स्कूल की पिछली बेंच से महाड के होटल तक: एक दलित कॉमरेड की आत्मकथा

पुस्तक अंश: हमारा स्कूल सुबह दस या ग्यारह बजे से शुरू होता और शाम पांच बजे छुट्टी होती थी. मैं सुबह खाना खाकर निकलता. शाम को घर आने तक बाहर पानी या खाने को छूता भी नहीं था. महाड के बाज़ार में जलावन की लकड़ी बेचने आने वाले हमारी जाति के लोगों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता था कि मैं ब्राह्मणों के लड़कों के साथ स्कूल जाता हूं.

महाड के बाज़ार में जलावन की लकड़ी बेचने आने वाले हमारी जाति के लोगों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता था कि मैं ब्राह्मणों के लड़कों के साथ स्कूल जाता हूं. (पुस्तक आवरण साभार- वाम प्रकाशन)

यह अंश वामपंथी नेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कॉमरेड आर.बी. मोरे की आत्मकथा ‘दलित मुक्ति से वर्ग संघर्ष तकः कॉमरेड आरबी मोरे का जीवन’ से लिया गया है. इसमें वे अपने बचपन के अनुभवों को साझा करते हैं, जिसमें स्कूल में जातिगत भेदभाव, समाज से मिले अपमान, और पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी झेलनी पड़ी तकलीफ़ों का विवरण शामिल है. लेकिन इन्हीं अनुभवों ने उनके भीतर अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने और अपने समुदाय को संगठित करने का संकल्प पैदा किया.

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पहले दिन जब मैं स्कूल पहुंचा तो दरवाजे पर ही स्कूल के चौकीदार ने मुझे अपने पीछे आने के लिए कहा. पहली मंज़िल पर मेरी क्लास थी वहां मुझसे सबसे पीछे कोने की एक टेबल पर बैठने के लिए कहा गया. बाकी बच्चे मेरे सामने बेंचों पर एक दूसरे से सट कर बैठे थे. उनके सामने शिक्षक की कुर्सी-टेबल और एक छोटी सी अलमारी थी. मेरी टेबल इस तरह से रखी गयी थी कि क्लास के किसी बच्चे या शिक्षक मुझे ग़लती से भी न छू सकें. केवल मेरे आने-जाने के समय छूने की संभावना थी जिससे वे बड़ी होशियारी से बचते थे और अपनी पवित्रता कायम रखते! मैं जब स्कूल गया तब उस स्कूल में ब्राह्मण, गूजर और कायस्थ को छोड़कर किसी भी दूसरी जाति का कोई विद्यार्थी नहीं था. हिंदुओं में मराठा या उसके समान सामाजिक हैसियत की किसी जाति का कोई छात्र भी नहीं था, यहां तक कि कोई मुस्लिम छात्र भी नहीं था. मेरे स्कूल आने के एक साल बाद दो मुस्लिम विद्यार्थी स्कूल में भर्ती हुए और बाद में एक मराठा छात्र आया. इस सब का अर्थ यह था कि शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार उस वक़्त केवल ब्राह्मण, गूजर और कायस्थों के पास ही था. शिक्षक मुझे छूते नहीं थे और छात्र भी उनका ही अनुसरण करते. धारप नाम के एक शिक्षक थे जो कहते थे मैं जब तक जिंदा रहूंगा तब तक तुम्हें नहीं छुऊँगा. कपड़ों की बात करें तो दूसरे छात्रों के समान ही मेरे कपड़े भी थे बल्कि कुछ अर्थों में उनसे बेहतर थे.

वैसे देखा जाये तो मेरे अंदर ऐसी कोई कमी नहीं थी कि मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया जाये. बहरहाल मेरे साथ होने वाले इस व्यवहार के कारण मेरे अंदर सवर्णों और दूसरी ऊँची जातियों के लोगों के प्रति द्वेष भर गया था. आते-जाते जब कोई मुझसे दूर होने को कहता तो उलटे मैं ही उससे कहता — तुम ही दूर हो जाओ. इस स्कूल में दाख़िला मिलने के पहले मैं लाडवली में रहता था. इसके बाद भी मैं लाडवली में ही रहा और वहां से करीब एक या डेढ़ मील पैदल चलकर रोज़ स्कूल आता था. उस ज़माने में ब्राह्मण और अन्य जातियों की कारस्तानियों के बारे में महारों में कई कहानियां प्रचलित थीं. स्कूल के दिनों में मां की सख़्त हिदायत थी कि किसी के हाथ का दिया न तो खाना है, न ही पीना है. यहां तक कि पान भी नहीं खाना था. पता नहीं उसमें भी कोई कुछ मिला दे!

हमारा स्कूल सुबह दस या ग्यारह बजे से शुरू होता और शाम पांच बजे छुट्टी होती थी. मैं सुबह खाना खाकर निकलता. शाम को घर आने तक बाहर पानी या खाने को छूता भी नहीं था. महाड के बाज़ार में जलावन की लकड़ी बेचने आने वाले हमारी जाति के लोगों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता था कि मैं ब्राह्मणों के लड़कों के साथ स्कूल जाता हूं. बाज़ार आने वाले कई रिश्तेदार मुझे सड़क पर खड़ा करके पूछताछ करते और चूमते थे. बाज़ार में आने-जाने वाले सफ़ेदपोश लोगों को यह बड़ा अजीब लगता था. वे इन ग़रीब लोगों का कई बार मज़ाक़ उड़ाते या फिर उनका अपमान भी करते थे. मेरी बिरादरी के इन ग़रीब लोगों को अकारण मिलने वाला तिरस्कार और उन्हें हीन समझा जाना मुझसे सहन नहीं होता था.

महाड चांभारगढ़ के पास रायगढ़ की खाई में स्थित एक छोटा शहर है. उसके दोनों ओर दो नदियां हैं — एक सावित्री नदी और दूसरी गांधारी नदी. इन दोनों ही नदियों में समुद्र का खारा पानी आ जाता इसलिए इसका पानी पीने लायक नहीं था. इस शहर में अलग-अलग जातियों के पैसे वाले लोगों के घरों में कुएं थे, जिनका उपयोग वे करते थे और जिन्हें पानी नहीं मिलता था, वे गांव के अंदर और गांव के बाहर रहने वाले लोग मीठे पानी के तालाब का काई लगा और बदबू मारने वाला पानी छान कर उपयोग में लाते थे. गांव के दुकानदारों को म्युनिसिपैलिटी प्रति हंडा एक पैसे की दर से मीठे पानी के तालाब का पानी बेचती थी. इस कारण से उनकी पीने के पानी की दिक़्क़त दूर हो जाती थी. लेकिन दूर-दूर से बाज़ार आने वाले ग़रीबों को काफ़ी तकलीफ़ें झेलनी पड़ती थीं. इनमें से महार छोड़ कर अन्य जाति के गरीब़ों को दुकानदारों से मांगने पर पानी मिल जाता या वे तालाब में जाकर पानी पी सकते थे. लेकिन महार जाति के लोगों की हालत बेहद दयनीय थी.

सवर्ण हिंदुओं द्वारा उनका किया जाने वाला अपमान और पानी के लिए होने वाली उनकी तकलीफ़ देख कर मेरा मन भर आता था. काम के कारण महाड आये लोग वापस अपने गांव लाडवली या किजलोली जाकर वहीं की नदियों से प्यास बुझा सकते थे. लकड़ी बेचने वाले ग़रीबों के अतिरिक्त महाड में मिलिटरी के पेंशनर भी आते थें. उन्हें ज़िला कार्यालय के सामने धूप में खड़े रहकर अपनी पेंशन लेनी पड़ती थी. इनमें हवलदार, जमादार जैसे पद के लोग होते थे. वे पढ़े-लिखे थे और उनका रहन-सहन भी हम लोगों से अलग होता था लेकिन उन्हें भी बाज़ार में पानी नहीं मिलता था.

हमारे स्कूल में अलग बैठकर मुझे सारे विषय समझ में आ जाते थे लेकिन ड्राइंग और ड्रिल के समय, जब एक साथ रहने की ज़रूरत पड़ती थी, मेरे शिक्षक मुझे क्लास में बैठने ही नहीं देते थे. उन दो घंटों में मैं शहर में घूमता रहता और यदि कोई पहचान का दिखता तो उसके साथ बातचीत करता था. इसी बातचीत में मुझे सूझा कि शहर के एक सूखे हुए तालाब की जगह पर चाय की दुकान खोली जाये. इससे इन लोगों की पीने के पानी की समस्या भी दूर हो जायेगी. अपनी इस योजना को कुछ महत्त्वपूर्ण लोगों को समझाने की गरज़ से मैंने महाड के महारवाडा में एक बैठक बुलायी. उस इलाक़े के अलग-अलग गांव के महार उस बैठक में आये थे. चर्चा हुई और यह तय हुआ कि उस सूखे तालाब के एक खेत में कनात बांध कर चाय की दुकान शुरू की जाये. जो यह दुकान चलायेगा वह लोगों को पीने का पानी मुफ़्त में देगा, यह शर्त थी.

इस नियम के अनुसार दुकान शुरू हुई. इसे शुरू करने वाले एक पेंशनर श्री मोहोतेकर थे. दुकान में पीने के पानी के लिए मिट्टी की बनी दो बड़ी टंकियां रखी गयीं. एक पैसे में एक कप चाय और मुफ़्त में पानी मिलने लगा. दुकानदार को पानी ख़रीदना पड़ता लेकिन ग्राहक इतने आते कि उसे यह ख़र्च अधिक नहीं लगता था. मैं लेकिन बड़े फ़ायदे में था क्योंकि मुझे चाय और पानी जितना चाहिए मिलता था और वह भी बिना पैसे के. मानो मैं ही उस दुकान का मालिक होऊं. पानी की समस्या हल करने में मेरी महत्त्वपूर्ण भूमिका है, यह लोगों की समझ में आ गया था. इससे मेरे प्रति उनका आदर बहुत बढ़ गया. उस दुकान में बैठकर लोगों के लिए चिठ्ठियां लिखने, उनकी ज़मीन के कागज़ात और उससे संबंधित पत्र आदि तैयार कर देने जैसे छोटे-मोटे काम मैं किया करता था. मैं जब स्कूल में भर्ती हुआ था, तब पूरे महाड में हम जैसे अछूतों के लिए खड़े रहने या बैठने की भी जगह नहीं थी, अब इस दुकान पर अपनी समस्याओं की चर्चा की जा सकती थी और एक संभावित संगठन के संबंध में बातचीत करने के लिए वह दुकान कार्यालय का भी काम करने लगी.

बारिश के दिनों में इस सूखे तालाब वाली जगह की सभी दुकाने बंद हो जाती थीं, उसी प्रकार हमारा होटल भी बंद हो जाता था. बारिश के बाद पुराने बाज़ार में म्युनिसिपल मार्केट के पास के पुल की बगल में म्युनिसिपैलिटी से एक छोटी सी जगह किराये से ली गयी और वहां पर मोहोप्रे गाँव के रहने वाले जोशी जी ने अपनी चाय की दुकान शुरू की. यह दुकान चूंकि बाज़ार के बीचोंबीच थी, इस कारण सवर्ण हिंदुओं ने इसे हटाने के लिए झगड़े, हाथापाई करने की भी कोशिश की लेकिन हमारी पुरानी दुकान में होने वाली हमारी चर्चाओं और संगठन के महत्त्व की समझ ने हमारे लोगों को संगठित कर दिया था और वे किसी भी धमकी के आगे झुकने वाले नहीं थे.

‘अब तो कलियुग आ गया महार भी सर पर चढ़ रहे हैं’ — इस तरह की बकवास करके हमारे विरोधी चुप बैठ गये. मेरे स्कूल जाने के एक साल के भीतर महाड के बाज़ार के ठीक बीच में हमारी दुकान का स्थापित हो जाना कोई कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं थी. मुझे स्कूल में दाख़िला मिलने का सवाल और सीमित ही सही लेकिन पीने के पानी की समस्या हमेशा के लिए हल करने की दृष्टि से महाड के बीच बाज़ार में एक होटल खोलने का सवाल- दोनों ही छुआछूत के मूल मुद्दे से संबंधित थे. ये मसले महाड के कट्टर सनातनी रूढिवादियों के घमंड पर चोट करके सामान्य सवर्ण हिंदू जनता का भ्रमजाल काटने वाले थे.

(साभार: वाम प्रकाशन)