लुढ़कता बिहार, पलायन को मजबूर जनता

बिहार की ख़राब अर्थव्यवस्था उसकी संस्थाओं का प्रतिबिंब है. यदि किसी देश या राज्य की सरकार, नीतियां और न्याय व्यवस्था मज़बूत नहीं होतीं, औद्योगिक और आर्थिक विकास रुक जाता है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

किसी भी राज्य की बेरोजगारी दूर करने में राज्य के चालू कल-कारखानों का बड़ा योगदान होता है. बिहार इस मामले में सर्वाधिक पिछड़ा राज्य है. बिहार के युवा रोजगार की तलाश में दूसरे राज्य का रुख करते हैं. देश में रोजगार हेतु पलायन करने वाले युवाओं की सर्वाधिक संख्या बिहार से है. पिछले दो दशक में बिहार में कल-कारखानों की संख्या में भारी गिरावट के आंकड़े डराने वाले है.

आश्चर्य तो यह है कि युवाओं की संख्या के आधार पर जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) लेने में पिछड़ा बिहार अन्य प्रदेशों के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभा रहा है. बिहार को बीमारू राज्य की श्रेणी से निकालने के लिए एक मजबूत औद्योगिक नीति की आवश्यकता है.

1630 के दशक में भारत आए अंग्रेज़ यात्री पीटर मुंडी ने बिहार को एक समृद्ध क्षेत्र बताया था, जहां पटना एक प्रमुख व्यापार केंद्र था. उनके अवलोकन से बिहार की अर्थव्यवस्था, व्यापार में गंगा नदी की भूमिका और परिवहन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली नावों के प्रकारों की झलक मिलती है. गंगा नदी बिहार में व्यापार और परिवहन की जीवन रेखा थी.

मुंडी ने पाया कि वाणिज्य का एक बड़ा हिस्सा नदी परिवहन पर निर्भर था. पटना से माल नीचे की ओर बंगाल भेजा जाता था जबकि अन्य माल ऊपर की ओर आगरा और दिल्ली की ओर जाता था. उनके अनुसार बिहार एक समृद्ध क्षेत्र था, जहां रेशम, शोरा (सॉल्टपीटर), नील, और चीनी का व्यापक व्यापार होता था. आज के बिहार के व्यापार और औद्योगिक क्षेत्र की तुलना मुंडी के समय से करने पर बिहार की वर्तमान स्थिति काफी दुःखद है.

बिहार सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण बिहार के औद्योगिक क्षेत्र की मंदी की कहानी कहता है. बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, विनिर्माण जो एक प्रमुख औद्योगिक गतिविधि है, ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GSDP) में इसकी हिस्सेदारी 2021-22 में 9.9% गिरकर 2023-24 में 7.6% हो गई है. मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी में गिरावट, कमजोर औद्योगिक बुनियादी ढांचे, कम निजी निवेश और बड़े पैमाने पर उद्योगों की कमी को उजागर करता है.

केंद्र सरकार के आंकड़े भी बिहार के औद्योगिक क्षेत्र की बदतर स्थिति की पुष्टि करते हैं. औद्योगिक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में चालू कारखानों की संख्या 2013-14 में 3,132 थी, जो घट कर 2022-23 में 2,782 रह गई. यह खराब औद्योगिक स्थिरता का संकेत है. केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा प्रकाशित ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस (व्यापार सुगमता) रैंकिंग में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बिहार 26 वें स्थान पर है.

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के उद्यम पंजीकरण पोर्टल पर आंकड़े देखें, तो भारत के कुल सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों की संख्या में बिहार का योगदान केवल 5.47% है. बिहार में कुल सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग की संख्या 14,23,380 है. जबकि उत्तर प्रदेश में यह संख्या 10.69% योगदान के साथ 34,03,834 है. यदि हम सूक्ष्म, लघु और मध्यम को अलग-अलग देखें सूक्ष्म तो उद्यमों में बिहार की हिस्सेदारी 4.11% जबकि उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 9.25%  है. बिहार में लघु उद्यम भारत के कुल उद्यम का मात्र 2.64% हिस्सा बनाते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 8.56% है. मध्यम उद्यम में बिहार का हिस्सा 1.49% और उत्तर प्रदेश का 7.04% है.

अर्थशास्त्री आर्थर लुईस के डुअल सेक्टर मॉडल / माइग्रेशन मॉडल के अनुसार, आर्थिक विकास तब होता है जब श्रमिक पारंपरिक कृषि क्षेत्र से आधुनिक औद्योगिक क्षेत्र में स्थानांतरित होते हैं और जिससे उत्पादकता और वेतन में वृद्धि होती है. लेकिन बिहार कभी भी औद्योगिक क्षेत्र विकसित नहीं कर सका, जिससे हमारे अतिरिक्त श्रमिकों को अन्य राज्यों के औद्योगिक क्षेत्रों में पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के अनुसार, बिहार और उत्तर प्रदेश, देश के आधे पलायन के लिए उत्तरदायी हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार, कुल 2 करोड़ 72 लाख लोगों का बिहार से पलायन हुआ. अगली जनगणना आने पर यह संख्या संभवतः और भी अधिक होगी. साथ ही जो लोग यहीं रह गए हैं, उन्हें भी औद्योगिक क्षेत्र में शामिल नहीं किया जा सका और यह हमारे बेरोजगारी आंकड़ों में परिलक्षित होता है.

नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (NSO) द्वारा प्रकाशित 2024 के अक्टूबर से दिसंबर तिमाही, नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2024 (PLFS) के अनुसार, बिहार का श्रम बल भागीदारी दर 30.7% है जो पूरे भारत में सबसे कम है. इसी सर्वे  के अनुसार बिहार की बेरोजगारी की दर 8.7% है. राष्ट्रीय औसत 6.4% है. अर्थशास्त्री गुनार मिर्डल के क्युमुलेटिव कॉज़ेशन थ्योरी के अनुसार भी समृद्ध क्षेत्र अधिक निवेश और श्रम आकर्षित करते हैं, जिससे गरीब क्षेत्र और पिछड़ जाते हैं. यह एक दुष्चक्र बन जाता है. गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु जैसे औद्योगिक राज्यों ने बिहार के श्रमिकों और निवेश को आकर्षित किया, जिससे बिहार विकास चक्र में और पिछड़ता गया है.

बिहार में पूंजी निवेश की कमी ने औद्योगिक विकास को बाधित किया है. भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, जिसका जिक्र बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में भी किया गया है, बिहार का क्रेडिट-डिपॉज़िट अनुपात (साख-जमा अनुपात) 52.8% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 79.6% है. तेलंगाना, तमिलनाडु, आंध्र जैसे राज्यों में क्रेडिट-डिपॉज़िट अनुपात 100% के करीब या उससे अधिक है. यह संकेत देता है कि बिहार में बैंकों की जमा राशि का एक बड़ा हिस्सा ऋण के रूप में बिहार में नहीं दिया जा रहा या अन्य राज्य इससे समृद्ध हो रहे हैं. इससे आर्थिक गतिविधियां खासकर औद्योगिक क्षेत्र को नुकसान है.

अपर्याप्त ऋण सहायता के साथ-साथ खराब भौतिक अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स (रसद) ने औद्योगिक क्षेत्र में संरचनात्मक कमियां पैदा कर दी हैं. पिछले वर्ष के जुलाई में बिहार को दो स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) आवंटित किए गए है जो प्रक्रियाधीन है. जबकि उत्तर प्रदेश में 31, हरियाणा में 25 और कर्नाटक में 66 स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन अब तक स्थापित किए गए हैं. स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) निर्यात, निवेश और रोजगार को बढ़ावा देकर औद्योगिक विकास को गति देते हैं. ये कर राहत, पानी, बिजली और अन्य बुनियादी ढांचे की पेशकश करते हैं और निवेशकों को आकर्षित करते हैं.

जैसा कि ऊपर बताया गया है, बिहार ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग में 26वें स्थान पर है. ये सब खराब संस्थागत व्यवस्था का प्रतिबिंब है. पिछले वर्ष अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जेम्स रॉबिन्सन और डैरेन ऐसमोग्लू को यह दिखाने के लिए दिया गया था कि यदि किसी देश या राज्य की संस्थाएं (सरकार, नीतियां, न्याय व्यवस्था) मजबूत नहीं होतीं, तो औद्योगिक और आर्थिक विकास रुक जाता है.

बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकार (बियाडा) की कार्यप्रणाली भी खराब संस्थागत व्यवस्था का एक और उदाहरण है. बियाडा सालों से फूड पार्क के लिए चिह्नित की गई जमीन से अतिक्रमण हटाने में सक्षम नहीं है. अक्टूबर 2024 में बिहार की पहली निजी सेमीकंडक्टर कंपनी के सीईओ ने कहा कि राज्य में निवेश करना उनके करियर की सबसे बड़ी भूल थी. सड़क, बुनियादी ढांचे और कानून-व्यवस्था की बदहाली ने ग्राहकों को दूर किया और प्रशासनिक उदासीनता ने स्थिति और भी खराब कर दी. यह भी संस्थागत विफलता का स्पष्ट संकेत है.

उद्योगों के लिए इस वर्ष का बजट आवंटन 1,960 करोड़ रुपये किया गया है, जो कुल बजट का मात्र 0.62% है. 2024-25 के पुनरीक्षित अनुमान के मुताबिक खर्च होने वाली रकम करीब 3,038 करोड़ है. इस साल के बजट अनुमान में आवंटन कम किया गया है. बिहार के आर्थिक परिदृश्य को बदलने के लिए उद्योगों के आवंटन में भारी वृद्धि होनी चाहिए, न कि कटौती की जानी चाहिए. हमेशा की तरह बजट में औद्योगिक क्षेत्र के लिए कोई ठोस प्रावधान नहीं है.

औद्योगिक क्षेत्र में सतत, व्यापक विस्तार के लिए संरचनात्मक बाधाओं – व्यापार सुगमता, लॉजिस्टिक्स, ऋण और निवेश माहौल को हल करना आवश्यक होगा. सरकार की रणनीति राज्य में निवेशक विश्वास जगाने की होनी चाहिए. बिहार बिजनेस कनेक्ट के विभिन्न संस्करणों के दौरान हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापनों पर अब तक कोई अमल नहीं हुआ है. सरकार को भौतिक अवसंरचना पर पूंजीगत व्यय बढ़ाने की जरूरत है – बिजली, पानी और सड़कों की गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति. नवानगर और कुमारबाग में आवंटित स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन पर काम को तेजी से आगे बढ़ाना चाहिए. सरकार को कम लॉजिस्टिक्स लागत के लिए गंगा जलमार्ग विकास में निवेश करके नदी लॉजिस्टिक्स का लाभ उठाना चाहिए.

कृषि उत्पादन से जुड़े प्रोसेसिंग यूनिट्स (जैसे मकई, लीची, मखाना) की स्थापना तथा कोल्ड स्टोरेज और फूड पैकेजिंग यूनिट्स को ज़िला स्तर पर बढ़ावा देना चाहिए. यह सब तभी संभव होगा जब बजट आवंटन बढ़ाया जाएगा. संस्थागत समर्थन और व्यापार सुगमता के लिए, व्यापार सुगमता के मेट्रिक्स का नियमित ऑडिट और डेटा को सार्वजनिक रूप से जारी करना चाहिए. सरकार रणनीतिक क्षेत्रों (इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि प्रसंस्करण, कपड़ा) में प्रदर्शन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) भी दे सकती है.

बियाडा की नीतियों को निवेशकों और उद्यमों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए. जब बजट आवंटन से भौतिक अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स में सुधार होगा, और साथ ही संस्थागत व्यवस्था सुदृढ़ होकर कारोबारी सुगमता बढ़ेगी, तो ऋण और निवेश अपने आप आकर्षित होंगे.

(डॉ. अजय कुमार सिंह बिहार विधान परिषद के सदस्य हैं.)