आदिवासी, राष्ट्र और पूंजी: लोकतंत्र जो अपने मूल निवासियों को जीने नहीं देता

पुस्तक अंश: पूंजीवादी राष्ट्रवाद को आदिवासी एक रुकावट की तरह प्रतीत हो रहे हैं. इसलिए इसको इस बात का कोई दर्द नहीं कि आदिवासी समुदायों और उनकी भाषाओं का अस्तित्व ख़त्म हो रहा है. वे हिरण की कुछ दुर्लभ प्रजातियों, शेरों और बाघों की कुछ प्रजातियों को बचाने की चिंता करेंगे लेकिन इस देश के मूल निवासियों को बचाने की चिंता उन्हें नहीं है.

(पुस्तक आवरण साभार: राजकमल प्रकाशन)

यह लेख, साहित्यकार और विचारक वीर भारत तलवार की पुस्तक ‘उत्पीड़ितों के विमर्श’ (राजकमल प्रकाशन) से लिया गया है. इसमें लेखक भारतीय राष्ट्रवाद की जटिल संरचना और उसमें मौजूद गहरे अंतर्विरोधों पर आलोचनात्मक दृष्टि डालते हैं. वे बताते हैं कि किस तरह यह राष्ट्र अपने भीतर दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों, किसानों और श्रमिकों के असंतोष को दबाए रखता है और इस दमन के बावजूद एकता का आभास बनाए रखता है. तलवार रेखांकित करते हैं कि पूंजीवादी राष्ट्रवाद ने आदिवासियों और उनकी भाषाओं, परंपराओं तथा जीवन-दर्शन को हाशिए पर धकेल दिया है. यह लेख आधुनिक भारत में लोकतंत्र, पूंजी और असमानता के रिश्ते पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है.

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भारतीय राष्ट्र और आदिवासी

हिंदुस्तान में जो राष्ट्र है उससे हिंदुस्तान के कई समुदायों को शिकायत रही है. जिन समुदायों की बात मैं कहने जा रहा हूंं उसकी चर्चा यहां और लोगों ने भी की है, वे दलित है, आदिवासी हैं, औरतें हैं, बच्चे हैं. इनके अलावा कुछ उत्पीड़ित राष्ट्रीयताएं भी हैं. मजदूर वर्ग और किसान वर्ग, जिनकी राष्ट्रयज्ञ में हमेशा बलि दी जाती रही है, गहरे असन्तोष से भरे रहे हैं. इतने असन्तुष्ट वर्गों और समुदायों को लेकर, इतने गहरे अन्तर्विरोधों के साथ जो एक राष्ट्र बना हुआ है वह निश्चय ही इतिहास में चली विभिन्न प्रक्रियाओं के फलस्वरूप पैदा हुई निकटता, एकता और सामंजस्य पर आधारित होने के अलावा एक स्तर पर काफी दमनकारी सत्ता भी होगी जिसने इतने असन्तुष्ट वर्गों को एक साथ रहने के लिए बांध रखा है. इनके बीच जो अन्तर्विरोध है, इस राष्ट्र के विभिन्न समुदायों और वर्गों के बीच जो अन्तर्विरोध हैं, वे अन्तर्विरोध कई बार इतने गहरे होते हैं कि हम एक-दूसरे को बिलकुल ही नहीं समझ पाते. हम एक राष्ट्र के नागरिक हैं लेकिन एक-दूसरे के लिए अबूझ हैं. हम एक ही भाषा बोलते हैं लेकिन ऐसा लगता है कि जैसे दूसरा कोई ग्रीक या चीनी भाषा बोल रहा हो.

जब कालीचरण स्नेही कहते हैं कि डोम राजा ने सत्यवादी हरिश्चन्द्र को खदेड़ दिया था, तो सोचिए कि आज जो द्विज हिन्दू हैं, सत्यवादी हरिश्चन्द्र के आदर्श को बचपन से पढ़ते हुए बड़े हुए हैं, वो इसको किस अर्थ में लेते होंगे? जब चन्द्रभान प्रसाद कहते हैं कि अंग्रेज बहुत देर से आए और बहुत जल्दी चले गए तो राष्ट्रवादियों का क्या हाल होता होगा? या जब प्रेमकुमार मणि कहते हैं कि दुर्गा की पूजा नहीं बल्कि उसका विरोध होना चाहिए क्योंकि उसने हमारे नायक महिषासुर की हत्या की है, तो उत्साहपूर्वक दुर्गापूजा करनेवालों के बीच कैसी खलबली मचती होगी? ये वर्ग और ये समुदाय, जिनके अन्तर्विरोधों को यह राष्ट्र और राज्य किसी तरह से आधे-अधूरे ढंग से मैनेज करके चल रहा है. अभी ये पूरी तरह से जाग्रत नहीं हुए हैं, एक सेफ्टीवॉल्व के साथ इनको किसी तरह नियंत्रित करके रखा गया है. लेकिन जब ये कभी खुलकर अपनी आवाज बुलन्द करेंगे, अपनी बात कहेंगे—जो कभी-कभी कहते भी हैं—तो कैसा विस्फोट होगा? कितनी दूरी है हम सब के बीच एक ही राष्ट्र में रहते हुए! उस राष्ट्र की जड़ें कहीं-न-कहीं कमजोर भी हैं. मैं जानता इस राष्ट्र की जड़ें बहुत मजबूत भी हैं और इसके साथ ही मैं कहना चाहता हूं कि वे बहुत कमजोर भी हैं. इस अन्तर्विरोध के साथ ही यह राष्ट्र एक राष्ट्र बना हुआ है. ये अन्तर्विरोध कभी भी नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं.

राष्ट्रवाद कोई बहुत अच्छी चीज नहीं है. क्योंकि वह पहचान की विविधता और मत-भिन्नता को बुरा समझता है, उसका आदर नहीं करता. अपने अच्छे रूप में वह, यहां तक कि उसको क्रान्तिकारी भी कहा जाता है, तब होता है जब हम साम्राज्यवाद के खिलाफ उसे संगठित करते हैं. साम्राज्यवाद के खिलाफ एक राष्ट्र, खासकर साम्राज्यवाद से उत्पीड़ित राष्ट्र, एक क्रान्तिकारी तत्त्व होता है. लेकिन यह क्रान्तिकारी राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद का विरोध तभी कर सकता है जब वह अपने अन्दर के अन्तर्विरोधों को हल करने का कोई एक स्पष्ट उपाय बना ले. अगर वह अपने अन्दर के इन समुदायों और वर्गों के अन्तर्विरोधों को हल करने का कोई नक्शा नहीं तय कर पाता है, या सिर्फ बन्दूक के बल पर इनको हल कर लेगा, ऐसा समझता है, तो वह साम्राज्यवाद का भी विरोध नहीं कर सकता है. इराक इसका बहुत अच्छा उदाहरण है जहां सुन्नी मुसलमानों ने शिया और कुर्द लोगों को दबाकर राष्ट्र का निर्माण किया और अमरीकी साम्राज्यवाद ने उनके इन अन्तर्विरोधों का बहुत अच्छी तरह से और बहुत आसानी से फायदा उठाया.

एक ही राष्ट्र के अन्दर स्त्रियों का पुरुषों से कैसा अन्तर्विरोध है, इस पर भी ध्यान देना चाहिए. ‘सात खून माफ’ फिल्म की नायिका जो सात बार विवाह करती है और एक के बाद एक अपने सातों अत्याचारी पतियों की हत्या कर देती है, एक जगह कहती है कि दुनिया की हर औरत ने कभी-न-कभी तो जरूर सोचा होगा कि वह अपने पति से कैसे छुटकारा पाए? और ये सिर्फ फिल्मी डॉयलाग की बात नहीं है. ‘सिमन्तनी उपदेश’ की लेखिका ‘एक अज्ञात हिन्दू औरत’, 1882 में प्रकाशित अपनी किताब में लिखती है कि पति के मर जाने के बाद विधवा औरत की आंखों में एक चमक-सी आ जाती है. उसका स्वास्थ्य अच्छा हो जाता है और अकसर विधवाएं लम्बी उम्र तक जीती हैं. जब ऐसे वाक्य हम स्त्रियों की ओर से सुनते हैं तो उनके करवाचौथ व्रत को देखकर गर्व से फूले न समानेवाले पुरुषों का क्या हाल होता होगा? तो मित्रो! यह राष्ट्र बड़े अन्तर्विरोधों पर बैठा हुआ है और कहीं-कहीं हम एक-दूसरे के लिए बहुत अजनबी और अबूझ हो उठते हैं.

मैं सबकी चर्चा तो नहीं कर सकता, लेकिन मैं आदिवासियों के बारे में आपसे कुछ कहूंगा. इस राष्ट्र में आदिवासियों की क्या स्थिति है? किस अर्थ में वे इस राष्ट्र के अंग हैं और कैसे वे इसका अंग बने रहें? यह सवाल मैं आपके सामने रखता हूं, जवाब आपको भी सोचना है.

अभी हाल ही में दो-तीन साल पहले यूनेस्को की एक रिपोर्ट आई भाषाओं के सिलसिले में और उसने अपनी रिपोर्ट में बताया कि दुनिया की छह हजार भाषाओं में से दो सौ भाषाएं पिछले पचहत्तर वर्षों में खतम हो चुकी हैं. उनका अस्तित्व मिट चुका है. बाकी बची भाषाओं में 2500 भाषाएं संकटग्रस्त हैं. उनका अस्तित्व मिटने की ओर जा रहा है. इन 2500 भाषाओं में से 196 भाषाएं भारत की हैं और इन 196 भाषाओं में 62 भाषाएं 1950 के बाद से अभी तक यानी हिंदुस्तान में जब से लोकतंत्र आया है, मिटने की कगार पर पहुंच चुकी हैं, और 9 भाषाएं खतम हो चुकी हैं. जो 9 भाषाएं खतम हुई हैं, सब-की-सब भाषाएं आदिवासी भाषाएं हैं. इन भाषाओं का खतम होना इनको बोलनेवाले आदिवासी समुदायों के खतम होने से जुड़ा हुआ है.

हिंदुस्तान में बहुत से आदिवासी समुदाय खतम हो रहे हैं. पिछले साल ओंगे जनजाति का एकमात्र बचा हुआ व्यक्ति भी मर गया और उसके साथ ओंगे भाषा भी खतम हो गई. वह अन्तिम व्यक्ति था बचा हुआ. जारवा और सेंटिनल, दोनों समुदाय मिटने की दिशा में बढ़ रहे हैं. अंडमान-निकोबार के ये मूल निवासी हैं जहां भारत के तमाम राष्ट्रवादी ही बसाए गए हैं. झारखंड में तो कई ऐसी छोटी-छोटी जातियां हैं—असुर हैं, शबर खड़िया हैं, बिरहोर हैं, इनकी जनसंख्या कुछ हजार बच गई है. कुछ एक हजार. किसी की ढाई हजार बची है, किसी की सात-आठ हजार बची है. ये कैसा राष्ट्र है जो अपने देश के आदिवासियों को जीने नहीं देता! ये कैसा लोकतंत्र है जिसमें आदिवासी भाषाएं और आदिवासी जातियां खतम होती जा रही हैं? आप जानते हैं आदिवासियों की जनसंख्या इस देश की बाकी जनसंख्या की तुलना में बहुत पीछे है. उसकी वृद्धि का अनुपात कम है. अकसर आदिवासियों के बच्चे नहीं होते. बहुत कम बच्चे होते हैं और जो होते हैं वो जल्दी ही मर जाते हैं. आदिवासी लम्बे समय तक विवाह नहीं कर पाते. हमेशा तनावग्रस्त रहते हैं. इसलिए बाकी सामान्य रफ्तार की तुलना में उनकी जनसंख्या की वृद्धि की रफ्तार कम है.

आदिवासी से क्या समस्या है इस राष्ट्र को?

इसका एक जवाब पास्को के उदाहरण में मिल सकता है. उड़ीसा में बहुत मशहूर कम्पनी है पास्को, उसने अपना एक बहुत बड़ा स्टील प्लांट खोलना है. आप जानते हैं कि उड़ीसा के आदिवासी इलाकों में लोहे की खदानें हैं और वो समुद्र तट से बहुत करीब भी हैं. पास्को बहुत बड़ी कम्पनी है और वह शायद दुनिया का सबसे बड़ा स्टील प्लांट उड़ीसा में खोलना चाहती है, जहां लाखों टन इस्पात बनेगा. इसके लिए जो इलाका उन्होंने चुना है वहां कन्ध आदिवासी रहते हैं. बहुत बड़ा इलाका है वह और बड़े घने जंगलों से भरा हुआ है. कन्ध आदिवासियों का जंगल के प्रति एक अलग ही दर्शन है, एक अलग ही दृष्टि है. उनकी यह धर्मगाथा उनके बीच प्रचलित है कि ईश्वर ने कन्ध को जब बनाया और पृथ्वी पर भेजा तो साथ में उसको जंगल बना के दिया. उस जंगल में बहुत सारे पशु-पक्षियों को भी बनाकर दिया और ईश्वर ने कहा कि ये तुम्हारे भाई-बहन हैं. इनके साथ मिलकर रहना. मैंने इनकी सृष्टि की है. इनको किसी तरह का नुकसान मत पहुंचाना क्योंकि ये सब तुम्हारी सहायता ही करेंगे. कन्ध अपने आदिम पुरखों से चले आ रहे इस दर्शन में विश्वास करते हैं. वे जंगल को कटने नहीं देना चाहते हैं जहां पर पास्को ने अपना स्टील प्लांट खोलना है. ये आदिवासी पास्को के रास्ते की रुकावट हैं. लेकिन मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत का राष्ट्र-राज्य कन्ध आदिवासियों के साथ नहीं, पास्को कम्पनी के साथ खड़ा रहा. कहना चाहिए कि जिस राष्ट्रवाद की हम बात कर रहे हैं वह इसी पूंजी पर टिका हुआ राष्ट्रवाद है. यह पूंजीवादी राष्ट्रवाद है जिसे आदिवासी एक रुकावट की तरह प्रतीत हो रहे हैं. इसलिए इसको इस बात का कोई दर्द नहीं कि आदिवासियों के समुदायों का अस्तित्व खतम हो रहा है या आदिवासियों की भाषाओं का अस्तित्व भी खतम हो रहा है. वे हिरण की कुछ दुर्लभ प्रजातियों को, शेरों और बाघों की कुछ प्रजातियों को बचाने की चिन्ता करेंगे लेकिन इस देश के मूल निवासियों को बचाने की चिन्ता उसे नहीं है. लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली है सरकार की उदारीकरण की नीतियों के परिणामस्वरूप. सरकार उनको पैकेज देगी लेकिन उन नीतियों को नहीं बदलेगी क्योंकि, वो नीतियां अन्तरराष्ट्रीय पूंजीवाद की नीतियां हैं जिनकी यह राष्ट्र और राज्य सेवा करता है.

यह पूंजीवादी राष्ट्रवाद है, जो हमेशा से, अपने जन्म से ही, पूंजीवाद से जुड़ा रहा है. जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं वह लोकतंत्र हमेशा से औपचारिक ही रहा है. भले ही विभिन्न वर्गों की समानता का उसके संविधान में दावा किया गया हो लेकिन व्यवहार में वह समानता नहीं दिखती. इटली में पूंजीवाद का जन्म हुआ था. इटली में पूंजीवाद का विकास हुआ और इटली में ही लोकतंत्र का भी विकास हुआ. फ्लोरेंस, वेनिस सब गणतंत्रवाले नगर-राज्य थे. उस जमाने में भी, जब महान रेनेसां इटली में घटित हो रहा था, इटली का गणतंत्र पूंजीपतियों के हितों की ही सेवा करता था. मेडिची इटली का सबसे बड़ा व्यापारिक घराना था. उस व्यापारिक घराने ने फ्लोरेंस के गणतंत्र पर लगातार अपना कब्जा बनाए रखा. उसने छोटे व्यवसायियों को अपने साथ मिलाकर अपने बराबर के बड़े व्यवसायियों के व्यवसाय को चौपट करने और अपने व्यावसायिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा गणतंत्र का इस्तेमाल किया.

यह भी ध्यान रहे कि इटली के मजदूर वर्ग को वोट देने का अधिकार नहीं था और दासों को वोट देने का अधिकार नहीं था. ये अधिकार तो विभिन्न देशों में आज दे दिये गए हैं, लेकिन लोकतंत्र आज भी उन्हीं शक्तिशाली वर्गों की सेवा करता है. उनके हितों में राज्य के सारे संसाधनों को लगाता है.

इस राष्ट्र से आदिवासी क्या चाहते हैं?

आदिवासी चाहते हैं कि उनको उनके इलाके में अपने तरीके से रहने दिया जाए. राष्ट्र अगर उनका कुछ लेता है तो उनको भी राष्ट्र की दौलत में एक न्यायोचित हिस्सा मिलना चाहिए. इससे ज्यादा आदिवासियों ने कभी कुछ नहीं मांगा. स्थिति यह है कि इस देश की सारी औद्योगिक सम्पदा आदिवासी इलाकों में है. चाहे यहां का अबरख हो, चाहे लोहा, तांबा, यूरेनियम या कोई भी खनिज, वह सब आदिवासियों के इलाकों में आदिवासियों के घर-खेत के नीचे जमीन में है. जितने लोहे के बड़े कारखाने हैं चाहे भिलाई हो या बोकारो—सब-के-सब आदिवासी इलाके में हैं. देश का सबसे बड़ा औद्योगिक केन्द्र झारखंड में है. लेकिन इतने बड़े पैमाने पर औद्योगिक और प्राकृतिक सम्पदा का केन्द्र होने के बावजूद ग्रामीण झारखंड में 70 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है. यह देश के सामान्य औसत से बहुत ज्यादा है. जबकि झारखंड हिंदुस्तान की पूरी इंडस्ट्री का सबसे बड़ा केन्द्र है.

आज आदिवासियों की, किसानों की जमीन लेने के लिए राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय पूंजीवाद में होड़-सी मची हुई है. बड़ी-बड़ी कम्पनियों के द्वारा पूरे विश्व के पैमाने पर ज्यादा-से-ज्यादा जमीनें खरीदी जा रही हैं. उद्योग खोलने के लिए, खदान खोलने के लिए, कामर्शियल फार्मिंग करने के लिए, सारी दुनिया में जमीनें खरीदी जा रही हैं और ये राष्ट्रीय सरकारें ही हैं, जो कमजोर आदिवासियों और गरीब किसानों की जमीनें इन कम्पनियों को दिलाती हैं. पूंजीपति इन जमीनों को सीधे तौर पर नहीं खरीदते. वे राज्य पर दबाव डालते हैं क्योंकि वह आदिवासियों और किसानों से जमीन अधिग्रहण कर सस्ते दर पर इन कम्पनियों को दे सकता है. पूंजीवादी कम्पनियां राज्य की सरकारों पर दबाव डालती हैं कि अपनी भूमि अधिग्रहण की नीति को और उदार बनाओ. ऐसे कानून बदलो या खतम करो जो जमीन अधिग्रहण करने में रुकावट बनते हैं.

(साभार: राजकमल प्रकाशन)