हत्या के तुरंत बाद कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि अशरफ ने ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा लगाया था, जिससे मानो इस भीड़ की हत्या को सही ठहराने की कोशिश की गई.

चौंकाने वाली बात यह रही कि इन असत्यापित मीडिया रिपोर्ट्स को कांग्रेस के नेता, यहां तक कि राज्य के गृह मंत्री जी. परमेश्वर और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी दोहराया.

सिद्धारमैया ने घटना के बाद कहा था, ‘अगर ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा लगाया गया, तो वह ग़लत है, कोई भी हो. जांच चल रही है, केस दर्ज हुआ है. रिपोर्ट आने दीजिए, तभी पता चलेगा कि किसके खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए. अगर कोई पाकिस्तान के पक्ष में बोले, तो वह देशद्रोह है.’

हालांकि, कर्नाटक की पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल), एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) और ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस (AILAJ) ने जो संयुक्त जांच की, उसमें यह दावा पूरी तरह झूठा पाया गया कि अशरफ ने कोई नारा लगाया था. कांग्रेस नेताओं ने बिना तथ्य जांचे मीडिया के दावों को दोहराया.

असलियत में, आरोपी युवक मंदिर के पास बने एक मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे, जब उन्होंने अशरफ को मंदिर के पास पानी पीते हुए देखा और बिना किसी उकसावे के हमला कर दिया.
मैंगलोर पुलिस, जिन पर कार्यकर्ताओं ने सांप्रदायिक पूर्वाग्रह का आरोप लगाया है, ने पहले सिर्फ़ एक ‘असमयिक मृत्यु रिपोर्ट ‘ दर्ज की थी. सही एफआईआर कई दिनों बाद तब दर्ज की गई जब दबाव बढ़ा.

इस घटना के बाद मैंगलोर पुलिस कमिश्नर अनुपम अग्रवाल का उनकी संदिग्ध भूमिका के चलते तबादला कर दिया गया था.

शब्बीर कहते हैं कि जांच सिर्फ एक हिस्सा है, असली संकट तो यह है कि ‘इन परिवारों की आर्थिक हालत बेहद कमजोर है और ये लोग उन्हीं पुरुषों की कमाई पर निर्भर थे जिनकी हत्या हुई या जो घायल हुए.’

मुआवजे की राजनीति

तीन साल पहले, जब भाजपा की सरकार कर्नाटक में सत्ता में थी, तब भी इस क्षेत्र में भीड़ की हिंसा (Mob Violence) की ऐसी ही घटनाएं हुई थीं. उस समय, सरकार ने मनमाने तरीके से केवल प्रवीण नेत्तारू के परिवार को मुआवज़ा दिया था, जो 2022 में कथित तौर पर अब प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के सदस्यों द्वारा मारे गए थे.
प्रवीण नेत्तारू भाजपा युवा मोर्चा के सदस्य थे.

भाजपा सरकार ने बाक़ी पीड़ितों के परिवारों को मुआवज़ा देने की मांगें नज़रअंदाज़ कर दीं. फिर मई 2023 में जब कांग्रेस सत्ता में आई, तब इन पीड़ितों के परिजनों को 25 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया गया. इनमें तीन मुस्लिम युवक और एक बजरंग दल से जुड़े हिंदू व्यक्ति शामिल थे.

भीड़ हिंसा और नफ़रत से जुड़े अपराधों में मुआवज़े का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के तहसीन पूनावाला केस से जुड़ा है. इसमें अदालत ने निर्देश दिया था कि हर राज्य को न केवल भीड़ हिंसा को गंभीरता से लेना चाहिए, बल्कि पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा भी देना चाहिए.

हालांकि, कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चूंकि सुवास शेट्टी, जो बजरंग दल से जुड़े थे, की भी मौत ऐसी ही नफ़रत की घटना में हुई थी, इसलिए कांग्रेस सरकार मुआवज़ा देने में हिचक रही है.
भाजपा पहले ही शेट्टी के परिवार को पार्टी की ओर से 25 लाख रुपये दे चुकी है, और उनका मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया गया है.
जबकि मुस्लिम युवकों की हत्याओं की जांच अभी राज्य पुलिस ही कर रही है.

एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा, ‘कांग्रेस नहीं चाहती कि वह एक ऐसे हिंदुत्ववादी व्यक्ति को मुआवज़ा देती दिखे, जिस पर खुद भीड़ हिंसा का आरोप है.’

लेकिन शब्बीर अहमद का कहना है कि इन सब राजनीतिक खेलों के बीच असली नुक़सान पीड़ितों के परिवारों का हो रहा है.

जब इस मामले पर प्रतिक्रिया लेने के लिए राज्य विधानसभा अध्यक्ष और मंगलुरु के विधायक यूटी खाडर से कई बार कॉल और मैसेज किए गए, तो कोई जवाब नहीं मिला. अगर उनका जवाब आता है, तो यह रिपोर्ट अपडेट की जाएगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)