नई दिल्ली: केंद्र की मोदी सरकार के भारत को विश्वगुरु बनाने के दावे के बीच सोमवार (1 दिसंबर) को संसद में पेश किए गए आंकड़ों से पता चला है कि देश में सरकारी स्कूलों की संख्या में पिछले छह वर्षों में लगातार गिरावट देखी गई है, जबकि शून्य या 10 से कम छात्रों के नामांकन वाले स्कूलों की संख्या में वृद्धि हुई है.
रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस सांसद अमरिंदर सिंह राजा वारिंग और कार्ति पी. चिदंबरम के एक प्रश्न के जवाब में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने संसद को बताया कि सरकारी स्कूलों की कुल संख्या 2019-20 के 10,32,570 से घटकर 2024-25 में 10,13,322 हो गई है.
आंकड़ों के अनुसार, 2019-2024 के बीच जिन राज्यों में सरकारी स्कूलों की कुल संख्या में सबसे ज़्यादा गिरावट देखी गई, उनमें मध्य प्रदेश, ओडिशा और जम्मू-कश्मीर शीर्ष पर हैं.
मध्य प्रदेश में 7,000 से ज़्यादा स्कूलों की संख्या में कमी देखी गई है, यानी यहां कुल स्कूलों की संख्या 2019-20 में 99,411 थी, जो अब 2024-25 में घटकर 92,250 रह गई है. इसके बाद ओडिशा में 4,600 से ज़्यादा और जम्मू-कश्मीर में 4,300 से ज़्यादा स्कूल बंद हुए हैं.

2024-25 में जिन राज्यों में सबसे ज़्यादा स्कूल बंद हुए, उनमें बिहार (1890), हिमाचल प्रदेश (492) और कर्नाटक (462) सबसे आगे हैं.
उल्लेखनीय है कि शिक्षा के लिए एकीकृत ज़िला सूचना प्रणाली (UDISE+) से प्राप्त आंकड़ों से यह भी पता चला है कि दस से कम या शून्य छात्र नामांकन वाले सरकारी स्कूलों की संख्या 2022-23 में 52,309 से बढ़कर 2024-25 में 65,054 हो गई है.
हालांकि, इसी अवधि में ऐसे स्कूलों में शिक्षकों की संख्या में बढ़ोतरी देखी हैई है जो, 1.26 लाख से बढ़कर 1.44 लाख हो गई है.
सरकारी डेटा के अनुसार, 2024-25 में कम नामांकन वाले स्कूलों की सबसे अधिक संख्या वाले राज्य पश्चिम बंगाल (6,703), उत्तर प्रदेश (6,561) और महाराष्ट्र (6,552) हैं.

इस संबंध में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती, पारिश्रमिक और तैनाती संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकार क्षेत्र में आती है.
उन्होंने आगे कहा, ‘केंद्र सरकार समग्र शिक्षा की केंद्र प्रायोजित योजना (सीएसएस) के माध्यम से बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम, 2009 में निर्धारित मानदंड, जो समय-समय पर संशोधित हुए हैं, के अनुसार स्कूली शिक्षा के विभिन्न स्तरों के लिए उचित छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है.’
गौरतलब है कि सरकारी शिक्षा नीतियों में तमाम सुधार के दावे के बावजूद देश में स्कूलों की हालत सुधरती नहीं दिख रही है. संसद में मंत्री के जवाब में भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिर सरकारी स्कूलों की संख्या में गिरावट की असल वजह क्या है और क्या यह गिरावट विलय, बंद होने या पुनर्प्रयोजन (दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल) होने की वजह से है, इसका कोई विवरण नहीं दिया गया है.
