अवध के नवाबों की विलासिता के सच्चे-झूठे इतने किस्से न सिर्फ अवध बल्कि उसके बाहर भी प्रचलित हैं कि कोई उन्हें गिनने बैठे तो गिनता ही रह जाए. लेकिन एक वाजिद अली शाह की बेदखली को लेकर उनके प्रति उमड़े भावनाओं के ज्वार को छोड़ दें तो इस बाबत कोई किस्सा बहुत मुश्किल से मिलता है कि इन नवाबों के बुरे दिन आए और बुरे दिनों की जायी मजबूरियों ने उन्हें विषम व विडंबनापूर्ण हालात के हवाले कर दिया तो उन पर और उनके सपनों के शहर लखनऊ पर कितनी बुरी बीती, उसे उन्होंने किस तरह सहा.
यह तब है, जब उन हालात में वे बिल्कुल बेचारे कहें या विकल्पहीन होकर रह गए थे. साहिर लुधियानवी द्वारा किसी और प्रसंग में कहे गए शब्द उधार लेकर कहें तो उनकी हालत कुछ ऐसी हो गई थी कि: ज़मीं सख़्त है आसमां दूर है, बसर हो सके तो बसर कीजिए. क़फ़स तोड़ना बाद की बात है, अभी ख़्वाहिश-ए-बाल-ओ-पर कीजिए.
साफ कहें तो उनकी धुन का कुछ इस तरह अंत हो गया था कि वे परवाज़ का अपना सारा हौसला खो बैठे थे. इस बाबत क्यों और कैसे के जवाब जानने हों तो बात उर्दू के अजीम शायर मीर तकी मीर (1723-1810) के साथ लखनऊ में घटित हुए एक वाकये से शुरू करनी होगी.
मीर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दिल्ली को उजड़ते और लखनऊ को आबाद होते देखा था. साठ पार की उम्र में वे नादिरशाह के कत्ल-ओ-गारत से उजाड़ और बेनूर हो चुकी दिल्ली से अजीबोगरीब हाल व हुलिए में लखनऊ (जो तब अपने नए अंदाज पर इतरा रहा था) में ‘दाखिल-ए-महफिल’ हुए तो लखनवियों को खुद पर हिकारत भरी हंसी हंसता पाया था.
फिर तो शायर सुलभ दर्प से भरकर उन्होंने अपना परिचय कुछ इस तरह दिया था: क्या बूद-ओ-बाश पूछो हो पूरब के साकिनो, हम को गरीब जान के हंस-हंस पुकार के, दिल्ली जो इक शहर था आलम में इंतिखाब, रहते थे मुंतखब ही जहां रोजगार के. उसको फलक ने लूट के वीरान कर दिया, हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के.’
एक जैसी बदकिस्मती
इतिहास गवाह है कि लखनवियों की इस हंसी की उम्र बहुत लंबी नहीं हो पाई. क्योंकि आगे चलकर अंग्रेजों ने दिल्ली और लखनऊ दोनों के हुक्मरानों को बेबस कर उनका हाल लगभग एक जैसा कर डाला. दिल्ली में बादशाह बहादुरशाह जफर (1775-1862) की हुकूमत लाल किले तक सीमित कर दी, तो लखनऊ में नवाब वाजिद अली शाह (1822-1887) की हुकूमत कैसरबाग की ऐतिहासिक पीली चहारदीवारियों तक.
इन दोनों की बदकिस्मती इस मायने में भी एक जैसी थी कि 11 फरवरी, 1856 को वाजिद अली शाह से अवध का राजपाट छीनकर उन्हें कल्कत्ता (अब कोलकाता) स्थित मटियाबुर्ज निर्वासित किया जाना 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का सबब बना, तो बहादुरशाह जफर को पहले अपने बेटों के कटे हुए सिर देखकर फिर रंगून निर्वासित होकर उस संग्राम की विफलता की कीमत चुकानी पड़ी.
अलबत्ता, उस स्वतंत्रता संग्राम ने विफल होने के बावजूद जहां जफर का देश के आखिरी मुगल बादशाह का तमगा बरकरार रखा, वहीं वाजिद अली शाह से अवध के आखिरी नवाब का तमगा छीनकर उनके बेटे बिरजिस कदर के नाम कर दिया.
गौरतलब है कि इस संग्राम में बिरजिस कदर अपनी वीरांगना मां बेगम हजरतमहल के अभिभावकत्व में अंग्रेजों से दिल्ली के पतन के बाद तक लोहा लेते रहे थे. फिर भी इतिहासकार वाजिद और जफर की तुलना से परहेज बरतते हैं. कारण यह कि क्रूर अंग्रेजों ने रंगून में निर्वासन के दौरान जफर को जितना सताया, वाजिद को उसके दसवें हिस्से के बराबर भी यातनाएं नहीं झेलनीं पड़ीं. इसलिए कई इतिहासकार वाजिद की बहादुरशाह जफर के बजाय 17वें मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय से तुलना करना ज्यादा पसंद करते हैं.
यहां जान लेना चाहिए कि शाह आलम द्वितीय (1728-1806) की ताजपोशी के वक्त तक मुगल सल्तनत ढहने लग गई थी. मराठों की मदद से शाह आलम को बादशाहत तो, खैर जैसे-तैसे, मिल गई थी, लेकिन उसका इकबाल इस कदर जाता रहा था कि फारसी में कहावत चल निकली थी: सल्तनत-ए-शाहआलम अज दिल्ली ता पालम. यानी शाहआलम की हुकूमत दिल्ली से पालम तक ही है.
1856 में नवाबों के आखिरी दिनों में लखनऊ में वाजिद अली शाह की मजबूरियां भी कुछ ऐसी ही थीं. तिस पर विडंबना यह कि कई बार उनके सेवक तक उनकी मजबूरियों का मजाक उड़ाने पर उतर आते थे.
बेबसी का मज़ाक़
एक दिन तो गुलनार नाम की उनकी एक मुंहलगी कनीज ने हद ही कर दी थी.
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा जारी किया गया चांदी का एक विक्टोरियन सिक्का गुलाबी जरीदार पोश से ढकी तश्तरी में लेकर वह वाजिद के पास आई और बोली, ‘सुल्तान-ए-आलम! कंपनी का यह सिक्का अब सारे लखनऊ में जोर-शोर से चलने लगा है, जबकि आपके सिक्के आंखों से ओझल हो चले हैं. अब सिर्फ कैसरबाग ही है, जहां आपकी हुकूमत बाकी है और इसका भी कुछ ठिकाना नहीं कि कब तक बाकी रहेगी.’
इकबाल वाले दिन होते तो वाजिद उस गुस्ताख कनीज को मजा चखाए बगैर न रहते. लेकिन तब तक ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों ने उनके कस-बल इतने ढीले कर दिए थे कि वे झुंझलाने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे. ऐसा नहीं कि वह विक्टोरियन सिक्का देखकर उन्हें गुस्सा नहीं आया. बहुत आया, लेकिन वह अंग्रेजों से ज्यादा खुद की बेबसी के खिलाफ था.
उन्होंने तश्तरी में रखे सिक्के पर अपनी नजरें कुछ इस तरह गड़ा दीं जैसे उसे अपनी निगाहों की गरमी से ही भस्म कर देना चाहते हों. फिर दाहिने हाथ से उठाया और अंगूठे व उंगलियों के बीच इतनी जोर से रगड़ दिया कि न अंगूठे की तरफ की उसकी विक्टोरिया की छाप सलामत रही, न उंगलियों की तरफ की इबारत. फिर कनीज को हुक्म दिया, ‘इसे फौरन बेलीगारद के अहाते में फेंक आओ, रेजीडेंसी में.’
कनीज हुक्म बजाकर लौटी तो उन्हें लगा कि अंग्रेजों से उनका इंतकाम पूरा हो गया है. निस्संदेह, यह इकबाल का नहीं, बेबसी का इंतकाम था.
जिज्ञासा स्वाभाविक है कि 1856 में नवाबी से बरबस अपदस्थ और लखनऊ से निर्वासित कर दिए जाने के बाद उन पर और उनके लोगों पर क्या गुजरी?
‘द वायर हिंदी’ के पाठक 01 जुलाई, 2023 को ‘जब क्वीन विक्टोरिया ने अवध की राजमाता से मिलना तक ज़रूरी नहीं समझा था…‘ शीर्षक टिप्पणी में पढ़ चुके हैं कि उनकी मां, जो अवध की राजमाता थीं, एक शिष्टमंडल के साथ ब्रिटेन की क्वीन विक्टोरिया से मिलने और ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अपने बेटे के साथ की गई नाइंसाफी की शिकायत करने लंदन गईं तो विक्टोरिया ने उनकी मदद करना तो दूर, दस महीनों तक उनसे भेंट करना भी गवारा नहीं किया था.
लेकिन यहां यह समझना गलत होगा कि अंग्रेजों ने अवध के नवाबों, उनके वंशजों और आश्रितों का मानमर्दन वाजिद अली शाह को अपदस्थ और निर्वासित करने के बाद शुरू किया.
‘द वायर हिंदी’ द्वारा 18 मई, 2025 को ‘अवध के नवाबों के दुर्दिन में अंग्रेज़ रेजीडेंटों ने उन्हें बहुत सताया था, दो को तो ज़हर तक दिलवाया!‘ शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी बताती है कि बक्सर में 22-23 अक्टूबर, 1764 को हुई लड़ाई में दिल्ली के मुगल बादशाह और अवध व बंगाल के नवाबों की सेनाएं मिलकर भी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं को हरा नहीं पाईं और अपने माथे पर शर्मनाक पराजय का कलंक लगाकर लौटी थीं. तभी से इन नवाबों के बुरे दिन शुरू हुए और बदगुमान अंग्रेजों ने तभी से उन्हें नाकों चने चबवाना शुरू कर दिया था.
हां, 1857 में आजादी की पहली जंग में सूबे के बागियों ने अपना अभियान शुरू किया तो कुछ ही दिनों में अंग्रेजों को खदेड़कर उनकी सत्ता रेजीडेंसी तक सीमित कर दी थी और उन्हें कई महीनों तक उसी में घेरे रखा था. अलबत्ता, कई भीषण भिड़ंतों के बावजूद वे रेजीडेंसी में घुसकर उन्हें सबक सिखाने का अरमान पूरा नहीं कर पाए थे और 17 नवम्बर, 1857 को कानपुर की ओर से भारी कुमुक लेकर आए अंग्रेज कमांडर कालिन कैम्पवेल के हाथों करारी शिकस्त खा गए थे.
दरबार, रेजीडेंसी और रेजीडेंट
इस सिलसिले में एक अल्पज्ञात तथ्य यह है कि नवाबों को इससे पहले भी रेजीडेंसी कतई नहीं सुहाती थी. क्योंकि उनके निकट वह उनकी उस बेबसी का ही स्मारक थी. उस बेबसी का, जिसके चलते उन्हें अंग्रेजों से संधि करके अपनी हुकूमत में उनका दखल स्वीकारना और उनके रेजीडेंट को अपने खर्चे पर लखनऊ में रखना पड़ा था.
नवाब आसफउद्दौला ने बेबसी में ही 1780 में लखनऊ में गोमती के दक्षिणी किनारे पर रेजीडेंसी के निर्माण की नींव डाली थी.
बीस साल बाद सआदत अली खां द्वितीय के वक्त उसके तामीर होने तक यह बेबसी इतनी बढ़ गई थी कि वे अपने लिए नया महल बनवाकर उससे दूर रहने की सोचने लगे थे. गोकि उन्हें इतना वक्त नहीं मिला. उनके बेटे गाजीउद्दीन हैदर गद्दी पर बैठे तो वे गोरे रेजीडेंट को फूटी आंखों भी नहीं देखना चाहते थे.
कारण यह कि रेजीडेंट द्वारा राजकाज में रोज-रोज के दखल ने उनके या उनके हाकिमों के फैसलों की कोई अहमियत ही नहीं रहने दी थी. वे फैसले जिनके भी खिलाफ होते, वह रेजीडेंट के पास जाता और उन्हें बदलवा लाता.
अंततः गाजीउद्दीन ने सोचा कि क्यों न रेजीडेंसी को दरबार से इतनी दूर हटा दिया जाए कि रेजीडेंट चाहकर भी उसके कामों में ज्यादा दखल न दे सके. उन्होंने गवर्नरजनरल को पत्र लिखा कि रेजीडेंसी बने पचास साल हो गए हैं. इस बीच नवाबी खानदान बढ़ गया है और रेजीडेंसी उसके लिए बनवाई गई नई कोठियों के बिल्कुल पास ही है. इससे उन कोठियों में रह रही नवाबों की परदानशीन बेगमों और रेजीडेंट दोनों के सम्मान पर बुरा असर पड़ रहा है. दरबार के अन्य कामों के लिए भी जगह कम पड़ने लगी है. इसलिए बेहतर होगा कि रेजीडेंसी को हटाकर मूसाबाग ले जाया जाए.
लेकिन अंग्रेजों को बेगमों की निजता का सम्मान भी गवारा नहीं हुआ. उन्होंने टके-सा जवाब दे दिया कि रेजीडेंसी के इर्द-गिर्द सभी कोठियां वहां के हालात से वाकिफ होकर बनवाई गई हैं इसलिए उनकी बिना पर रेजीडेंसी हटाने का कोई औचित्य नहीं है. इस कारण और कि नवाबी खानदान के लिए आलीशान फरहतबख्श कोठी भी उपलब्ध है.
इसके साथ ही रेजीडेंट ने रेजीडेंसी के स्थानांतरण के विरुद्ध कई और कारण गिना दिए तो बेचारे गाजीउद्दीन झुंझलाकर रह गए. उनके एक हाकिम ने दिलकुशा स्थित उनके आरामगाह को ही नई रेजीडेंसी बनाने का सुझाव दे दिया तो उसे दंडित भी कर डाला. लेकिन उनके वारिस नासिरउद्दीन हैदर ने 1831 में चारबाग क्षेत्र में नई रेजीडेंसी बनवाकर देना मान लिया तो भी अंग्रेज उस पर राजी नहीं हुए और कई बहाने बना दिए.
यह तब था, जब नासिरुद्दीन हैदर ने गिड़गिड़ाते हुए लिखा था कि रेजीडेंसी के कारण उनकी बेगमों का गैरमर्दों की नजरों से बच पाना मुश्किल हो रहा है. यह भी कि अब रेजीडेंसी आबादी के बीच आ गई है और रेजीडेंट के लिए हरे-भरे व साफ-सुथरे चारबाग क्षेत्र में रहना ज्यादा सम्मानजनक होगा.
फिर तो नवाबों के रेजीडेंसी को हटाने का सपना देखते-देखते उनकी नवाबी ही चली गई और अंग्रेजों द्वारा 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को नाकाम कर देने के बाद उन पर और उनके अपनों पर ज़ुल्म व सितम की हद हो गई.
सूबे पर दोबारा कब्जे के बाद अंग्रेजों ने जो कत्ल-ओ-गारत मचाई, उसके कहर से तो आम व खास कोई भी नहीं बच पाया. लखनऊ के बारे में तो जहां कुछ लोग कहते थे कि उसमें बहुत कुछ बदल गया है, वहीं कुछ अन्य यह भी कि वक्त के सितम ने उसे ‘वह’ नहीं रहने दिया, जो वह पहले था.
हालांकि बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज भी खत्म हो गया था और ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने सत्ता अपने हाथ में ले ली थी. लेकिन जहां आखिरी उम्मीद के भी नाउम्मीद हो जाने से नवाबों और उनके लोगों पर बुरी बीत रही थी, कंपनी के अंग्रेज अफसरों की पुरानी हनक पर कोई असर नहीं पड़ा था.
न तीन में न तेरह में
उनके विपरीत नवाबों के वंशज और आश्रित न तीन में रह गए थे, न तेरह में और कई मायनों में उनका बेचारों में शुमार किया जाने लगा था. यों, अंग्रेज अफ़सर पहले भी उन्हें अच्छी निगाहों से नहीं ही देखते थे, लेकिन अब हर कदम पर अपमानित करने के मौके ढूंढते रहते थे. किसी मामले में उनका जरा-सा भी ‘कुसूर’ पा जाते तो शेखी भुला और जेल भेज देने को धमकाते और जी भरकर सताते. कई बार ऐसी धमकियों पर अमल भी कर दिखाते.
मोहर्रम के दौरान कानपुर में एक अंग्रेज महिला की हत्या कर दी गई तो जैसे उन्हें इसका नया बहाना मिल गया. हालांकि कानपुर में वाजिद अली शाह के वक्त भी उनके बजाय ईस्ट इंडिया कंपनी की ही हुकूमत थी, अंग्रेजों ने नवाब अहमद अली पर उक्त महिला के कत्ल की तोहमत मढ़ी और लाव-लश्कर के साथ लखनऊ में उनके निवास से उन्हें पकड़कर जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया.
वे बेचारे गिड़गिड़ाते रह गए कि मुहर्रम चल रहा है, अय्याम-ए-अजा (शोक की अवधि) है और उन्हें अपना खुद का ताजिया भी दफनाना है.
सच्चाई यह थी कि उक्त अंग्रेज महिला की हत्या से उनका दूर-दूर तक का लेना-देना नहीं था. न उसमें उनकी लिप्तता का कोई सबूत था, न ही कोई सच्चा गवाह. फिर भी उनसे खार खाए अंग्रेज अफसरों ने उनके खिलाफ ऐसा जाल बिछाया, साथ ही ऐसे सिखाए-पढ़ाए गवाह जुटाए कि कानून के जानकार कहने लगे कि अब तो उनको फांसी होकर ही रहेगी.
लेकिन भला हो उस कातिल का, जिसका जमीर ऐन वक्त पर जाग गया. उसने सोचा कि गोरी महिला की हत्या के पाप की गठरी तो उसके सिर पर लदी ही हुई है, निर्दोष नवाब को फांसी हो गई तो वह गठरी और भारी हो जाएगी. फिर तो इससे पहले कि नवाब को सजा सुनाई जाती, उसने अदालत में आत्मसमर्पण कर खुद को कानून के हवाले कर दिया.
नवाब को जान की अमान मिली तो जो पहली बात याद आई, वह यह कि उनका ताजिया दफन होने से रह गया है. इसलिए रिहा होते ही उन्होंने उसे दफन करने नंगे सिर व नंगे पांव कर्बला जाने की इजाजत मांगी. पहले तो अंग्रेज अफसरों ने यह कहकर इससे मनाकर दिया कि अब तो चेहल्लुम तक हो चुका, लेकिन बाद में उनकी बहुत चिरौरी-मिनती पर रबी-उल-अव्वल महीने की आठवीं तारीख को इस शर्त पर अनुमति दे दी कि वे पूरी तरह चुप यानी खामोश रहकर बिना किसी हुल्लड़ व हंगामे के अपना ताजिया कर्बला ले जाएंगे.
नवाब के पास यह शर्त मान लेने के अलावा कोई चारा नहीं था. इसलिए वे निश्चित तारीख पर चुपचाप कर्बला जाकर अपने ताजिये के दफन की रस्म पूरी कर आए.
लेकिन लखनवी तो लखनवी! अगले बरस से उन्होंने इस चुप्पी को भी अपनी परंपरा बना लिया. वे हर आठ, रबी-उल-अव्वल को ताजिये निकालने लगे. वे जुलूस की शक्ल में नवाब की ही तरह चुप्पी साधे कर्बला जाते, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रुककर सीने पीटकर मातम करते और ताजिये दफनाते.
कुछ साल बाद ताजियों के इस जुलूस का नाम ही ‘चुप ताजिया’ हो गया और अय्याम-ए-अजा को चेहल्लुम के बजाय आठ, रबी-उल-अव्वल तक माना जाने लगा.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
