जम्मू-कश्मीर: कोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने के आदेश को मनमाना करार देते हुए अधिकारी को फटकारा

बीते फरवरी महीने में किश्तवाड़ मजिस्ट्रेट ने एक आदेश पारित कर दो महीने के लिए सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया था. हालांकि बाद में एक अदालत ने उस पर रोक लगा दिया था. अब किश्तवाड़ जिला अदालत ने तत्कालीन मजिस्ट्रेट राजेश कुमार शवन को फटकार लगाते हुए कहा कि यह बेहद मनमाना और अवैध आदेश था.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Allen Allen/Flickr CC BY 2.0)

श्रीनगर: एक अदालत ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा (जेकेएएस) के एक वरिष्ठ अधिकारी को इस साल की शुरुआत में किश्तवाड़ जिले में मुफ्त बिजली की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने वाले एक बेहद मनमाने और अवैध आदेश को पारित करने के लिए फटकार लगाई.

आठ पृष्ठों के आदेश में किश्तवाड़ के प्रधान सत्र न्यायाधीश सुधीर के. खजूरिया ने अधिकारी का नाम लिए बिना कहा कि उन्होंने इस वर्ष 10 फरवरी को आदेश पारित करते समय कानून के स्थापित मानदंडों के विरुद्ध जाकर ‘कानून के आदेश’ की अवहेलना की.

जेकेएएस अधिकारी राजेश कुमार शवन, जो उस समय किश्तवाड़ के मजिस्ट्रेट के रूप में कार्यरत थे, ने यह आदेश तब जारी किया था जब मुफ्त बिजली की मांग को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे विरोध प्रदर्शन ने केंद्र शासित प्रदेश के बिजली-उत्पादन वाले जिले में एक जन आंदोलन का रूप लेने की चेतावनी दी थी, जो पूरे वर्ष बिजली कटौती से जूझता रहता है.

10 फ़रवरी को एक पत्र में सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (तहसीलदार) ने किश्तवाड़ के तत्कालीन मजिस्ट्रेट को बताया कि ‘कुछ उपद्रवी’ सरकारी अधिकारियों को पहाड़ी ज़िले में स्मार्ट मीटर लगाने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं. उसी दिन मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 163 के तहत एक आदेश पारित किया, जो ज़िला मजिस्ट्रेटों को कानून-व्यवस्था की समस्या की आशंका होने पर सार्वजनिक समारोहों या अन्य आयोजनों पर प्रतिबंध लगाने के असाधारण अधिकार प्रदान करता है.

ज्ञात हो कि किश्तवाड़ के डीएम आरके शवन ने जिले में दो महीने के लिए सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन और पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसमें कहा गया था कि ‘किसी भी अप्रिय घटना के घटित होने की उचित आशंका है, जो सार्वजनिक अशांति और सार्वजनिक शांति और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए आसन्न खतरा बन सकती है.’

स्थानीय कार्यकर्ता वसीम अकरम भट, जिन्होंने इस वर्ष 19 जनवरी को फेसबुक ‘लाइव’ के साथ विरोध प्रदर्शन शुरू किया था, ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका के माध्यम से अदालत में ‘यांत्रिक और औपचारिक’ आदेश को चुनौती दी, और तर्क दिया कि यह उन लोगों के ‘लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन’ करता है जो सरकार से मुफ्त बिजली की मांग कर रहे थे.

11 फरवरी को मुख्य सत्र न्यायाधीश मंजीत सिंह मन्हास की अदालत ने मजिस्ट्रेट के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन ‘स्वस्थ लोकतंत्र का अभिन्न अंग’ है. हालांकि, राज्य ने मुख्य सत्र न्यायाधीश के आदेश को चुनौती दी थी. ताजा आदेश मुख्य सत्र न्यायाधीश खजूरिया ने 28 अगस्त को सुनाया.

अदालती रिकॉर्ड देखने के बाद न्यायाधीश ने पाया कि डिप्टी कमिश्नर ने एक तहसीलदार को ‘मौखिक निर्देश’ देने के बाद ‘सूचना प्राप्त करने और पाने का एक दुष्चक्र’ बनाकर अवैध रूप से काम किया था, जिसने बदले में कानून और व्यवस्था के बिगड़ने की संभावना के बारे में चेतावनी देते हुए एक रिपोर्ट तैयार की थी.

‘तथाकथित जांच के संबंध में एक शब्द भी नहीं कहा गया है…’

अदालत ने कहा कि डिप्टी कमिश्नर ने बीएनएसएस की धारा 163 के तहत एकपक्षीय आदेश पारित किया, बिना बीएनएसएस की धारा 153 के तहत उद्घोषणा के माध्यम से अधिसूचित किए, जो उस व्यक्ति या जनता को आदेश देने के नियम निर्धारित करती है जिसके विरुद्ध आदेश पारित किया गया है.

अदालत ने आगे कहा, ‘यहां तक ​​कि एकपक्षीय आदेश भी राय बनाने के बाद ही पारित किया जाना चाहिए… क्योंकि किसी भी तथ्य के बारे में राय बिना किसी जांच के नहीं बनाई जा सकती… प्रतिवादी द्वारा पारित आदेश के अवलोकन से, किसी भी तरह से यह नहीं कहा जा सकता कि यह आदेश किसी जांच के आधार पर राय बनाने के बाद ही पारित किया गया था.’

अदालत ने कहा कि राज्य ने यह ‘स्थापित करने की कोशिश की’ कि आदेश एक आधिकारिक जांच के बाद पारित किया गया था, ‘लेकिन आदेश में तहसीलदार किश्तवाड़ द्वारा की गई तथाकथित जांच के बारे में एक शब्द भी उल्लेख नहीं किया गया है, जिसे तहसीलदार किश्तवाड़ ने 10.02.2025 नंबर 75/जेसी/टीके के पत्र के माध्यम से प्रतिवादी को बताने की कोशिश की है.’

‘एक दिन के भीतर’

अदालत ने कहा कि मामले की कार्यवाही एक दिन के भीतर शुरू और समाप्त कर दी गई, जो कानूनी मानदंडों का उल्लंघन है. साथ ही, अदालत ने राज्य के इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया कि यह आदेश तब जारी किया गया जब सरकारी अधिकारियों को जिले में मीटर लगाते समय अपने सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन में बाधाओं का सामना करना पड़ा.

न्यायाधीश ने बताया कि अभियोजन पक्ष ने कोई आधिकारिक दस्तावेज या ‘कुछ सरकारी अधिकारियों द्वारा उनके सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डालने के संबंध में शिकायत’ प्रस्तुत नहीं की है.

न्यायाधीश ने कहा, ‘रिपोर्ट में किश्तवाड़ में विभिन्न स्थानों पर स्मार्ट मीटर लगाने में उकसावे के कारण बाधा उत्पन्न होने का स्पष्ट उल्लेख है, लेकिन संबंधित राजस्व अधिकारियों द्वारा एक भी व्यक्ति की जांच नहीं की गई. अगर ऐसा पहले हुआ होता, तो निश्चित रूप से इससे पहले की घटनाओं का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड अवश्य होता.’

अदालत ने कहा, ‘ऐसा प्रतीत होता है कि पत्र…साथ ही रिपोर्ट (तहसीलदार द्वारा) केवल यह प्रदर्शित करने के लिए प्रबंधित की गई है कि प्रतिवादी द्वारा पारित दिनांक 10.02.2025 का आदेश कानून के अधिदेश का पालन करते हुए पारित किया गया है, लेकिन रिकॉर्ड की सूक्ष्म कानूनी जांच से पता चलता है कि दिनांक 10.02.2025 का आदेश पारित करते समय कानून के नियमों का पालन नहीं किया गया है.’

अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा जांच की गई प्रतीत होती है… लेकिन वास्तव में ऐसा प्रतीत होता है कि कोई जांच नहीं की गई है, ‘इस प्रकार की जांच की कल्पना या परिकल्पना कानून निर्माताओं द्वारा बीएनएसएस 2023 के अध्याय XI में धारा 163 को शामिल करते समय कभी नहीं की गई थी… (और यह कानून के जनादेश के खिलाफ है)

‘धारा 163’

अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ एवं अन्य, तथा गुलाम नबी आज़ाद बनाम भारत संघ एवं अन्य मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए, अदालत ने कहा कि धारा 163 (जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के अनुरूप है) तब तक लागू नहीं की जा सकती जब तक कि भौतिक तथ्य कानून और व्यवस्था के लिए खतरे की संभावना को प्रदर्शित न करें.

अदालत ने कहा, ‘(धारा 163 के तहत आदेश जारी करने की) शक्ति का प्रयोग सद्भावनापूर्ण और उचित तरीके से किया जाना चाहिए, और इसे तार्किक रूप से विचार करने वाले तथ्यों पर आधारित होकर पारित किया जाना चाहिए. इससे आदेश की न्यायिक जांच संभव होगी.’

संपर्क करने पर शवन, जो वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के सामान्य प्रशासन विभाग में तैनात हैं, ने द वायर को बताया कि उनका जिले से बाहर तबादला कर दिया गया है और उन्हें आदेश की जानकारी नहीं है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)