नागरिक संगठनों की सरकारों से अपील: माओवाद के नाम पर आदिवासी इलाकों में सैन्य दमन बंद हो

झारखंड के विभिन्न संगठनों ने एक साझा बयान में आरोप लगाया है कि सरकार माओवाद ख़त्म करने के नाम पर आदिवासियों की ज़मीन, संसाधनों और लोकतांत्रिक विरोधों को निशाना बना रही है. बयान में केंद्र और राज्य सरकारों से तुरंत सैन्य कार्रवाइयों को रोकने और शांतिवार्ता की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की गई है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: फेसबुक/TribalAffairsIn)

नई दिल्ली: झारखंड के विभिन्न जन संगठनों, राजनीतिक दलों और नागरिकों ने शनिवार (5 जुलाई) को एक साझा बयान जारी कर बस्तर, झारखंड और देश के अन्य आदिवासी बहुल इलाकों में ‘माओवाद समाप्ति के नाम पर हो रहे सैन्य अभियान, दमन और मानवाधिकार उल्लंघनों’ पर गहरी चिंता जताई है.

उन्होंने इन कार्रवाइयों को आदिवासियों के जल, जंगल, ज़मीन और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले की तरह देखा है और केंद्र व राज्य सरकारों से इस दमन को तुरंत रोकने की मांग की है.

बयान जारी करते हुए कहा गया कि इसे फादर स्टेन स्वामी की पुण्यतिथि के अवसर पर जारी किया जा रहा है, जो आदिवासियों और उनकी ज़मीन, आज़ादी और आजीविका के अधिकार के प्रति अडिग थे. एल्गार परिषद मामले में यूएपीए के तहत गिरफ़्तार आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी का मेडिकल आधार पर ज़मानत का इंतज़ार करते हुए 5 जुलाई 2021 को मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया था.

‘आदिवासियों पर निशाना’

वक्तव्य पर कुल 41 संगठनों एवं 88 व्यक्तियों के हस्ताक्षर हैं. इसमें आरोप लगाया गया कि सरकार का रवैया केवल माओवादियों के प्रति कठोर नहीं है, ‘बल्कि खनन, विस्थापन और सैन्यीकृत कैंपों के विरोध में खड़े शांतिपूर्ण आदिवासी आंदोलनों को भी कुचलने वाला है.’ 

बयान में कहा गया कि देश के संसाधन संपन्न क्षेत्रों में दशकों से आदिवासियों और उनके सहजीवी समुदायों पर माओवाद विरोधी अभियान के नाम पर हिंसा हो रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह अभियान और ज़्यादा तीव्र और संगठित हो गया है. जनवरी 2024 में बस्तर में शुरू किए गए ऑपरेशन कगार में अब तक लगभग 500 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें माओवादी लड़ाकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में आम आदिवासी नागरिक भी शामिल हैं. इन अभियानों में मारे गए लोगों के लिए सुरक्षा बलों को करोड़ों रुपये के इनाम दिए गए हैं, जिससे यह संदेह और गहरा होता है कि ये हत्याएं किस हद तक ‘सुनियोजित’ हैं.

वक्तव्य में यह भी कहा गया है कि बस्तर में सक्रिय जबरन कैंप निर्माण और विस्थापन के खिलाफ आवाज उठा रहे आदिवासी संगठन- मूलवासी बचाओ मंच को हाल ही में प्रतिबंधित कर उसके नेताओं को यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया है. 

वक्ताओं ने कहा कि बस्तर और झारखंड के आदिवासी इलाकों में बिना ग्राम सभा की सहमति के सुरक्षा बलों के कैंप बनाए गए हैं. बस्तर में ऐसे 160 से अधिक कैंप और पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड में 25 कैंप स्थापित किए जा चुके हैं. उन्होंने कहा कि ‘इनकी मौजूदगी से गांवों का सामाजिक माहौल प्रभावित हुआ है और खासतौर पर महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर खतरे पैदा हुए हैं.’

‘आदिवासी समस्याओं का समाधान नहीं, खुली जेल बने इलाके’

संयुक्त बयान में यह भी कहा गया कि सरकारों ने आदिवासी समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई गंभीर पहल नहीं की है, बल्कि पूरे क्षेत्र को एक खुली जेल में तब्दील कर दिया गया है. 

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि ‘जहां भी आदिवासी समुदाय ज़मीन अधिग्रहण, खनन या विस्थापन का विरोध करते हैं, उन्हें देशद्रोही या माओवादी कहकर निशाना बनाया जाता है.’ 

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ‘इन अभियानों का असली उद्देश्य आदिवासी इलाकों को कॉरपोरेट कंपनियों के लिए सुरक्षित बनाना है, ताकि प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट की जा सके. जब ग्राम सभाएं, सामाजिक संगठन या माओवादी इसका विरोध करते हैं तो सरकार दमन का रास्ता चुनती है.’

बयान में यह भी उल्लेख किया गया कि भाकपा (माओवादी) ने हाल के वर्षों में कई बार युद्धविराम की घोषणा करते हुए शांतिवार्ता की इच्छा जताई है, लेकिन सरकार की ओर से जवाब में केवल हिंसा और दमन बढ़ा है. 

हाल ही में कर्रेगुट्टा पहाड़ी क्षेत्र में चलाए गए एक बड़े सैन्य अभियान का जिक्र करते हुए लिखा गया कि इस अभियान में सुरक्षा बलों ने 31 लोगों को मार गिराया, जिनमें कुछ सशस्त्र माओवादी थे, लेकिन ‘अधिकतर आदिवासी नागरिक निहत्थे थे.’ वक्तव्य में आरोप लगाया गया है कि ‘जवानों ने उनके शवों के सामने हवा में बंदूकें लहराकर जश्न मनाया. कई शवों को अस्पतालों में कई दिन तक छिपाकर रखा गया जिससे वे सड़ गए, और बाद में परिवारों से उनकी पहचान करवाई गई.’ 

‘इसी तरह मई 2025 में माओवादी महासचिव बसवराजु की कथित मुठभेड़ में हत्या कर दी गई. उनके परिवार को न तो शव सौंपा गया, न देखने दिया गया, बल्कि पुलिस ने शवों का गुप्त अंतिम संस्कार कर दिया.’

बयान में यह भी कहा गया कि 5-6 जून 2025 को माओवादी पार्टी के कई नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबरें हैं, लेकिन अब तक न उनकी गिरफ्तारी की पुष्टि हुई है और न ही उन्हें अदालत के समक्ष पेश किया गया है. कहा गया कि ‘इस तरह की गुप्त हिरासतें और लंबे समय तक पेशी न होना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि इन नेताओं की गुप्त हत्या की आशंका को भी जन्म देता है.’ 

‘जंगलों में बिछाए गए विस्फोटकों और हथियारों से आम आदिवासी भी मारे जा रहे हैं, लेकिन सरकार इस पर गंभीर नहीं है.’

साझा बयान में इसे भारतीय लोकतंत्र और संविधान पर गहरा धब्बा बताया गया और कहा गया कि आदिवासियों के गरिमापूर्ण जीवन पर यह सीधा हमला है.

वक्ताओं ने केंद्र सरकार, झारखंड सरकार और अन्य संबंधित राज्य सरकारों से अपील की कि वे तुरंत सैन्य कार्रवाइयां रोकें, माओवादियों से वार्ता शुरू करें, मूलवासी बचाओ मंच पर लगाया गया प्रतिबंध हटाएं, गिरफ्तार नेताओं को रिहा करें, और सभी अवैध कैंपों को हटाएं. साथ ही, यह भी मांग की गई कि पांचवी अनुसूची, वन अधिकार कानून (पेसा) और अन्य संवैधानिक प्रावधानों को पूरी तरह लागू किया जाए.

बयान में भाकपा (माओवादी) से भी अपील की गई कि वह पिछले पचास वर्षों के अनुभव और वर्तमान परिस्थितियों के आलोक में अपनी रणनीति की समीक्षा करे और अपने संघर्ष को न्याय, मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रताओं के मूल्यों के अनुरूप ढाले, ताकि जिन लोगों के लिए वह संघर्ष कर रहे हैं, उनके सर्वोत्तम हितों की रक्षा हो सके.