फिल्म समीक्षक संघ ने ‘धुरंधर’ की समीक्षाओं पर हुए हमलों की निंदा की, कहा- दांव पर सिर्फ एक फिल्म नहीं है

फिल्म समीक्षक संघ (एफसीजी) ने फिल्म 'धुरंधर' की समीक्षा करने वाले समीक्षकों और पत्रकारों पर इस सप्ताह हुए लक्षित हमलों और उत्पीड़न की कड़ी निंदा की है. संघ का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक फिल्म से कहीं अधिक गंभीर है.

धुरंधर फिल्म की समीक्षा को लेकर कई आलोचकों को निशाना बनाया जा रहा है. (फोटो: फिलम के ट्रेलर का स्क्रीनग्रैब)

नई दिल्ली: फिल्म समीक्षक संघ (एफसीजी) ने फिल्म ‘धुरंधर‘ की समीक्षा करने वाले समीक्षकों और पत्रकारों पर इस सप्ताह हुए लक्षित हमलों और उत्पीड़न की कड़ी निंदा की है.

रिपोर्ट के मुताबिक, संघ ने समीक्षकों के साथ एकजुटता दिखाते हुए कहा, ‘इस तरह का हस्तक्षेप स्वतंत्र फिल्म आलोचना के मूल सिद्धांतों पर प्रहार है और ये उस संपादकीय स्वायत्तता को कमजोर करता है जिस पर एक सुचारू सांस्कृतिक परिवेश टिका होता है.’

मालूम हो कि गिल्ड भारत का पहला पंजीकृत फिल्म समीक्षक संघ है, जिसकी स्थापना अगस्त 2018 में हुई थी. भारत के 13 शहरों में प्रिंट, डिजिटल प्लेटफॉर्म और रेडियो सहित विभिन्न मीडिया माध्यमों से जुड़े इसके 57 सदस्य हैं.

इसकी प्रबंध समिति में अनुपमा चोपड़ा, भारती प्रधान, उदिता झुनझुनवाला, स्तुति घोष, शोमिनी सेन, सचिन चट्टे, अर्नब बनर्जी, अनुज कुमार और सुचरिता त्यागी शामिल हैं.

संघ का पूरा बयान

फिल्म समीक्षक संघ धुरंधर की समीक्षाओं के लिए समीक्षकों पर लक्षित हमलों, उत्पीड़न और घृणा की कड़ी निंदा करता है. असहमति से शुरू हुआ मामला तेजी से समन्वित दुर्व्यवहार, व्यक्तिगत समीक्षकों पर निजी हमलों और उनकी पेशेवर ईमानदारी को धूमिल करने के संगठित प्रयासों में तब्दील हो गया है.

हाल के दिनों में, हमारे कई सदस्यों को धमकियों का सामना करना पड़ा है, जिनमें प्रत्यक्ष धमकियां और उनकी राय को दबाने के उद्देश्य से चलाए गए दुर्भावनापूर्ण ऑनलाइन अभियान शामिल हैं, केवल इसलिए कि उन्होंने किसी फिल्म पर अपनी पेशेवर  समीक्षा प्रस्तुत की.

इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि मौजूदा समीक्षाओं में हेरफेर करने, संपादकीय निर्णयों को प्रभावित करने और प्रकाशनों को अपना रुख बदलने या नरम करने के लिए राजी करने के प्रयास किए गए हैं.

यह सब हाल के दिनों में फिल्म उद्योग के विभिन्न पक्षों द्वारा फिल्म आलोचना को लगातार कमतर आंकने और उसका उपहास उड़ाने के बाद हो रहा है. इस तरह का हस्तक्षेप स्वतंत्र फिल्म आलोचना के मूल पर प्रहार करता है और उस संपादकीय स्वायत्तता को कमजोर करता है जिस पर एक कार्यशील सांस्कृतिक पारिस्थितिकी तंत्र निर्भर करता है.

समीक्षा पर इस तरह की पाबंदी लगाना एक खतरनाक मिसाल कायम करता है. पेशेवर फिल्म समीक्षकों के पूर्वाग्रह या राजनीतिक स्वार्थ होने के दावे निराधार और दुर्भावनापूर्ण हैं.

फिल्म समीक्षकों को अपना काम करने के लिए डराया नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह जैसे आलोचना को सोशल मीडिया पर एक पंक्ति की प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं किया जा सकता और न ही उससे प्रचार संबंधी कथनों के अनुरूप होने की अपेक्षा की जा सकती है.

हम देश भर में अपने सहयोगियों की सुरक्षा और सलामती को लेकर भी बेहद चिंतित हैं. किसी भी पेशेवर को सिर्फ अपना काम करने के लिए व्यक्तिगत बदनामी का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए.

हम जनता, फिल्म उद्योग और सभी हितधारकों से आग्रह करते हैं कि वे यह समझें कि किसी फिल्म को पसंद या नापसंद करना आपका अधिकार है, लेकिन समीक्षकों से किसी एक पक्ष का अनुसरण करने की अपेक्षा करना उचित नहीं है.

यह समय सामूहिक चिंतन का है.

यह मामला सिर्फ एक फिल्म से कहीं अधिक गंभीर है. सांस्कृतिक संवाद की अखंडता आलोचकों की स्वतंत्र और निडर होकर बोलने की क्षमता पर निर्भर करती है.

हम संयम, सम्मान और उन सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता का आह्वान करते हैं जो कला, वाद-विवाद और आलोचना को एक साथ चलने की अनुमति देते हैं.