मटीरियलिस्टस: पारंपरिक प्रेम की आधुनिक समीक्षा

सेलिन सोंग की 'मटीरियलिस्टस' निश्चित तौर पर प्रेम का रोमांटिक भाव-बोध से भरा प्रस्तुतीकरण है, पर वह जीवन की वास्तविकताओं और पात्रों के निर्णयों को रूमानियत में पिरोकर नहीं दिखाती. फिल्म आधुनिक जीवन की यंत्रचालित अंधी भौतिकता के बर-अक्स उन दुर्लभ होती संवेदनाओं का प्रतिपक्ष रचती है जिस पर ठहरकर विचार करने की ज़रूरत है.

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सेलिन सोंग की फिल्म मटीरियलिस्टस, आज के आधुनिक समय के प्रेम पर एक वस्तुपरक नज़र डालती है. (पोस्टर साभार: Sony Pictures)

कला को प्रेरणा उसके समय और समाज से मिलती है. सिनेमा जीवन का प्रतिनिधित्व न भी करे पर जीवन सरीखा दिखलाने का प्रयत्न ज़रूर करती है. कला चाहे वह साहित्य हो या दृश्यकलाएं इसीलिए सामाजिक-मानवीय मूल्यों पर हर युग में विचार करती रही हैं और इस विचार चिंतन में युग की, उस समय की, संवेदनशीलता भी घुल-मिल जाती है. दृश्य विधा होने के कारण फिल्मों को संभवतः साहित्य से अधिक व्याप्ति और विस्तार मिलता है. वह समाज के बदलते ढंग को या सामाजिक मूल्यों या शाश्वत अवधारणाओं को अपनी दृश्यात्मकता में अधिक प्रभावात्मकता से दिखला पाती हैं.

इसी संदर्भ में हाल ही में आई हॉलीवुड की फिल्म मटीरियलिस्टस आज के समय में प्रेम और विवाह जैसे संबंधों के नए रूपों पर विचार करती है. यहां केंद्र में वह सब लोग और उनकी परिस्थितियां हैं जो आधुनिकता के दबावों में अपने जीवन को परिभाषित करते हैं. व्यस्त शहरों की भीड़ जिसमें व्यक्ति का अकेलापन दिखाई नहीं पड़ता, फिल्म उस ओझल अकेलेपन को केंद्र में रखती है.

आज के आधुनिक समय में क्या प्रेम और विवाह के रूप में परिवर्तन आया है या यह सब कुछ ऐसी संकल्पनाएं हैं जो अपने स्वरूप में शाश्वत हैं?

भारतीय संदर्भों में इन संकल्पनाओं के चित्रण की अगर थोड़ी बात करें तो पहले की फिल्में मसलन 1950 के दशक की फिल्में प्रेम और विवाह के चित्रण में युगीन पारंपरिकता को रेखांकित करती थी जहां स्त्री-पुरुष की लैंगिक भूमिका समाज स्वीकृत नियमों के अनुरूप दिखाई जाती थी. एक सलज्ज गृहिणी की छवि ली हुई स्त्री जो पुरुष से मौन प्रेम करती हुई उसकी जीवन संगिनी बनने में जीवन की सार्थकता मानती है और पुरुष जो साथी से अधिक एक उद्धार करने वाला समाज सुधारक है.

थोड़ा और आगे बढ़ें तो साठ के दशक का प्रेम पिछले समय के अपेक्षाकृत अधिक मुखर हुआ. यहां विवाह प्रेम की परिणति तो है ही, पर प्रेम का चित्रण थोड़ा उन्मुक्त है. प्रेम करती हुई नायिका मौन नहीं रहना चाहती बल्कि अब वह गीतों के अलावा भी अपने प्रेम का प्रस्ताव स्वयं कर रही होती है. कमोबेश इन दोनों ही दशकों तक प्रेम और विवाह जीवन के सहज पड़ावों की तरह आते हैं, जहां पर स्त्री-पुरुष प्रेम में नैसर्गिकता का तत्त्व बरकरार है.

युग बदला, जीवन स्थितियां बदलीं. सत्तर के दशक से लेकर नब्बे तक समाज की बदली वास्तविकताओं के यथार्थ चित्रण के लिए सिनेमा ने भी प्रेम और विवाह के बदलते स्वरूप को अपने कथ्य में समेटा. स्त्रियां जो अब प्रायः कामकाजी हैं उन्हें पुरुष का साथ भावनात्मक सुरक्षा के लिए अधिक चाहिए था ना कि आर्थिक निर्भरता के लिए. आर्थिक आत्मनिर्भरता के आने से विवाह के समीकरण में प्रेम के साथ-साथ बराबरी-सम्मान, एक जनतांत्रिक गठबंधन की बात भी आई.

हालांकि प्रेम और विवाह इस दौर की फिल्मों में भी रूमानियत से भरा-पूरा ही चित्रित होता रहा. साल 2000 के बाद की फिल्में ज़रूर वैश्विक सांस्कृतिक प्रभावों और समाज के बदलते कलेवर के कारण नवीन परिस्थितियों को लेकर आईं. अब प्रेम के त्रिकोण में हमें हर पक्ष की मनोवैज्ञानिकता ने आकर्षित किया, विवाहेतर संबंध न्यायसंगत लगने लगे, स्त्रियों की इच्छाओं को भी दिखलाना ज़रूरी लगा.

पर एक हॉलीवुड फिल्म के संदर्भ में किए गए हमारे उपरोक्त विश्लेषण का तुक क्या है?

कारण यह कि दक्षिण कोरियाई फिल्मकार सेलिन सोंग की फिल्म मटीरियलिस्टस, आज के आधुनिक समय के प्रेम पर एक वस्तुपरक नज़र डालती है, जो फिल्मों में इन स्थितियों के ट्रीटमेंट में आए परिवर्तन की ही अगली कड़ी है. हां, फिल्म अमेरिकन संदर्भों में हैं, पर आधुनिकता ने जिस भयावह गति से अपने पांव पसारे हैं, सांस्कृतिक संदर्भों का जिस तरह से समरूपीकरण किया है शायद वही हमें इस फिल्म के कथ्य से जोड़ता है. इसीलिए फिल्म को उसके अमरीकी संदर्भ से काट भी दें तो उसका प्रभाव या उसकी कथावस्तु की विश्वसनीयता ज्यों-की-त्यों रहेगी.

मटीरियलिस्टस संबंधों के मनोविज्ञान को तटस्थ पर संवेदनशील रूप से दिखलाती है जिससे हम किसी भी भौगोलिक-सांस्कृतिक संदर्भों में रहते हुए जुड़ सकते हैं. बहरहाल, सोंग को साल 2023 में आई उनकी पहली फिल्म पास्ट लाइव्ज़ (Past Lives) के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म श्रेणी में ऑस्कर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था. उनकी अब तक की फिल्मों में शहरों की बाहरी चकाचौंध में व्यक्ति के निजी जीवन में आए अकेलेपन और उस अकेलेपन से निकलने की उत्कट लालसा के संवेदनशील चित्रण हैं.

स्वाभाविक ही है कि स्त्रियां यहां केंद्र में हैं. आधुनिक संदर्भों की स्त्रियां -अपने अंतर्द्वंद्वों के साथ, अपने अनिर्णयों के साथ, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के साथ अपनी आंतरिक संगति बिठाती हुई.

फिल्म के सेट पर डकोटा जॉनसन (बीच में) और क्रिस इवांस के साथ सेलिन सोंग (दाएं). (फोटो साभार: Imdb)

मटीरियलिस्ट में भी प्रेम और विवाह जैसी मानवीय-पारंपरिक संवेदनाओं पर एक निहायत त्रासदायी सच्चाई से विचार करते हुए सोंग यह दिखलाने में सफल हुई हैं कि कैसे दो इंसानों में प्रेम, जो सहज रूप से, संयोगवश-अकारण होने वाली घटना थी जिसे एक प्राकृतिक-मानवीय संभावना के तौर पर देखा जाता है, वह आधुनिक समय में एक निर्मित (मैन्युफ़ैक्चर्ड) संवेदना बनके रह गई है, जिसे फलने-फूलने के लिए कई सारे भौतिक कारणों की आवश्यकता पड़ने लगी है.

प्रेम और विवाह अब व्यक्तिगत संवेदना या सामाजिक संस्था मात्र न रह कर अपने आप में एक बड़ा उद्योग-व्यवसाय बन चुके हैं. अन्य सेवाओं की तरह ही उसके लिए भी विशिष्ट सेवाएं दी जाने लगीं हैं और यह एकदम उसी प्रकार काम करता है जिस तरह किसी भी पूंजीवादी समाज में बाज़ार के तत्त्व काम करते हैं. एक सहज मानवीय प्रवृत्ति को एक ज़रूरत या एक आपदा में तब्दील कर उसके लिए साधन जुटाने की कोशिश की जाने लगी है और इसलिए मांग और आपूर्ति के नियमों से संचालित यह प्रेम या विवाह, एक उत्पाद में परिणत हो गए.

प्रेम और विवाह करने के लिए मनचाहा साथी आपकी आकांक्षाओं और सपनों की छवि के अनुरूप मुहैया करा देने के लिए भी बाज़ार ने कई-कई हथकंडों से आश्वस्ति का एक अलग ही भ्रम फैलाया है. प्रेम और रोमांस की आउट्सोर्सिंग अपने आप में आधुनिक समय में व्यक्ति की अक्षमता को रेखांकित करता है, जहां वह प्रेम के तथाकथित विशेषज्ञों के गणितीय विश्वास पर अपने लिए साथी चुनता है न कि अपने भरोसे पर.

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इस बदलाव को या यूं कह लें आधुनिकता के दबावों से उपजी इस भावनात्मक आपदा को मटीरियलिस्टस एक सूक्ष्म कोण से पकड़ती है. इस पूरी यांत्रिकता के पीछे छुपी जो एक करुण उदासी है, सोंग उसका बेहद सधा हुआ मनोवैज्ञानिक चित्रण करती हैं. फिल्म की कहानी सरल है. एक प्रेम त्रिकोण भी कहा जा सकता है, पर यहां प्रेम जीवन की अतिशय क्रूर वास्तविकताओं से टकराकर अपना निर्णय स्वयं लेता है. यहां मुख्य पात्र की भूमिका में तीन बेहद सशक्त कलाकार हैं और अपने आप में तीन अलग वर्गों और संभावनाओं के प्रतिनिधि हैं. डकोटा जॉनसन, लूसी मेसन की, पेड्रो पास्कल, हैरी कस्तिलो की और क्रिस इवांस, जॉन फ़िंच की भूमिका में हैं.

हैरी प्रतीक है उच्चतर से भी उच्च वर्ग के पूंजीपति का जिसके लिए दुनिया की कोई भी वस्तु या व्यक्ति पहुंच से बाहर नहीं है. वहीं अन्य दो पात्र लूसी और जॉन निम्न मध्य वर्ग के प्रतीक हैं जिनके लिए सपने देखने की क़ीमत कठिन संघर्षों से चुकानी पड़ती है. पर इस ऊपरी वर्गीय समानता के बावजूद यहां स्त्री, पुरुष से अधिक यथार्थवादी है. वह सपनों के लिए ज़मीनी वास्तविकताओं से नज़रें नहीं फेरती. अच्छे जीवन की कल्पना उसके लिए बिना धन के, बिना अर्थिक सुरक्षा के संभव ही नहीं है. इसीलिए जॉन की तरह वह भी कभी अभिनय की दुनिया में, एक बड़ा कलाकार बनने की इच्छा रखते हुए भी उस रास्ते को छोड़ देती है क्योंकि वह जीवन को सिर्फ़ संघर्षों में नहीं बिताना चाहती.

फिल्म के एक दृश्य में हैरी के किरदार के साथ लूसी. (फोटो साभार: Imdb)

दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और प्रारंभिक संघर्षों में साथ भी रहते हैं. इनका प्रेम और एक दूसरे के प्रति आकर्षण सहज है. पर इस आकर्षण को समय से अधिक जीवन के जटिल प्रश्न और एक कलाकार की संघर्षमयी ज़िंदगी ख़त्म कर देती है और अंततः वे अलग हो जाते हैं.

इस दृष्टि से विचार करने पर यह फिल्म किसी व्यक्ति विशेष के प्रति हमारे आकर्षण के पीछे की वजहों को भी समझने की संवेदनशीलता देती है. क्या किसी व्यक्ति को पसंद करने के वस्तुनिष्ठ कारण हो सकते हैं या यह पसंद एकदम आत्मनिष्ठ होती है?

भारतीय संदर्भों में बात करें तो आर्थिक सुरक्षा स्त्रियों के लिए सबसे बड़ा मयार बन जाता है तो पुरुषों को भी आकर्षक चेहरे इसीलिए चाहिए होते हैं कि वह उनकी शक्ति और रुतबे को बहुगणित कर सके, उनके वंशावली को बढ़ा सके.

बहरहाल, फिल्म में कुछ सालों बाद लूसी जो अब एक डेटिंग कंपनी में बतौर रिलेशनशिप कोच का काम कर रही है, किसी पार्टी में एक बहुत बड़े उद्योगपति हैरी से मिलती है. डेटिंग के पूरे व्यावसायिक गणित में उस जैसे व्यक्ति को एक यूनिकॉर्न समझा जाता है जो न केवल अत्यंत धनी है, बल्कि रंग रूप में भी उत्कृष्ट है और किसी भी स्त्री को सामाजिक-मानसिक सुरक्षा देने वाला एक सर्वश्रेष्ठ साथी बन सकता है. हैरी के अकूत वैभव और उसकी साधन संपन्नता से लूसी इतना प्रभावित होती है कि एक सक्षम, आत्मविश्वास से भरपूर स्त्री होने के बावज़ूद वह उस वर्ग का हिस्सा बन जाना चाहती है जो शायद वह अपने दम पर न बन सके. वह हैरी के व्यक्तित्व से अधिक उसके धनाढ्य और आकर्षक होने से आकर्षित होती है.

वहीं हैरी के लिए लूसी को पसंद करने की वजहें अलग हैं. ख़ानदानी संपत्ति और रुतबे के बावज़ूद वह अंततः एक ऐसा आकर्षक साथी चाहता है जो उसे सामाजिक रूप से शक्ति संपन्न महसूस करवा सके. दोनों ही में प्रेम और आकर्षण से अधिक एक दूसरे की रिक्तताओं की पूर्ति बनने की व्यावहारिकता अधिक है. इसलिए फिल्म यह दिखा पाने में सफल हुई है कि कैसे आधुनिक समय में प्रेम से अधिक कई अन्य कारक किसी रिश्ते के बनने का कारण बन सकते हैं.

पर महज़ प्रारंभिक आकर्षण लूसी को इस रिश्ते में वह भावनात्मक ऊष्मा नहीं दे पाता जो उसे जॉन के साथ बिताए गए संघर्ष के दिनों में मिला करता था. हैरी के कई देशों में फैले कारोबार और उसके अत्यधिक व्यस्त काम-काज उसे इतना यंत्रचालित बना देते हैं कि वह दोनों बस एक साथ एक घर में रह रहे होते हैं. समय जो किसी भी रिश्ते की सुदृढ़ता और प्रगाढ़ता का आधार होता है, वह उसके पास है ही नहीं जिसे वह लूसी को दे सके. इसीलिए हैरी के आलीशान बंगले में रह कर भी, महंगेतरीन होटलों में जा कर भी, सुदूर विदेशों में घूमने की योजनाएं बनाकर भी उन दोनों के संबंधों में एक विचित्र-सा ठंडापन है- संवादहीनता की ऐसी गांठ जो कभी नहीं खुलती.

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फिल्म यह भी दिखलाती है कि कैसे तथाकथित ‘उच्च वर्ग’ भी अपने स्तर की समस्याओं में घिरा हुआ है. वहां एक ख़ास तरीक़े से खुद को दिखलाने की अनिवार्यता कब बाध्यता बन जाती है कि व्यक्तिगत आकांक्षाएं सामाजिक दबाव का रूप ले लेते हैं. हैरी अपने ही असुरक्षाबोध से ग्रसित व्यक्तित्व है. फिल्म वर्ग विशेष के साथ जुड़ी हुई मनोवैज्ञानिक बारीकियों को दिखला सकी है. अंततः लूसी और हैरी, दोनों ही इस आत्मस्वीकार के साथ इसी नतीज़े पर पहुंचते हैं कि एक दूसरे के साथ की इच्छा ग़लत कारणों से थी.

लूसी का चरित्र एक संश्लिष्ट चरित्र हैं जो अपने द्वंद्वों, अंतर्विरोधों से निर्मित है. यह एक ऐसी आधुनिक स्त्री की छवि है जो आत्मनिर्भर है, स्वतंत्र है, चयन के विकल्पों के साथ है पर फिर भी जीवन को देखने का भौतिकतावादी नज़रिया व्यावहारिक लगते हुए भी है उसे कभी भी अपने निर्णयों के प्रति आश्वस्त नहीं करता. वह प्रेमी से प्रेम तो भरपूर कर सकती है, पर उसे दुनियावी चीज़ों की भी उतनी ही ज़रूरत है. वह प्रेम को इसका ज़रिया नहीं मानती पर संघर्ष करते प्रेमी के साथ संघर्ष करते रहना भी उसे एक सीमा तक पसंद है. पर यह चित्रण अपने संदर्भ के कारण ग़लत या असहज नहीं लगता.

लूसी और जॉन. (फोटो साभार: Imdb)

फिल्म की पृष्ठभूमि में डेटिंग/शादी के लिए संभावित साथी उपलब्ध करवाने वाली एक कंपनी ‘अडोर’ है जहां लूसी का काम अपने उपभोक्ताओं को उनके पसंद के अनुरूप साथी उपलब्ध करवाना है. यह एक अत्याधुनिक और विशिष्ट सेवा है जिसे प्रायः उच्च मध्य वर्ग या उच्च वर्ग के लोग ही उपयोग में ला रहे होते हैं. प्यार और किसी के साथ की भावनात्मक आवश्यकता को एक व्यापार की तरह इस्तेमाल करने वाली ये कंपनियां एकदम सुनियोजित तरीक़े से यह काम करती हैं. लूसी अपने काम में बहुत सफल भी है, पर कहीं न कहीं वह इस काम की यांत्रिकता को भी समझती है.

डेटिंग/वैवाहिक इंडस्ट्री की इस पृष्ठभूमि के बहाने सोंग ने एक तरह से सामाजिक मनोविज्ञान का भी बड़ा सटीक चित्रण किया है. मसलन कोई व्यक्ति जो स्वयं पचास साल का है वह अपने लिए अपनी ही उम्र की किसी स्त्री के बदले बीस से पच्चीस साल की कमसिन लड़की चाहता है ताकि वह उसके रूप-यौवन का अधिक समय तक आनंद ले सके बिना इस भय के कि किसी हमउम्र इंसान का उसकी ही तरह एक विकसित-निर्मित व्यक्तित्व होगा जिसे अपने सांचे में ढालना मुश्किल है. यह पितृसत्तात्मक समाज की उम्र को लेकर जो मनोग्रस्तता है उसे दिखलाता है.

पर वहीं कंपनी में आने वाली स्त्रियों के भी कई रूप और प्रकार दिखलाए गए हैं. प्रायः सभी एक बेहद धनाढ्य साथी चाहती हैं पर कई ऐसी भी हैं जिनकी जीवनसाथी की खूबियों की सूची इतनी लंबी है कि वह व्यक्ति न हो कर कोई अलौकिक देवदूत लगने लगे.

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फिल्म डेटिंग कंपनी की स्याह वास्तविकता को भी उजागर करती है, जो इस बाज़ार की अतिशय यांत्रिकता के ख़तरों के प्रति आगाह करता है. डकोटा अपने दो ऐसे क्लाइंट को जब एक संभावित साथी के रूप में मिलवाती है तो सभी सावधानियों के बाद भी कुछ ग़लत हो जाने का ख़तरा रहता है. ऐसी कंपनियों के अपने समीकरणों के आधार पर जब दो लोग अंततः मिलते हैं तो ज़रूरी नहीं कि वह चयन उन व्यक्तियों के लिए एकदम सही ही हो. लूसी की एक क्लाइंट, जिसके लिए उसने कई बार अच्छा साथी ढूंढने का प्रयास किया था अंततः जब उसे एक संभावित साथी से मिलवाने की व्यवस्था करती है तो पहली ही मुलाकात में वह व्यक्ति उसके साथ शारीरिक हिंसा करता है और इस प्रकार यूं अनजान व्यक्तियों से मिलने का अनुभव एकदम त्रासद हो जाता है.

फिल्म आधुनिक समय में प्रेम या मानवीय साथ की नैसर्गिक भावना के वस्तुकरण पर, उनके उपभोक्ता खड़े करने वाले बाज़ारवाद पर एक प्रश्न उठाती है. (स्क्रीनग्रैब साभार: Studio A24)

तमाम सावधानियों और पृष्ठभूमियों की छानबीन के बाद भी व्यक्तिगत स्तर पर एक व्यक्ति कैसा होगा, इसकी गारंटी ऐसी यांत्रिक रूप से काम करने वाली कंपनियां नहीं लेतीं. वह ऐसी कोई ज़िम्मेदारी लेने से साफ मुकर जाती हैं और अपना नाम ख़राब न हो उसके लिए तमाम हथकंडे अपनाती हैं.

फिल्म देखा जाए तो इस आधुनिक समय में प्रेम या मानवीय साथ की नैसर्गिक भावना के वस्तुकरण पर, उनके उपभोक्ता खड़े करने वाले बाज़ारवाद पर एक प्रश्न उठाती है. सेवाओं के नाम पर यांत्रिक रूप में दी गई सुविधाओं के ग़लत हो जाने पर हुए नुकसान की नैतिक ज़िम्मेदारी किसकी होनी चाहिए, फिल्म एक बड़ा सवाल दर्शकों के सामने रखती है. पर यह सोंग के ही निर्देशन का सधापन है कि कहीं भी यह चित्रण उपदेशात्मक नहीं लगता.

फिल्म निश्चित तौर पर प्रेम का रोमांटिक भाव-बोध से भरा प्रस्तुतीकरण है, पर वह जीवन की वास्तविकताओं और पात्रों के निर्णयों को रूमानियत में पिरोकर नहीं दिखाती, और इसीलिए इतना जुड़ाव भी महसूस करवाती है. फिल्म में स्त्री मन के भीतर चलने वाले द्वंद्व एक दम सहज और स्वाभाविक हैं और समाधान आदर्शवादी होते हुए भी विश्वसनीय. मटीरियलिस्टस आधुनिक जीवन की यंत्रचालित अंधी भौतिकता के बर-अक्स उन अमूर्त दुर्लभ होती संवेदनाओं का एक प्रतिपक्ष रचती है जिस पर ठहरकर विचार करने की ज़रूरत है.

(अदिति भारद्वाज गद्यकार हैं, जो साहित्य और सिनेमा में रुचि रखती हैं.)