एक दशक हो गया. दादरी में मोहम्मद अखलाक़ की कुछ लोगों ने इस आरोप पर हत्या कर दी थी कि उसने गोवध किया था और गोमांस अपने घर रखा था. उस समय देश के कई भागों में ऐसी वारदातें हो रही थीं जिनमें तीन लेखकों-बुद्धिजीवियों की हत्या भी शामिल थी. इस बढ़ती असहिष्णुता के विरुद्ध पहले हम तीन लेखकों उदय प्रकाश, नयनतारा सहगल और मैंने अपने साहित्य अकादेमी पुरस्कार वापस करने का फ़ैसला लिया. बाद में लगभग पचास और लेखकों ने विभिन्न भाषाओं और प्रदेशों से ऐसे ही पुरस्कार वापस किए.
असहिष्णुता का मुद्दा व्यापक रूप से, पालतू मीडिया तक में, ज़ेरे बहस आ गया. हमें ‘अवॉर्ड वापसी गैंग’ कहकर राजसत्ता आदि ने लांछित करने की कोशिश की.
एक दशक बीत गया है और इस बीच झूठ-घृणा-असहिष्णुता-हिंसा कई गुना बढ़ चुकी है और बड़े पैमाने पर सक्रिय है. इतनी कि यह लगने लगा है कि हमारे समाज में सद्भव, असहिष्णुता और समझदारी, सच और समझ तेज़ी से घट रहे हैं; लगता है बहुत कम बचे हैं.
अब ठीक दस बरस बाद, ख़बर आई है कि अख़लाक की हत्या के सिलसिले में जिन दस लोगों के विरुद्ध अदालत में हत्या आदि के मामले चल रहे थे और जिनमें गवाही आदि दर्ज़ करने की प्रक्रिया चल रही है, उन मामलों को उत्तर प्रदेश सरकार ने वापस लेने का फ़ैसला किया है और संबंधित अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह इन मामलों को समाप्त कर दे.
इस मामले में यह निर्विवाद है कि अखलाक की मारपीट से हत्या हुई और यह क़ानूनन जघन्य अपराध है. जो लोग पकड़ गए वे भी, निर्विवाद है, मारपीट में शामिल थे. तो किस आधार पर सरकार इस मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश कर रही है? यह अपने अधिकार का दुरुपयोग करने के बराबर है. एक नागरिक की हत्या हो गई और उसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को दंड नहीं दिया जाएगा यह कैसे सर्वथा अनैतिक नहीं है?
अगर तर्क यह है कि पर्याप्त सुबूत नहीं मिल सके हैं तो यह पुलिस की कोताही है और उसके कारण न्याय से वंचित करना उसे ढांकने जैसा है. यह तर्क तो संभव नहीं है कि अभियुक्तों को दस साल जेल भुगतने के बाद मानवीय आधार पर छोड़ा जा रहा है क्योंकि वे तो पहले से ही ज़मानत पर छुट्टा घूम रहे हैं.
सत्ता का यह नया व्यवहार है कि पहले असहिष्णुता को बढ़ावा दो जिसके कारण हिंसा को और फिर जब हिंसा जो जाए तो या तो उसकी अनदेखी करो या फिर थोड़ा समय बीत जाने के बाद, अवैध सहिष्णुता बरतते हुए, उन्हें अदंडित छोड़ दो. यह निंदनीय तो है ही पर यह भी ज़ाहिर करता है कि असहिष्णुता भरा व्यवहार अब लगभग वैध सामाजिक व्यवहार के रूप में मान्य है. क्या यह नैतिक पतन नहीं है? क्या यह संविधान से जानबूझकर किया जा रहा अपसरण नहीं है?
[एक वरिष्ठ लेखिका ने हाल ही में अवॉर्ड वापसी प्रसंग में कहा कि जिन लेखकों ने पुरस्कार लौटाए, उन्होंने जो धनराशि लौटाई थी वह साहित्य अकादेमी ने नहीं ली और वह उनके पास रही आई और वह उन्होंने अन्यत्र किसी सामाजिक गतिविधि के लिए नहीं दी.
औरों की नहीं जानता पर मैंने असहिष्णुता के विरोध में 2016 में, अन्य मित्रों के साथ मिलकर, ‘प्रतिरोध’ नाम से दो बड़े आयोजन किए थे जिनमें कृष्णा सोबती, रोमिला थापर आदि कई मूर्धन्यों ने मुखर होकर भाग लिया था. मैंने इन आयोजन पर आए ख़र्च के लिए एक लाख रुपये दिए थे. इसका सार्वजनिक उल्लेख सहसंयोजक संपादक ओम थानवी एकाधिक बार कर चुके हैं. यह वही राशि है जो मैंने पुरस्कार के साथ, उसमें मिली राशि में ब्याज जोड़कर, अकादेमी को लौटाई थी जो उसने नहीं ली थी. विरोध में लौटाई गई यही राशि फिर विरोध पर ही ख़र्च की गई.]
धर्मों से संवाद
इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर, नई दिल्ली में ‘आज गांधी’ विषय पर कुछ कहने का सुयोग हुआ. उसमें मैंने अपने राजनीतिक-सामाजिक जीवन में एक भूल सुधार करने का प्रस्ताव किया: धर्म, हमारे समाज में, सक्रिय और सशक्त संस्थाएं हैं. अपने उन्हें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमने असंबोधित छोड़ दिया और भारत के सभी आठ धर्म, कुल मिलाकर, लोकतंत्र में स्वतंत्रतापूर्वक रहते हुए भी, लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों से पिछड़ गए हैं.
भारतीय संविधान द्वारा एक नया सामाजिक धर्म प्रस्तावित किया है जिसका आधार चार मूल्य हैं: स्वतंत्रता, समता, न्याय और भाईचारा.
हुआ यह है कि इन मूल्यों को हमारे धर्मों ने किसी ठोस ढंग से स्वीकार नहीं किया है और उनमें से अधिकांश में जो संकीर्णता-असहिष्णुता-घृणा-हिंसा आदि बढ़ते जा रहे हैं, वे प्रमाण हैं कि धर्मों के लिए संविधान कोई विशेष अर्थ नहीं रखता है. अगर संविधान को उन्होंने हिसाब में लिया होता तो उसके बुनियादी मूल्यों की रोशनी में उन्होंने अपने आचरण, अनुष्ठान, सार्वजनिक अभिव्यक्ति, विचार में कुछ परिवर्तन किया होता.
उलटे, न सिर्फ़ यह परिवर्तन नहीं हुआ है, धर्मों में से अधिकांश का सार्वजनिक आचरण लोकतंत्र और संविधान के विरोध में हो रहा है. विशेषतः हिंदू धर्म का बड़ा हिस्सा तो राजनीति का पिछलगुआ हो गया है, उसका अपने अध्यात्म और धर्मचिंतन से नाता ही टूट चुका है.
जैसा कहा जाता है कि राजनीति को सिर्फ़ राजनेताओं पर नहीं छोड़ा जा सकता, वैसे ही कहना चाहिए कि धर्मों को धर्मनेताओं पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए. ज़रूरी है कि अनेक स्तरों पर धर्मों से संवाद शुरू किया जाए. संवाद करने में दोनों ओर हिचक साफ़ नज़र आती है. अपनी नई राजनीतिक प्रासंगिकता के गुरूर में धर्मों को लग सकता है कि उन्हें ऐसे किसी संवाद की कोई ज़रूरत नहीं है.
दूसरी ओर, लोकतंत्र-संविधान से प्रतिबद्ध लोगों को लगता है कि ऐसा संवाद करने से उनकी धर्मनिरेपक्षता संदिग्ध हो जाएगी. इन पूर्वाग्रहों को व्यापक जनहित और भारतहित में त्यागना ज़रूरी है. धर्मों में उदारचित्त लोग ज़रूर हैं और होंगे और उनकी शिनाख़्त कर उनसे संवाद कई चरणों में हो. एक चरण हो सकता है जिसमें एक ही धर्म के अनुयायियों के बीच संवाद हो और फिर दूसरा चरण जिसमें कई धर्मों से मिलकर संवाद हों.
यह पहल ऐसे लोगों को करनी चाहिए जो स्वयं अपने धर्म विशेष की परंपरा, चिंतन, अध्यात्म और इतिहास को जानते हों, जो लोकतंत्र और संविधान में आस्था रखते हों और जिनका उस तनाव को कम या दूर करने का इरादा हो जो लोकतंत्र और धर्मों के बीच है. आदर्श तो यह हो कि उदारचित्त नागरिक और उदारचित्त धर्मनेता संयुक्त रूप से ऐसे संवाद का आवाह्न करें. यह कठिन है, असंभव नहीं.
यह सुझाव में पहले भी दे चुका हूं कि धर्मों के बीच लगातार संवाद, उनके चिंतन और अध्यात्म के अध्ययन और अनुसंधान, उनके लंबे इतिहास और परंपरा आदि के विशद अभिलेखन और शोध आदि के उद्देश्य से एक उच्च स्तरीय भारतीय धर्म संस्थान बनाना चाहिए.
प्रसिद्ध दार्शनिक रामचन्द्र गांधी ने दशकों पहले प्रस्तावित किया था कि विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों को लेकर एक धर्म संसद स्थापित की जानी चाहिए जिसमें तमाम मुद्दों और विवादों पर खुला विचार-विनिमय संभव हो सके. खुद धर्मों के बीच जो अस्वस्थ होड़ सी लगी है और अक्सर उनमें परस्पर अनबोला है, उन्हें कम करना ज़रूरी है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
