नई दिल्ली: महाराष्ट्र विधानसभा ने गुरुवार (10 जुलाई) को राज्य में ‘वामपंथी उग्रवादी संगठनों’ पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से एक विशेष जन सुरक्षा विधेयक बहुमत से पारित कर दिया.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में विधेयक पेश करते हुए कहा कि राज्य में माओवाद को नियंत्रित करने के लिए यह विधेयक आवश्यक है. उन्होंने कहा कि जहां पहले राज्य के कम से कम चार जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित थे, वहीं अब केवल दो तालुका ही इससे प्रभावित हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे संगठन भारत के संविधान के विरुद्ध हैं.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के विरोध और अन्य दलों की आपत्तियों के बावजूद विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने घोषणा की कि प्रस्तुत विधेयक को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई है.
इससे पहले बुधवार (9 जुलाई) को राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने विधेयक पर संयुक्त प्रवर समिति की रिपोर्ट पेश की थी. महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा विधेयक, 2024 को दिसंबर 2024 में विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पेश किया गया था.
दोनों सदनों में विधेयक के पारित होने के बाद छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के बाद महाराष्ट्र जन सुरक्षा कानून लागू करने वाला पांचवां राज्य बन जाएगा. इस कानून के तहत गैरकानूनी संगठनों के सदस्यों को दो से सात साल तक की जेल की सज़ा होगी. इस अधिनियम के तहत अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती प्रकृति के होंगे और सरकार को ऐसे समूहों से संबंधित धन को ज़ब्त करने का अधिकार होगा.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, विधेयक, जिसमें दो से सात साल तक की जेल की सजा का प्रावधान है, ‘गैरकानूनी गतिविधि’ को इस प्रकार परिभाषित करता है, ‘किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा की गई कोई भी कार्रवाई, चाहे वह कोई कार्य करके हो या बोले गए या लिखित शब्दों द्वारा या संकेत द्वारा या दृश्य प्रतिनिधित्व द्वारा या (i) जो सार्वजनिक व्यवस्था, शांति और सौहार्द के लिए खतरा या संकट उत्पन्न करती है; या (ii) जो सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव में हस्तक्षेप करती है या हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति रखती है; या (iii) जो कानून के प्रशासन या उसके स्थापित संस्थानों और कर्मियों में हस्तक्षेप करती है या हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति रखती है’ – विधेयक चार अन्य कार्यों को परिभाषित करता है जो ‘गैरकानूनी गतिविधि’ बनाते हैं.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सदन में सदस्यों को आश्वासन दिया कि विधेयक का राजनीतिक प्रदर्शनकारियों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ दुरुपयोग नहीं किया जाएगा.
उन्होंने कहा कि माओवादियों ने राज्य में अपनी ज़मीन खो दी है और वे शहरी इलाकों के युवाओं का ब्रेनवॉश करके उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, यह विधेयक उन्हें नियंत्रित करेगा.
फडणवीस ने कहा, ‘अन्य चार राज्यों ने 48 संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया है. महाराष्ट्र में ऐसे 64 संगठन हैं, जो देश में सबसे ज़्यादा हैं. वामपंथी उग्रवादी संगठनों में से एक पर भी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. राज्य उनके लिए एक सुरक्षित ठिकाना बन गया है. इस अधिनियम के तहत किसी भी व्यक्ति को गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता. किसी व्यक्ति को किसी प्रतिबंधित संगठन का हिस्सा होना ज़रूरी है.’
विधेयक पर चिंता व्यक्त करते हुए भाकपा विधायक विनोद निकोले ने कहा, ‘कानून के शासन के अनुसार विरोध प्रदर्शन करने वाले संगठनों को समस्याओं का सामना नहीं करना चाहिए. संभावनाएं मौजूद हैं, इसलिए मैं इस विधेयक का विरोध करता हूं.’
एनसीपी (सपा) नेता रोहित पवार ने कहा कि विधेयक में कुछ परिभाषाएं अस्पष्ट हैं. उन्होंने कहा, ‘उग्रवादी वामपंथी संगठनों’ की जगह नक्सली संगठन कहा जा सकता है. विधेयक का आशय यह है कि वामपंथी विचारधारा वाले लोगों को निशाना बनाया जाएगा. परिभाषा में स्पष्टता होनी चाहिए थी.’
शिवसेना (यूबीटी) विधायक वरुण सरदेसाई ने पूछा कि क्या छात्र संगठनों या किसान समूहों पर विरोध प्रदर्शन करने पर इस कानून के तहत मामला दर्ज किया जाएगा. उन्होंने कहा, ‘हर विश्वविद्यालय में वामपंथी विचारधारा वाले समूह होते हैं. अगर वे विरोध प्रदर्शन करते हैं या वॉट्सऐप पर कुछ पोस्ट करते हैं, तो क्या उन पर कोई कार्रवाई होगी?’
मालूम हो कि ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल पहली बार केंद्रीय मंत्रियों और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा 2018 में एल्गार परिषद मामले में कई कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों की गिरफ्तारी के बाद किया गया था. तब से इस शब्द का इस्तेमाल अक्सर नरेंद्र मोदी सरकार के आलोचकों के लिए किया जाता रहा है.
