लोकतंत्र का लाभार्थी मध्यवर्ग अब चुपचाप देख रहा है उसी लोकतंत्र को दरकते

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: जब किसी समाज के इतने सारे लोग यह महसूस करने लगें कि वे कुछ नहीं कर सकते; दूसरों को अच्छा-बुरा कहते-करते देख भर सकते हैं; कि उनकी एकमात्र चिंता अपने को सुरक्षित बनाए रखने की है; कि उनमें साहस और विकल्पबुद्धि बिल्कुल ही नहीं बचे हैं तो ऐसा समाज बीमार समाज है

/
(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

जब दुनिया और समय में इतनी उथल-पुथल, उतार-चढ़ाव, उलझनें और तनाव हो रहे हों तो कई बार यह तय करना मुश्किल होता है कि किया क्या जाए. बहुत सी समझ और विवेक, जो अब तक उपयोगी और सहायक लगते थे, अब काफ़ी नहीं लगते. बदलाव और उलझाव से कैसे निपटा जाए यह तय करना आसान नहीं रह गया है. इसका एक परिणाम यह हो रहा है कि बहुत से लोग, जो अन्यथा ईमानदार और भले लोग हैं, निष्क्रिय होने का चुनाव या कर्म के आयाम से अपसरण कर रहे हैं.

जो हो रहा है उससे अपने को अलग कर रहे हैं पर उसका कोई प्रतिरोध नहीं कर रहे हैं. वे अपने को एक तरह की लाचारी में बंद या कम से कम सीमित कर रहे हैं. दुनिया और समय उनकी पकड़ और समझ से बाहर हो गए हैं और वे चुप और निष्क्रिय होने में ही अपनी बचत देखते हैं. इसका सीधा आशय यह है कि इस समय जो हिंसा-अनाचार-अन्याय-अत्याचार-हिंसा आदि हो रहे हैं उनको लेकर अगर वे उद्वेलित और बेचैन हों भी तो भी वे कुछ कहना-करना नहीं चाहते. यह सिर्फ़ किसी तरह की झंझट में पड़ने से अपने को बचाना भर नहीं है- यह अपनी संवेदनशीलता और विवेक को, अपनी न्याय-बुद्धि को विजड़ित और स्थगित करना है.

उनमें से कुछ हैं जो दूसरों के हितैषी भी हैं और उन्हें यह भली सलाह देते हैं, जो सयानी भी लगती है, कि हम सभी को उन्हीं की तरह मुखरता और सक्रियता से दूर रहना चाहिए क्योंकि समय ख़राब और अपने को बचाना ही जिजीविषा का एकमात्र प्रकार बचा है. जीने की इच्छा बचने की इच्छा में सिमट गई है.

इस लाचार स्वीकार का एक पक्ष यह भी है कि ख़ासकर मध्यवर्ग की प्रश्नवाचकता लगभग ग़ायब हो चुकी है. उसका एक बड़ा हिस्सा जो देश भर में शिक्षक के रूप में जीवनयापन करता है न तो नई शिक्षा नीति में निहित दूरगामी दुष्परिणामों पर कोई बहस कर रहा है, न ही वह शिक्षा तंत्र की स्वायत्तता में लगभग हर रोज़ हो रही कटौती पर सवाल उठा रहा है.

तर्क इस लाचारी का यह भी है कि प्रश्न पूछने या प्रतिरोध करने से क्या हासिल होगा, क्या बदलेगा. प्रतितर्क यह हो सकता है कि फिर जीने से ही क्या हासिल है और क्या बदलता है.

लोकतंत्र से पूरा लाभ उठाने वाला मध्यवर्ग अब उसी लोकतंत्र को ईंट दर ईंट दरकाते-तोड़ते चुपचाप देख रहा है. नैतिक कृतघ्नता की ऐसी व्याप्ति अभूतपूर्व है. एक और स्तर पर यह मध्यवर्गीय व्यक्तियों का किसी सामुदायिकता या सामाजिक ज़िम्मेदारी के अहसास से अपसरण है.

जब किसी समाज के इतने सारे लोग यह महसूस करने लगें कि वे कुछ नहीं कर सकते; दूसरों को अच्छा-बुरा कहते-करते देख भर सकते हैं; कि उनकी एकमात्र चिंता अपने को सुरक्षित बनाए रखने की है; कि उनमें साहस और विकल्पबुद्धि बिल्कुल ही नहीं बचे हैं तो ऐसा समाज बीमार समाज है जिसका अंतःकरण और विवेक विजड़न में फंस गए हैं और जो अंततः न अपने को बचा पाएगा, न कुछ और को. वह अस्ताचलगामी है.

कई यथार्थ

आम धारणा यह है कि यथार्थ तो एक ही हो सकता है, उसे देखने-समझने से तरीके कई हो सकते हैं. यह बात ज़्यादातर हिसाब में नहीं ली जाती कि यथार्थ को देखने-समझने के तरीकों से एक ही यथार्थ प्रकट नहीं होता, कई यथार्थ प्रगट होते हैं. साहित्य और कलाओं में जो सृजन होता है वह दिए हुए यथार्थ का संस्करण भर नहीं होता, अक्सर वह यथार्थ में इज़ाफ़ा होता है.

वे अपनी कल्पना-शक्ति और सृजन-कौशल से यथार्थ को व्यक्त भर नहीं करते बल्कि, अपने सबसे सर्जनात्मक क्षणों में, नया यथार्थ रच देते हैं. अलग और भिन्न होते हुए भी जो यथार्थ रचा जाता है, वह उतना ही यथार्थ होता है जितना तथाकथित सर्वसम्मत लोकमान्य यथार्थ.

ये बातें मन में उठीं पिछले दिनों रंगकर्मी अनामिका हकसर के हबीब तनवीर स्मृति व्याख्यान को सुनते हुए. व्याख्यान का शीर्षक था : ‘भारतीय यथार्थवाद की बदलती वर्णमाला’.  उन्होंने बहुत उत्साह और समझ के साथ, मोहक स्पष्टता से, समकालीन रंगमंच, विशेषतः हिंदी रंगमंच में अपने समय और समाज के यथार्थ को खोजने, व्यक्त-विन्यस्त करने की जो अलग-अलग रंगदृष्टियां और रंगशैलियां उभरी हैं, उनका विवेचन किया.

हबीब तनवीर, अलकाज़ी, बव कारन्त, नीलम मान सिंह, बंसी कौल, एमके रैना, मोहन महर्षि, भानु भारती से लेकर रतन थियम, कावलम नारायण पणिक्कर आदि अनेक रंगकर्मियों के काम में यथार्थ के, दोनों मानवीय और भारतीय यथार्थ के, अनेक रूपों का विश्लेषण किया. मैंने कम ही रंगकर्मी ऐसे देखे हैं जो दूसरे रंगकर्मियों के रंगकार्य और दृष्टियों का ऐसी समझ और संवेदना से एहतराम और आकलन करते हों.

यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय रंगमंच में व्यक्त और चरितार्थ यथार्थ विपुल-विविध है, अत्यंत गतिशील और परिवर्तनशील है. उसमें ये अनेक तरह के यथार्थ क्लासिकस के पुनराविष्कार, लोकपरंपराओं से संवाद, आधुनिकता के अनेक खोजों और विधियों से, खुलेपन और ग्रहणशीलता से संभव हुए हैं. ये चरितार्थ यथार्थ या रंगरचित यथार्थ जीवन के किसी एक अंग या हिस्से तक महदूद नहीं रहे हैं- उनमें से बहुलता, आपस में द्वंद्व और तनाव हैं, जो संघर्ष और संवाद हैं उन सबने मिलकर रंगमंच को समृद्ध और प्रासंगिक किया है. जैसे जीवन बहुल है वैसे ही रंगमंच भी. उसमें स्पंदन, उल्लास, निराशा, उम्मीद, प्रश्नांकन, नैतिक ऊहापोह, दबाव-तनाव आदि सब के लिए जगह रही है.

अनामिका हकसर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और मास्को से रंगदीक्षित हैं. हाल ही में उनकी बनाई एक असाधारण फिल्म लोकप्रिय हुई है. वे अपनी रंगदृष्टि और प्रतिबद्धता पर क़ायम रहकर दूसरों के काम, अपनी रंगपरंपरा और समकालीनता की दुनिया को, उसकी समस्याओं और चुनौतियों को धीरज और सहानुभूति के साथ देखती और बताती हैं. एक तरह की व्यापक सामाजिकता पर उनका आग्रह है पर वे अंतर्लोक की उथल-पुथल और तनावों को अलक्षित नहीं जाने देतीं.

मंगलेश लय

मंगलेश डबराल पर ‘उद्भावना’ पत्रिका ने एक बड़ा और विस्तृत विशेषांक प्रकाशित किया है जिसमें लगभग पांच सौ पृष्ठों में मंगलेश, उनकी कविता, गद्य, संगीतप्रेम, यारबाशी, अनुवाद आदि पर विपुल सुचिंतित सामग्री एकत्र की गई है. उन्हें गए पांच बरस होने आए पर यह देखकर नैतिक संतोष होता है कि उन्हें और उनके किए-धरे की स्मृति और पहचान ज़्यादातर नाशुकरे हिंदी साहित्य-समाज में बची और सजीव है.

हिंदी साहित्य में, उसकी विशालता के बरक़्स उसके साहित्य में महत्व का परिवार बहुत बड़ा नहीं है. उसमें मंगलेश अपनी जगह रखते हैं. वे गहरी स्थानीयता, उत्कट समयबोध और सघन स्मृतियों के शिल्पी कवि हैं. उनकी कविता में जीवन के अपार स्पंदन सुने-पहचाने जा सकते हैं. वे साझीदार और सहचर कवि हैं जिनकी कविता में जीवन के असबाब भरे पड़े हैं. वे किसी तरह की भाषिक या वैचारिक अतिशयता से, अतिरेक से, गलदश्रु भावुकता से मुक्त रहे.

अपने बिल्कुल शुरू के दिनों में लिखी गई बड़बोली कविताओं को छोड़ दें (जिनकी कर्कशता पर मैंने 60 के दशक के उत्तरार्द्ध में कर्कश प्रहार किया था) तो मंगलेश की कविता में सुगठन है, वे सुशिल्पित हैं और उनमें भाव या शब्द की फ़िजूलखर्ची नहीं है. उनके यहां एक तरह का मोहक साफ़-सुथरापन है और ज़्यादातर उनकी कविता गद्य के शिल्प में है, पद्य के शिल्प में नहीं. पर उनका गद्य-शिल्प अपनी अचूक लय रखना है जिसे मंगलेश लय कहा जा सकता है. यह लय वे सामान्य जीवन की सामान्य चीज़ों और सामान्य घटनाओं को दर्ज़ करते हुए बुनते हैं इसलिए उसमें सहज आत्मीयता है.

प्रतिबद्धता और प्रतिभा के बीच तनाव होना अनिवार्य है और ऐसे कवि में तो निश्चय ही जिसके लिए भाव प्रवणता और वैचारिक सघनता दोनों ही ज़रूरी हों. मंगलेश ने इस तनाव को किसी एक के पक्ष में नहीं झुकाया और दोनों को अपने शिल्प में संयमित किया: उनकी कविता भावुकता से और वैचारिक बोझिलता दोनों से बच गई.

उनकी कविता में ऐन्द्रियता है वह चीज़ों, व्यक्तियों, घटनाओं आदि तक सीमित नहीं है- उनके यहां, अपने सर्वोत्तम सर्जनात्मक क्षणों में, वैचारिक ऐन्द्रियता भी है. अक्सर उनकी कविता के वैचारिक पक्ष का विश्लेषण करते समय यह ऐन्द्रियता को हिसाब में लेना छूट जाता है.

मंगलेश डबराल को हिंदी की दो विशिष्ट परंपराओं में अवस्थित किया जा सकता है. पहली परंपरा है हिंदी आधुनिकता में साधारण की ऐन्द्रियता और महिमा की. दूसरी है मुक्तिबोध से लेकर रघुवीर सहाय-श्रीकान्त वर्मा-धूमिल आदि से आगे आती हुई समाज में हिंसा-हत्या, षड्यंत्र-दुष्चक्र को पहचानने, दर्ज़ करने, अंधेरों की शिनाख़्त करने की परंपरा. उनमें जो अप्रत्याशित और अनोखा है वह इन्हीं दो परंपराओं के उत्तराधिकार से उपजा नवाचार है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)