नई दिल्ली: लद्दाख के प्रमुख राजनीतिक संगठनों- करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस और लेह एपेक्स बॉडी ने मंगलवार (14 अक्टूबर) को कहा कि वे राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के कार्यान्वयन की अपनी मांगों के लिए अपना शांतिपूर्ण विरोध जारी रखेंगे.
रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल अलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट्स समेत अन्य अधिकार संगठनों की एक हालिया फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान लद्दाखियों द्वारा उठाई गई मांगों का समर्थन किया गया है.
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया), नेशनल अलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट्स और हम भारत के लोग (गांधीवादी मूल्यों को कायम रखने वाला संगठन) के प्रतिनिधिमंडल द्वारा तैयार की गई इस फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि यह महत्वपूर्ण है कि भारत सरकार लद्दाखियों द्वारा की गई सभी चार मांगों को पूरा करे.
उल्लेखनीय है कि इसके लिए प्रतिनिधिमंडल ने 10 से 14 सितंबर तक लद्दाख का दौरा किया था.
‘आवश्यक, अटूट स्तंभ’
लद्दाखियों की पहली मांग यह है कि इस क्षेत्र में छठी अनुसूची लागू की जाए. दूसरी मांग राज्य का दर्जा देने को लेकर है – जिससे लद्दाख की आदिवासी बहुल आबादी को स्थानीय शासन में अधिक अधिकार प्राप्त होंगे.
तीसरी मांग लद्दाख के अपने लोक सेवा आयोग की स्थापना की है, ताकि दिल्ली से नियुक्त नौकरशाहों के बजाय स्थानीय लोग प्रशासनिक निर्णय ले सकें.
चौथी मांग यह है कि केंद्र सरकार क्षेत्र को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए दो लोकसभा सीटें, एक करगिल के लिए और दूसरी लेह के लिए आवंटित करे.
इसके अलावा लद्दाखी अब 24 सितंबर को लेह में हुई गोलीबारी की उच्च-स्तरीय न्यायिक जांच की भी मांग कर रहे हैं, जिसमें चार लोगों की जान चली गई थी और कम से कम 80 अन्य घायल हुए थे.
इसके साथ ही उनकी प्रमुख मांगों में 26 सितंबर से हिरासत में लिए गए जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को तुरंत रिहा करना भी शामिल है.
लद्दाख के लोग यह भी मांग कर रहे हैं कि गिरफ्तार किए गए और अभी भी हिरासत में रखे गए सभी 45 अन्य लोगों को भी रिहा किया जाए.
रिपोर्ट के अनुसार, आंदोलन की चार मुख्य मांगें ‘केवल बातचीत के लिए राजनीतिक बिंदु नहीं हैं; ये लद्दाख के एक विशिष्ट सांस्कृतिक और पारिस्थितिक इकाई के रूप में भविष्य के अस्तित्व के लिए आवश्यक, अटूट आधार हैं.’
रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्र सरकार को इन मांगों को पूरा करना होगा क्योंकि 2019 में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए के निरस्तीकरण के बाद, ‘बाहर के लोगों के लिए यहां के रास्ते खुल गए हैं.’
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘लद्दाख के समृद्ध प्राकृतिक संसाधन, इसके प्राचीन ग्लेशियरों और जल निकायों से लेकर ग्रेनाइट, चूना पत्थर और यहां तक कि यूरेनियम के विशाल खनिज भंडारों तक, बाहरी व्यावसायिक हितों द्वारा बड़े पैमाने पर दोहन के लिए खुले छोड़ दिए गए हैं, और स्थानीय समुदायों की इस प्रक्रिया में बहुत कम या कोई भूमिका नहीं है.’
पांच नए ज़िले
फैक्ट फाइंडिंग मिशन के लिए लद्दाख आए सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया), नेशनल अलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट्स और हम भारत के लोग के प्रतिनिधिमंडल में देश भर के कार्यकर्ता, शोधकर्ता और नागरिक शामिल थे.
‘लद्दाख को समझना’ नामक इस मिशन में विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों के साथ-साथ स्थानीय राजनेताओं से भी बातचीत शामिल थी.
प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला, कुलगाम से माकपा विधायक यूसुफ तारिगामी, केडीए के सह-अध्यक्ष असगर अली करबलाई, लेह एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष और लद्दाख बौद्ध संघ के प्रमुख छेरिंग दोरजे लाकारुक और कई अन्य लोगों से बात की.
रिपोर्ट में बताया गया है कि लाकारुक के अनुसार, अनुच्छेद 370 को कमजोर करना लद्दाख के मौजूदा संकट का मुख्य कारण था. उन्होंने कहा कि हालांकि लद्दाख के लोग कभी अपनी प्रगति के लिए केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा ज़रूरी मानते थे और 2019 में अनुच्छेद 370 के हटने का जश्न भी मनाया गया, लेकिन अब लद्दाखियों को एहसास हो गया है कि अनुच्छेद 370 ने ‘उनकी ज़मीन, उनके संसाधनों, उनकी नौकरियों और उनकी आजीविका के लिए एक ज़रूरी सुरक्षा कवच का काम किया है’.
फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पांच नए ज़िलों – शाम, नुब्रा, चांगथांग, ज़ांस्कर और द्रास – के निर्माण की घोषणा ‘बेहद चिंताजनक’ थी और इसने ‘पूरे क्षेत्र में उथल-पुथल मचा दी’.
रिपोर्ट के मुताबिक, ‘हालांकि इसे सतही तौर पर बेहतर प्रशासन के लिए एक सौम्य प्रशासनिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन सभी वर्गों के स्थानीय लोग इसे सार्वभौमिक और तीव्र रूप से क्षेत्र में अराजकता फैलाने, संसाधनों तक कॉरपोरेट पहुंच को बढ़ावा देने और सबसे कपटपूर्ण तरीके से, बाद में परिसीमन प्रक्रियाओं के माध्यम से क्षेत्र की जनसांख्यिकी को बदलने की एक रणनीतिक, पूर्व-नियोजित चाल मानते हैं.’
रिपोर्ट में कहा गया है कि चांगथांग (दुनिया में सबसे ऊंचे चरागाहों का घर) में, जहां केंद्र सरकार नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की योजना बना रही है, नियोजित सौर पार्क और खनन परियोजनाएं अन्य क्षेत्रों से हज़ारों श्रमिकों को लाएंगी.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ये श्रमिक अंततः अधिवासी का दर्जा प्राप्त कर लेंगे, जिससे क्षेत्र की ‘जनसांख्यिकीय रूपरेखा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व’ स्थायी रूप से बदल जाएगा.
पारिस्थितिक अस्तित्व और लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इसे, बहुत ही उचित कारणों से ‘जनसांख्यिकीय बाढ़’ और ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ के रूप में देखा जा रहा है, एक व्यवस्थित प्रक्रिया जो अंततः मूल निवासी पहचान, परंपराओं और आजीविका को कमजोर करेगी और छठी अनुसूची के तहत संरक्षण की मांग को स्थायी रूप से कमजोर कर देगी, जो इस क्षेत्र की विशिष्ट जनजातीय आबादी पर आधारित है.’
रिपोर्ट में बताया गया है, ‘लद्दाख के लोगों की मांगें न्यायसंगत, आवश्यक, संवैधानिक रूप से ठोस और अत्यंत आवश्यक हैं. उनकी लड़ाई पारिस्थितिक अस्तित्व, सांस्कृतिक गरिमा और भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत लोकतांत्रिक और संघीय अधिकारों की लड़ाई है.’
मानवाधिकार संगठनों के सदस्यों ने 4 अक्टूबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि 24 सितंबर को लेह में हुई गोलीबारी ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ थी क्योंकि लद्दाखियों का विरोध शांतिपूर्ण था.
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉ. गुंजन जैन ने कहा, ‘पिछले चार सालों से लद्दाख के लोग अपनी मांगें शांतिपूर्ण तरीके से उठा रहे हैं.’ कॉन्फ्रेंस में मौजूद केडीए के सदस्य सज्जाद करगिली ने कहा कि लद्दाख के साथ भी मणिपुर जैसा ही व्यवहार हो रहा है. इसके अलावा, लद्दाख में कोई लोक सेवा आयोग नहीं है.
उन्होंने कहा कि एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, लद्दाख में बेरोजगारी का स्तर 28% बढ़ गया है. करगिली नेआगे जोड़ा, ‘यह सिर्फ़ बेरोजगारी दर नहीं, बल्कि हताशा का स्तर है. यह लद्दाख और केंद्र सरकार के बीच विश्वास की कमी का स्तर है, यह विश्वासघात का स्तर है.’
करगिली ने आगे कहा, ‘बंदूकों के ज़रिए राष्ट्रवाद सिखाने की सरकार की यह व्यवस्था दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है. यह गांधी की धरती है…सरकार को यह समझना चाहिए. हम शांतिपूर्वक अपनी आवाज़ उठाते रहेंगे.’
