पश्चिमी चंपारण: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया चल रही है. इसकी जिम्मेदारी बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) पर है जो जमीन पर इसे संचालित कर रहे हैं.
10-11 जुलाई को ‘द वायर हिंदी’ ने पश्चिमी चंपारण के तीन बीएलओ और एक सहायक से बात की. उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग का नियम घर-घर जाकर फॉर्म वितरित करने का है, लेकिन व्यवहार में यह संभव नहीं हो पाता.
एक मतदान केंद्र पर औसतन 1000 से 1200 मतदाता होते हैं. एक ही क्षेत्र में बार-बार जाना पड़ता है. बीएलओ को दी गयी सूची में नाम में कुछ नाम ऐसे भी होते है, जो किसी दूसरे बीएलओ के क्षेत्र में मौजूद हो.
शुरुआत में बार-बार एक ही क्षेत्र में जाने और लोगों के उपलब्ध न होने (जैसे कोई मजदूरी के लिए, कोई रिश्तेदारी में चला गया) के कारण दिक्कतें होती थीं. इससे बचने के लिए कुछ समय बाद उन्होंने घर-घर जाना बंद कर दिया. अब वे गांव के किसी चौक-चौराहे, पेड़ के नीचे या किसी के घर के सामने, जहां लोग इकट्ठा होते हैं, वहां बैठकर फॉर्म वितरित करते हैं.
जब हमने उनसे पूछा कि चुनाव आयोग का निर्देश है कि प्रत्येक व्यक्ति को दो फॉर्म दिए जाएं और उन्हें समझाया जाए कि इन्हें कैसे भरना है, तो किसी भी बीएलओ ने यह नहीं कहा कि उन्होंने दो फॉर्म दिए.

एक अधिकारी ने आश्चर्य से पूछा कि क्या यह भी कोई नियम है? अन्य का कहना था कि शुरू में उन्होंने लोगों को फॉर्म भरने के बारे में समझाने की कोशिश की, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि वे बहुत कम लोगों को समझा पा रहे हैं.
एक बीएलओ ने बताया कि मुसहर जाति की टोली में कई लोगों ने कहा कि उनके पास कोई दस्तावेज नहीं है, क्योंकि ‘आग लाग ल, सब जर गइल’ (आग लगने से सब जल गया). कई बीएलओ को खुद ही नहीं पता कि फॉर्म कैसे भरना है या किन दस्तावेजों की जरूरत है.
उदाहरण के लिए गणना प्रपत्र में 11 तरह के दस्तावेजों में से एक, 1987 से पहले के पासबुक जैसा नियम भी है. लेकिन कई अधिकारियों ने मौजूदा पासबुक को भी प्रमाण के रूप में स्वीकार कर लिया है. कई ऐसे फॉर्म जमा कर चुके हैं, जहां प्रमाण पत्र के तौर पर बैंक का पासबुक जमा किया गया है.
लगभग सभी बूथ लेवल अधिकारियों ने बताया कि शुरुआत में फॉर्म अपलोड करने में बहुत दिक्कत होती थी. प्रिंटेड फॉर्म पर स्कैन का निशान होता है, जिसे एसआईआर के एप्लिकेशन (ऐप) से स्कैन करने पर डिजिटल कॉपी अपलोड होती है, जिसमें सारी जानकारी भरनी होती है. लेकिन शुरू में लोग न तो फॉर्म पूरी तरह भरते थे और न ही जरूरी दस्तावेज जमा करते थे.

‘ब्लॉक स्तर से निर्देश मिला कि चाहे जैसे हो, फॉर्म जमा कर लिए जाएं’
पहले वे दिन भर में केवल 10-15 फॉर्म ही अपलोड कर पाते थे. बाद में एप्लिकेशन में अपडेट हुआ और ब्लॉक स्तर से निर्देश मिला कि चाहे जैसे हो, फॉर्म जमा कर लिए जाएं—दस्तावेज हों या न हों, हस्ताक्षर हों या न हों, फॉर्म पूरा भरा हो या नहीं, फोटो हो या न हो. ऊपर से यह आदेश आया कि फॉर्म जमा कर अपलोड करना सबसे जरूरी है. अब एक दिन में अगर इंटरनेट की सुविधा ठीक हो,एक बीएलओ अगर ईमानदारी से फॉर्म अपलोड करें, तो वह करीब 90 से 100 फॉर्म अपलोड कर सकता है.
एक बीएलओ के सहायक ने मुझे एसआईआर का ऐप भी दिखाया. इसमें 11 तरह के दस्तावेजों के अलावा ‘एनी अदर डॉक्यूमेंट’ की कैटेगरी भी जोड़ी गई है. जिसमें आधार, राशन कार्ड जैसे दस्तावेज डाले जाते हैं, जिसका जिक्र गणना प्रपत्र के 11 तरह के दस्तावेजों में नहीं है.
जब पूछा कि चुनाव आयोग का निर्देश केवल 11 प्रकार के दस्तावेजों में से एक को प्रमाण के रूप में लेने का है, तो एक अधिकारी ने कहा कि अगर ऐसा होता तो कई गांवों में पांच लोग भी फॉर्म जमा नहीं कर पाते.
सुप्रीम कोर्ट के हालिया बयान कि चुनाव आयोग 11 तरह के दस्तावेज के साथ राशन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड और आधार कार्ड को भी शामिल करने पर विचार करे, पर जब बीएलओ से पूछा, तो सबने कहा कि भले यह आधिकारिक तौर पर न हो, मगर यह तो हम पहले से ही करते ही आ रहे हैं.
बीएलओ सहायक ने बताया कि प्रशासनिक काम कागज के हिसाब से होगा, तो कागज में ही रह जाएगा.
बीएलओ सहायक को कोई आर्थिक भुगतान नहीं
बीएलओ को फार्म जमा करवाने पर सरकार की तरफ राशि दी जाएगी, मगर बूथ लेवल अधिकारियों के सहायक के तौर पर ( कृषि सहायक, विकास मित्र, आंगनबाड़ी सेविका आदि) जो मदद कर रहे है, उन्हें किसी तरह की आर्थिक भुगतान देने की अभी तक कोई सूचना नहीं है.
एक बीएलओ के सहायक के तौर पर कार्यरत कृषि सहायक ने यह बताया कि उनके बीएलओ उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं. बिहार के सरकारी स्कूल में उनकी हाल ही में शिक्षक के पद पर नियुक्ति हुई है. उनका मतदान केंद्र के लोगों से परिचय कम है. इसलिए अगर उनके बलबूते यह काम होता, तो जिस बूथ पर मैं हूं, वहां कई लोगों को वह फॉर्म ही नहीं दे पाते.
‘मैं कृषि सहायक के पद पर काम करता हूं इसलिए मेरा काम ही है इस इलाके में घूम-घूम कर किसानों की मदद करना. हमें कुछ फायदा हुआ हो या ना हुआ लेकिन हमारी वजह से बूथ लेवल अधिकारियों को बहुत फायदा होगा,’ उन्होंने आगे बताया.
एक बीएलओ ने यह बताया कि शुरुआत में मुस्लिम लोग फॉर्म भरने से कतरा रहे थे. उन्हें लगता था कि एनआरसी हो रही है. लेकिन जब धीरे-धीरे गांव समाज के लोगों का फॉर्म भरा जाने लगा तो वह भी अब इधर-उधर की सोचे बिना, फॉर्म जमा कर रहे हैं.
जिस भी बीएलओ और उनके सहायक से मैंने बात की, उन सबने यह बात कही कि शुरुआत में इस पूरी प्रक्रिया में बहुत दिक्कत होती थी. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते मुश्किलें कम होती गईं हैं. लेकिन अब भी फार्म अपलोड करने में दिक्कत महसूस हो रही है. संभावना है कि ब्लॉक लेवल की कुछ और कर्मचारियों को मदद के लिए लगाया जाए या केवल फार्म अपलोड करने के काम में लगाया जाए.

अधिक से अधिक फॉर्म जमा और अपलोड करने का दबाव
बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि किसी तरह का टारगेट तो नहीं मिलता. मगर दबाव जरूर रहता है कि ज्यादा से ज्यादा फॉर्म अपलोड हो. हम दूसरे अधिकारियों के मुकाबले पिछड़े हुए न दिखाई दें. अगर कोई ज्यादा पिछड़ रहा है तो उसके खिलाफ मजबूत शिकायत भी बन जाती है. यहां हर दिन डेटा दिखाना है कि कितना अपलोड हुआ तो शिकायत तो होगी ही. दबाव भी बनेगा.
बिहार के पश्चिमी चंपारण में बीएलओ से बातचीत में पता चला कि ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने के बाद फील्ड इंक्वायरी के बारे में कोई स्पष्ट आदेश नहीं आया है. लेकिन एक बीएलओ का मानना है कि फॉर्म जमा करवाने वालों से ही इंक्वायरी कराई जाएगी.
पर आखिरकार गांव गांव जाकर छानबीन कौन करेगा? यह पूछने पर कि इस प्रक्रिया का फायदा क्या है, जवाब अस्पष्ट रहा.
एक अधिकारी ने कहा कि मृतकों, स्थाई प्रवासियों या एक से अधिक बूथों पर दर्ज नामों की छंटनी हो जाएगी. सबने अनुमान लगाकर यह बताया कम से कम 40 से 50 लोग ऐसे आ ही रहे हैं, जिनकी मौत हो गई है, मगर मतदाता लिस्ट में नाम है.
इस पर जब पूछा कि क्या यह पहले नहीं हो पाता था. क्या पहले छंटनी नहीं हो पाती थी, तो उन्होंने जवाब दिया, ‘अगर होता तो इनका वोटर लिस्ट में नाम क्यों होता?’
फॉर्म जमा होने के औचित्य पर बीएलओ ने कहा कि वे ज्यादा नहीं सोचते, यह ऊपरी अधिकारियों का काम है. एक कृषि सहायक ने संभावना जताई कि संभव है कि बिना दस्तावेज वालों का नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल न हो या यह भी संभव है कि 2003 की वोटर लिस्ट में जहां माता-पिता के नाम की कॉपी है, उसे जिन्होंने न दिया हो, उनकी शिनाख्त की जाए, भले ही उन्होंने वर्तमान का कोई प्रमाण पत्र क्यों न दिया हो?
