श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में शुक्रवार (24 अक्टूबर) को राज्यसभा की चार सीटों के चुनाव परिणाम ने उस वक्त सबको चौंका दिया, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनावी गणित को मात देते हुए यहां एक सीट अपने नाम कर ली.
इस चुनाव में ‘इंडिया’ गठबंधन ने बाकी तीन सीटों पर जीत हासिल की, जो उम्मीद के मुताबिक परिणाम रहा.
मालूम हो कि भाजपा की ओर से जम्मू-कश्मीर इकाई के अध्यक्ष सत शर्मा ने एक राज्यसभा सीट जीती है, जिन्हें चार गैर-भाजपा विधायकों ने क्रास वोटिंग कर समर्थन किया.
उन्होंने नेशनल कान्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी डार को हराया. डार चौथी सीट पर शर्मा के प्रतिद्वंद्वी थे, जिन्हें 32 वोट ही मिले, हालांकि सदन में भाजपा के केवल 28 विधायक हैं.
हालांकि यह तुरंत पता नहीं चल पाया कि गैर-भाजपा खेमे के किन विधायकों ने शर्मा को वोट दिया.
‘वह विधायक कौन थे?’
सत्तारूढ़ दल को कुल 52 विधायकों का समर्थन प्राप्त था, जिसमें उसके अपने 41 विधायक, कांग्रेस के छह, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के तीन, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का एक और अवामी इत्तेहाद पार्टी के एक विधायक शामिल थे.
इसके अलावा, सदन में छह निर्दलीय विधायक भी हैं.
पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन ने इस मुकाबले को नेशनल कॉन्फ्रेंस और भाजपा के बीच एक ‘फिक्स्ड मैच’ करार दिया.
हालांकि, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दावा किया कि सभी नेशनल कॉन्फ्रेंस विधायकों ने पार्टी के निर्देशानुसार मतदान किया लेकिन भाजपा ने चौथी सीट जीत ली, क्योंकि चार विधायकों, जिन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस उम्मीदवारों को समर्थन देने का वादा किया था, ने ‘जानबूझकर अपने वोट अमान्य’ कर दिए.
अब्दुल्ला ने एक्स पर पोस्ट किया, ‘वो विधायक कौन थे जिन्होंने वोट देते समय गलत वरीयता संख्या अंकित करके जानबूझकर अपने वोट रद्द कर दिए? क्या उनमें इतनी हिम्मत है कि वे हमें वोट देने का वादा करने के बाद भाजपा की मदद करने की बात स्वीकार करें? किस दबाव या प्रलोभन ने उन्हें यह चुनाव करने में मदद की? देखते हैं कि भाजपा की गुप्त टीम में से कोई अपनी आत्मा बेचने की बात स्वीकार करता है या नहीं!’
मालूम हो कि राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान लोकसभा चुनावों की तरह गुप्त प्रक्रिया नहीं है, लेकिन निर्दलीय विधायकों को अपने चिह्नित मतपत्र मतदान एजेंटों को दिखाने की ज़रूरत नहीं है.
नियमों के अनुसार, सदन से अयोग्य ठहराए जाने की सज़ा उन विधायकों पर लागू नहीं होती जो राज्यसभा चुनाव में पार्टी के व्हिप का पालन नहीं करते हैं.
भाजपा और एनसी पर मिलीभगत का आरोप
जम्मू-कश्मीर में एक दशक से भी ज़्यादा समय बाद पहली बार हुआ यह महत्वपूर्ण चुनाव शुक्रवार शाम 4 बजे श्रीनगर स्थित विधानसभा परिसर में संपन्न हुआ.
अधिकारियों के अनुसार, 88 में से 86 विधायकों ने मतदान किया, जबकि पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, जबकि आम आदमी पार्टी के जम्मू-कश्मीर प्रमुख मेहराजुद्दीन मलिक का वोट डाक मतपत्र के ज़रिए प्राप्त हुआ.
परिणाम घोषित होने के बाद पीसी अध्यक्ष लोन ने दावा किया कि सत्तारूढ़ पार्टी ने अपने तीसरे उम्मीदवार और पार्टी कोषाध्यक्ष गुरविंदर सिंह ओबेरॉय के लिए तीन अतिरिक्त वोट हासिल किए, जिन्हें तीसरी सीट पर विजेता घोषित किया गया.
उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा, ‘जैसा अनुमान था, मैच फिक्स था. एनसी और भाजपा की मिलीभगत. शुक्र है कि मैंने मतदान नहीं किया. सोचिए मेरी क्या हालत होती. अब गणितीय रूप से साबित हो गया है. कि यह एक फिक्स मैच था. एनसी ने तीसरे उम्मीदवार के लिए अतिरिक्त वोट क्यों हासिल किए? उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं थी. उन्होंने तीसरे उम्मीदवार के लिए 31 वोट हासिल किए. यहां सिर्फ़ 29 वोट ही काफ़ी होते. यहां तक कि 28 भी. क्योंकि भाजपा चौथी सीट के लिए लड़ रही थी. किसने क्रॉस वोट किया. किसके वोट खारिज हुए. और किसकी मिलीभगत थी.’
हालांकि, राज्यसभा चुनाव में ‘इंडिया’ ब्लॉक की एकजुटता देखने को मिली, लेकिन क्रॉस वोटिंग और खारिज किए गए वोटों के आरोप से सत्तारूढ़ पार्टी के जश्न में खटास पड़ने की संभावना है.
मुख्यमंत्री अब्दुल्ला, जो नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं, शुक्रवार सुबह विधानसभा परिसर में मतदान के लिए बनाए गए तीन मतदान केंद्रों पर सबसे पहले वोट डालने वालों में शामिल थे.
नेशनल कॉन्फ्रेंस के पूर्व मंत्री और उत्तरी कश्मीर व चिनाब क्षेत्र में पार्टी के प्रमुख चेहरे चौधरी मोहम्मद रमजान और सज्जाद किचलू ने भाजपा के अली मोहम्मद मीर और राकेश महाजन को हराकर पहली दो सीटों पर जीत हासिल की.
कांग्रेस का किस्मत
जम्मू-कश्मीर के चुनावी इतिहास में पहली बार कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव में कोई उम्मीदवार नहीं उतारा, क्योंकि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पहली दो ‘सुरक्षित’ सीटें देने से इनकार कर दिया और चौथी ‘असुरक्षित’ सीट राष्ट्रीय पार्टी को देने की पेशकश की.
उल्लेखनीय है कि 90 सदस्यों वाली जम्मू-कश्मीर विधानसभा में वर्तमान में दो सीटें रिक्त हैं.
ज्ञात हो कि नगरोटा विधानसभा क्षेत्र वरिष्ठ भाजपा नेता और विधायक देवेंद्र सिंह राणा के निधन के बाद रिक्त हुआ था, जबकि बडगाम में कोई विधायक नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री ने अपनी दूसरी सीट गंदेरबल को बरकरार रखते हुए यह निर्वाचन क्षेत्र छोड़ दिया था.
इससे पहले मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने चारों सीटें जीतने का भरोसा जताया था.
अब्दुल्ला ने पिछले हफ़्ते संवाददाताओं से कहा था, ‘इस चुनाव से पता चलेगा कि कौन भाजपा का समर्थन करता है और कौन उसका विरोधी है. पिछले एक साल में किसी भी पार्टी ने भाजपा का समर्थन नहीं किया है और वह अपने दम पर एक भी सीट नहीं जीत सकती.’
इस चुनाव में भजपा ने अपने जम्मू-कश्मीर अध्यक्ष राकेश महाजन और डॉ. अली मोहम्मद मीर को मैदान में उतारा था. लेकिन पार्टी को चार में से एक सीट जीतने के लिए गैर-भाजपाई वोटों की ज़रूरत थी.
शुक्रवार को मतदान से पहले, जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने चुनाव में सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस का समर्थन करके जम्मू-कश्मीर के नेताओं को निराश करने के लिए कांग्रेस पर निशाना साधा.
उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस डॉ. फारूक अब्दुल्ला के पीछे पड़ी है. (जम्मू-कश्मीर कांग्रेस अध्यक्ष) तारिक कर्रा द्वारा कांग्रेस आलाकमान को लिखे गए पत्रों का कोई महत्व नहीं है क्योंकि नेतृत्व शेख परिवार के कहे को महत्व देता है.’
गौरतलब है कि 2015 में हुए पिछले राज्यसभा चुनाव के बाद से जम्मू-कश्मीर में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं, जिनमें अनुच्छेद 370 को हटाना भी शामिल है, जिसके कारण पूर्ववर्ती राज्य संसद के उच्च सदन में बिना किसी प्रतिनिधि के रह गया और विधानसभा चुनाव भी स्थगित कर दिए गए.
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