नई दिल्ली: देश के वाम दलों ने बुधवार (3 सितंबर) को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 2020 के दिल्ली दंगों में कथित संलिप्तता के लिए उमर खालिद, शरजील इमाम और आठ अन्य को ज़मानत न देने के फैसले की आलोचना की.
माकपा ने कहा कि अदालत का यह फैसला ‘न्याय का उपहास’ है और इस सिद्धांत का खंडन करता है कि ‘ज़मानत देना नियम है और इनकार अपवाद’. वहीं, भाकपा (माले) ने ‘उनकी लंबी कैद’ को असहमति की आवाज़ों को दबाने की राजनीतिक साज़िश बताया.
शरजील इमाम, उमर ख़ालिद, खालिद सैफी, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, अतहर खान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद पर फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों की कथित साजिश रचने के आरोप में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है. पिछले पांच सालों में यह पांचवीं बार था जब उनकी ज़मानत याचिका खारिज हुई.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, माकपा ने कहा कि पांच सालों में दिल्ली पुलिस आरोपियों के खिलाफ आरोप तय नहीं कर पाई है.
पार्टी ने कहा, ‘दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय न्याय का उपहास है और इस सिद्धांत का खंडन है कि जमानत देना नियम है और इनकार करना अपवाद है.’
माकपा ने कहा कि भाजपा नेताओं कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है, जिनके कथित ‘भड़काऊ भाषणों ने वास्तव में उन्हीं दिल्ली सांप्रदायिक दंगों को हवा दी.’
पार्टी ने कहा, ‘यह भी एक गंभीर न्यायिक विरोधाभास है कि मालेगांव बम विस्फोटों के आरोपियों जैसे प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल प्रसाद पुरोहित और अन्य को बरी कर दिया गया, जबकि उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य को पांच साल से ज़्यादा समय तक जेलों में सड़ने के लिए मजबूर किया गया.’
इसी कड़ी में भाकपा (माले) ने कहा कि आठ कार्यकर्ताओं को दिल्ली पुलिस द्वारा कोई भी विश्वसनीय सबूत पेश किए बिना ही मनगढ़ंत आरोपों के तहत जेल में डाल दिया गया है.
भाजपा नेता कपिल मिश्रा के भाषण पर निशाना साधते हुए पार्टी ने कहा, ‘इस मामले में पुलिस द्वारा बताई गई तथाकथित ‘बड़ी साजिश’ वास्तव में पुलिस और दक्षिणपंथी हिंदुत्व समूहों के बीच सांठगांठ में निहित है.’
पार्टी ने कहा कि ‘असली दोषियों’ को जवाबदेह ठहराने के बजाय सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों और असंवैधानिक सीएए-एनआरसी के खिलाफ लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वालों को सताना शुरू कर दिया है.
भाकपा (माले) ने कहा, ‘उनकी लंबी कैद असहमति की आवाज़ों को दबाने और सांप्रदायिक व सत्तावादी एजेंडे का विरोध करने वाले आंदोलनों को डराने की एक राजनीतिक साजिश है, और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा में न्यायपालिका की विफलता देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं के गंभीर क्षरण को दर्शाती है.’
बता दें कि दिल्ली में दंगा भड़कने से एक दिन पहले 23 फरवरी को कपिल मिश्रा ने एक वीडियो ट्वीट किया था, जिसमें वह मौजपुर ट्रैफिक सिग्नल के पास सीएए के समर्थन में जुड़ी भीड़ को संबोधित करते देखे जा सकते हैं. इस दौरान उनके साथ उत्तर-पूर्वी दिल्ली के डीसीपी वेदप्रकाश सूर्या भी खड़े हैं.
मिश्रा कहते दिखते हैं, ‘वे (प्रदर्शनकारी) दिल्ली में तनाव पैदा करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने सड़कें बंद कर दी हैं. इसलिए उन्होंने यहां दंगे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं. हमने कोई पथराव नहीं किया. हमारे सामने डीसीपी खड़े हैं और आपकी तरफ से मैं उनको यह बताना चाहता हूं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत में रहने तक हम इलाके को शांतिपूर्वक छोड़ रहे हैं. अगर तब तक सड़कें खाली नहीं हुईं तो हम आपकी (पुलिस) भी नहीं सुनेंगे. हमें सड़कों पर उतरना पडे़गा.’
