कोलकाता स्थित सीगल फाउंडेशन हर वर्ष युवा इतिहासकारों का एक वार्षिक समागम ‘इतिहास और शांति’ श्रृंखला के अंतर्गत करता है. इस बार का विषय था ‘इतिहास और साहित्य’. यह समागम पहले कोलकाता में और बाद में बुलन्दशहर में हुआ. बाद वाले में भाग लेने का सुयोग हुआ. उसके सत्र विद्याज्ञान स्कूल के दसवीं-बारहवीं कक्षाओं के छात्र-छात्राओं के सामने हुए.
मैंने यह कहने की कुछ कोशिश की कि इन दिनों हमारे आसपास इतिहास कुछ ज़्यादा ही मुंड़राने लगा है. इतिहास इस समय राजनीतिक और सामाजिक एजेंडा पर है. वह सत्ताधारी दल के प्रोपगैंडा का हिस्सा है. सरकारी विज्ञापन ऐतिहासिकता से अंटे पड़े हैं. इतिहास का एक वॉट्सऐप विश्वविद्यालय ही खुल गया है.
इतिहास, इन दिनों, कई रूपों में हमारे सामने है. वह पुरातात्विक अवशेषों, वृत्तांतों, कथाओं और किंवदंतियों आदि में है. वह इतिहासकारों द्वारा, साक्ष्य के आधार पर, लिखा, बखाना और विश्लेषित किया जा रहा है. उसके लोकप्रिय रूप प्रचलन में हैं; कुछ जीवन-प्रक्रियाओं, अनुष्ठानों, सामुदायिक स्मृति, समारोहों-उत्सवों आदि में. परिवर्तित पाठ्यपुस्तकों, टीवी के गोदी चैनलों, सिनेमा, सोशल मीडिया आदि से उसका विचारधारात्मक प्रचार और संप्रेषण हो रहा है.
इतिहास और साहित्य दोनों सचाई, उसकी जटिलताओं-अंतर्विरोधों, उसकी अंतरध्वनियों आदि को अपना उपजीव्य बनाते हैं. इतिहास ज़्यादातर उससे ताल्लुक रखता है जो सार्वजनिक क्षेत्र में होता है जबकि साहित्य उसके साथ-साथ निजी अंतर्जगत् से भी संबंधित होता है. इतिहास ज़्यादातर बहिर्मुख होता है, साहित्य अंतर्मुख भी. सचाई पर दोनों में से किसी का एकाधिकार नहीं होता, न हो पाता है.
इतिहास और साहित्य दोनों की सचाई के गल्प रचते हैं. साहित्य अपनी गल्पता खुले ढंग से स्वीकार करता है पर इतिहास को अपनी गल्पता स्वीकार करने में हिचक है, होती है.
इतिहास और साहित्य दोनों ही कल्पना, खोज और आविष्कार का सहारा लेते हैं. दोनों सच खोजने और कहने की कोशिश करते हैं. पर जीवन और सचाई की विराट्ता और जटिलता के आगे दोनों अपर्याप्त साबित होते हैं. दोनों ही बखान के, आख्यान के प्रकार हैं और अपने बखान में कुछ चुनते, कुछ छोड़ देते हैं.
साहित्य के लिए जीवन का रोज़मर्रापन उसकी सर्जनात्मकता का केंद्र होता है: वह अनुभव पर आधारित होता है जबकि इतिहास साक्ष्य पर. इतिहासकार और साहित्यकार दोनों किसी न किसी दृष्टि से लिखते हैं: न कोई तटस्थ साहित्य होता है, न तटस्थ इतिहास. साहित्य में भाषा स्वयं माध्यम भर नहीं, अनुभव भी होती है जबकि इतिहास में अधिकतर माध्यम.
आम तौर पर इतिहास विशिष्ट तथ्यों आदि से सामान्यीकरण की ओर जाता है जबकि साहित्य सामान्यीकरणों से बचता है: साहित्य नतीजे नहीं निकालता. उसमें ‘कुल मिलाकर’ या कि उपसंहार कुछ नहीं होता. वह खुला होता है और उसके कई आशय संभव होते हैं.
हमारा समय, दुर्भाग्य से ऐसा है, झूठ के घटाटोप में है: झूठ के साधन-संपन्न और शक्तिशाली निज़ाम ने सच को दबोच लिया है- वह लगातार दबाया-हड़काया, हाशिये पर डाला जा रहा है. घटनाओं, प्रसंगों, आयोजनों आदि के जो वृत्तांत और विश्लेषण ज़्यादातर मीडिया में आते हैं, वे अक्सर सचाई से दूर, अक्सर झूठ और नफ़रत में लिपटे होते हैं. हम यह आसानी से समझ नहीं सकते कि सचाई क्या है.
ऐसे में सच दरअसल अल्पसंख्यक हो चुका है और उसे खोजना और कहना जोखिम का काम हो गया है. लगता है कि ऐसी स्थिति में आज इतिहासकारों को अतीत के अलावा या कभी-कभार उसके बजाय वर्तमान को भी देखने-समझने का काम हाथ में लेना चाहिए. जब वर्तमान में फैले झूठ अतीत का हिस्सा हो जाएंगे तो उनके आधार पर बने वृत्तांत झूठे और अप्रामाणिक होंगे. अगर तब की तब पर छोड़कर, इतिहासकार आज सच बोलने की हिम्मत करें तो यह अपने आप में ऐतिहासिक होगा. हम कह सकेंगे कि जब सभी झूठ बोल रहे थे और उसमें यक़ीन करने वालों की संख्या विकराल हो चुकी थी, तब साहित्यकार और इतिहासकार, अल्पसंख्यक होकर भी, सच बोलने का जोखिम उठा रहे थे.
कई बार बहुत अप्रीतिकर अचरज होता है कि हमारे समाज में इतनी घृणा, इतना झूठ, इतनी हिंसा, इतनी विस्मृति कैसे व्याप्त गई है. शायद इतिहासकारों को भारतीय समाज में घृणा, झूठ, हिंसा, विस्मृति के संशोधित तथ्यपुष्ट इतिहास लिखना चाहिए. कई बार यह भी लगता है कि इतिहास की लगातार दुर्व्याख्याएं, ग़लतबयानी आदि हो रही हैं और इतिहासकारों का समुदाय इसका सशक्त प्रत्याख्यान नहीं करता. मीडिया, क्लासरूम, पत्र-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया आदि पर विशेषज्ञ इतिहासकारों को, स्वयं अपने अनुशासन की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के हित में, मुखर प्रत्याख्यान करना चाहिए.
समकालीन इतिहासकारों का समवर्ती साहित्यकारों के साथ संवाद बहुत कम या शिथिल हो ऐसा संवाद बढ़ना चाहिए. कभी फ़ुरसत में इतिहासकारों को समकालीन साहित्य भी पढ़ना चाहिए, कुछ और नहीं तो यही जानने के लिए कि वहां समय-समाज-व्यक्तियों में जो हो रहा है वह कैसे और कितना दर्ज़ हो रहा है, कि सच की आंच और ताब कैसे वहां बची हुई है.
साहित्य ज़्यादातर वर्तमान को दर्ज़ और समझने की कोशिश करता है पर उसमें कुछ न कुछ अतीत भी अंतर्ध्वनित होता है. इतिहास ज़्यादातर अतीत पर केंद्रित होता है पर उसमें भी वर्तमान अंतर्ध्वनित होता है. यह आपसी समझ और भारतीय सभ्यता के इस मुक़ाम पर दोनों के आपद्धर्म और नैतिक ज़िम्मेदारी का सजग अहसास संवाद के कई आयाम खोल सकते हैं.
साधारण की कठिनाई
ऐसा लगता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में प्रक्रियाओं आदि का ऐसा जटिल उलझाव हो गया है कि सीधा-सादा जीवन बिताना संभव नहीं रहा. हर जगह तरह-तरह के कार्ड चाहिए- आधार से लेकर कई तरह के. आधार भी नहीं चलता मसलन चुनाव के अंतर्गत. अगर आपके पास सही वक़्त पर ये कार्ड नहीं है तो आपका अस्तित्व ही संदेह के घेरे में आ जाएगा. अगर आप इन तरह-तरह के कार्डों में नहीं हैं तो आप हैं ही नहीं!
मैंने अपने जीवन के लगभग सत्तर बरस एक भारतीय नागरिक, बिना किसी कार्ड, बिना किसी पहचान पत्र के बखूबी बिताए हैं. कहीं भी कोई पहचानपत्र प्रस्तुत करने की बाध्यता नहीं थी. विदेश में भी पासपोर्ट पर्याप्त होता था.
नई टेक्नोलॉजी आयी जिसने, निश्चय ही, कई चीज़ें सुगम सुलभ बनाईं. पर यही टेक्नोलॉजी निगरानी का माध्यम भी बन गई. सत्ता इसी टेक्नोलॉजी के सहारे आपकी निगरानी करती है. सभी नागरिक राज्य की निगरानी में हैं.
इस व्यवस्था का पूरी तरह से सक्षम होना संभव नहीं हुआ है: घुसपैठिये, आतंकवादी हमले और विस्फोट होते रहते हैं जिनको रोकने के लिए ही निगरानी की पूरी व्यवस्था बनाई गई है. पर इस निगरानी ने साधारण जीवन लगभग बेवज़ह, कठिन कर दिया है. नतीजा यह है कि हर नागरिक संदिग्ध बना दिया गया है. अब तो उसे अपनी नागरिकता का सुबूत भी देना होगा.
अगर आपको पास क्रेडिट कार्ड या बैंक का कोई कार्ड नहीं है, जो मेरे पास नहीं हैं, तो आप आसानी से कुछ खरीद नहीं सकते. एक टेक्नोलॉजिकल व्यवस्था ने आपको क़ैद कर लिया है और आप आसानी से उससे मुक्त नहीं हो सकते. टेक्नोलॉजी की ऐसी गुलामी अभूतपूर्व है. यह हमारा लोकतंत्र बहुत उत्साह से कर रहा है. उसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की बहुत जगह नहीं है.
हम जैसे लोग पिछड़े हुए लोग है. यह और बात है कि लोकतंत्र ऐसे पिछड़ों में ही किसी हद तक रचा-बसा और बचा है. हम लोग तो फिर भी साधन-संपन्न लोग हैं. जिनके पास ऐसे साधन नहीं हैं, उनकी ज़िंदगी तो पल-पल पर इतनी कठिन होती जा रही है कि उसका बहुत सारा वक़्त इन प्रक्रियाओं को समझने और उनका पालने करने में बीतता है.
एक ऐसी अर्थव्यवस्था में, जिसमें 5 प्रतिशत लोगों के हाथ में देश की दौलत का पचास प्रतिशत है, यह टेक्नोलॉजी और प्रक्रिया द्वारा लादी गई नई गुलामी है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
