नई दिल्ली: उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्या मामले में बीते कई दिनों से जारी विरोध प्रर्दशन और जन आक्रोश के बाद आखिरकार ‘रहस्यमयी वीआईपी’ भूमिका के सवालों से घिरी राज्य की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने शुक्रवार (9 जनवरी) को सीबीआई जांच को मंजूरी दे दी है.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में एक अलग घटनाक्रम में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित अनिल जोशी द्वारा दायर शिकायत के संबंध में देहरादून में एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें कथित तौर पर मामले में शामिल वीआईपी के खिलाफ जांच की मांग की गई थी.
मालूम हो कि अंकिता भंडारी के लिए न्याय की मांग करते हुए विपक्षी दलों और विभिन्न अन्य नागरिक समाज संगठनों ने 11 जनवरी को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया था.
वीआईपी कौन है?
उल्लेखनीय है कि मई 2025 में कोटद्वार की एक जिला अदालत द्वारा तत्कालीन भाजपा नेता और रिसॉर्ट मालिक विनोद आर्य के बेटे पुलकित आर्य और उनके दो सहायकों सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को हत्या के आरोप में दोषी ठहराए जाने के बाद तीनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी.
हालांकि, एक बार फिर हाल ही में यह मामला सुर्खियों में तब आया, जब टेलीविजन अभिनेत्री उर्मिला सनावर ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट के जरिए संकेत दिया कि अंकिता भंडारी मामले में जिस ‘वीआईपी’ की बात हो रही थी, वह दुष्यंत गौतम हैं.
सनावर ने आरोप लगाया था कि भाजपा नेता और ज्वालापुर के पूर्व विधायक सुरेश राठौर ने चार साल पहले अपनी पहले से शादीशुदा होने का खुलासा किए बिना उनसे ‘शादी’ की थी. अब राठौर से अलग हो चुकी अभिनेत्री ने दावा किया कि पूर्व विधायक ने ही उन्हें बताया था कि गौतम रिसेप्शनिस्ट की हत्या से जुड़ा ‘रहस्यमय वीआईपी’ है.
अभिनेत्री द्वारा लगाए गए नए आरोपों के बाद उत्तराखंड सरकार ने ‘पूरे मामले की जांच’ के लिए सात सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था. लेकिन अंकिता के माता -पिता और नागरिक समाज के लोग लगातार इस पर सवाल उठा रहे थे. इसके विरोध में कई दिनों तक उत्तराखंड की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन भी देखा गया.
हालांकि, गौतम ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है और सनावर के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है. दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह एक अंतरिम आदेश पारित कर गौतम को हत्या मामले से जोड़ने वाली सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने का आदेश दिया था.
हालांकि, सीबीआई जांच और जोशी की शिकायत के बाद वीआईपी मामला और भी विवादित हो गया है.
ज्ञात हो कि इस मामले में नई एफआईआर दर्ज करवाने वाले जोशी एक पर्यावरणविद् हैं और हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज एंड कंजर्वेशन ऑर्गनाइजेशन चलाते हैं.
जोशी कहते हैं, ‘भले ही अंकिता भंडारी हत्याकांड में शामिल आरोपियों को सजा मिल चुकी है, लेकिन सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म पर यह दावा किया जा रहा है कि मामले से जुड़े कुछ सबूत छिपाए गए या नष्ट कर दिए गए.’
उन्होंने आगे कहा, ‘इसलिए पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि अज्ञात वीआईपी की भूमिका को लेकर स्वतंत्र जांच की जाए. चूंकि पूरा मामला इन अज्ञात वीआईपी से संबंधित है, इसलिए तथ्यों को सामने लाने के लिए एक अलग, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है.’
वहीं, इस संबंध में गढ़वाल के आईजी राजीव स्वरूप ने कहा कि आगे की कार्रवाई देहरादून के वसंत विहार पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर के आधार पर की जाएगी.
उन्होंने कहा, ‘अंकिता की हत्या के संबंध में कई आरोप और अफवाहें फैलाई जा रही हैं. इसके परिणामस्वरूप मुख्यमंत्री ने अभिभावकों से बात की और उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की. मुख्यमंत्री ने हमें प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया. शनिवार को दर्ज एफआईआर को पीएचक्यू (पुलिस मुख्यालय) भेज दिया गया है, जिसे सचिवालय भेजा जाएगा और बाद में सीबीआई जांच के लिए केंद्र सरकार को अग्रेषित किया जाएगा.’
आईजी राजीव स्वरूप ने यह भी बताया, ‘पहले दिन से ही मुख्यमंत्री ने हमें सक्रिय रूप से काम करने के लिए कहा था. एक महिला अधिकारी के नेतृत्व वाली एसआईटी ने मामले की गहन जांच की. आरोपियों को कड़ी सजा सुनाई गई. पुलिस और सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि न्याय मिले. हालांकि, आरोप फिर से सामने आ गए हैं… मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया है कि मामले को उच्च स्तर पर ले जाया जाए.’
‘नई एफआईआर वीआईपी को बचाने का एक तरीका है’
वहीं, कांग्रेस जोशी की शिकायत को इस मामले में कथित ‘वीआईपी’ को बचाने का एक तरीका मान रही है.
इस संबंध में कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना ने कहा, ‘सीबीआई जांच की सिफारिश करने के बाद भी कथित वीआईपी को बचाने की तैयारियां साथ-साथ शुरू हो गई हैं. इस दिशा में पहला कदम पद्म भूषण पुरस्कार विजेता डॉ. अनिल प्रकाश जोशी द्वारा दर्ज की गई एफआईआर है, जिसकी जांच सीबीआई करेगी.’
उन्होंने आगे कहा, ‘इस नई एफआईआर की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि अंकिता भंडारी मामला लक्ष्मणझूला थाने में दर्ज मूल एफआईआर के दायरे में आता है. उस एफआईआर की जांच की गई, उसके बाद आरोप पत्र दाखिल किया गया और कोटद्वार सत्र न्यायालय में मुकदमा चला, जिसमें तीन आरोपियों को दोषी ठहराया गया.’
सूर्यकांत धस्माना के अनुसार, ‘…गढ़वाल के आईजी के बयान से ऐसा लगता है कि सीबीआई स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के बजाय डॉ. अनिल प्रकाश जोशी द्वारा दर्ज की गई इस नई एफआईआर के आधार पर जांच आगे बढ़ा सकती है.’
इस संबंध में सीपीआई (एमएल) के राज्य सचिव इंद्रेश मैखुरी ने भी कांग्रेस से सहमति जताई और कहा कि जोशी की शिकायत उत्तराखंड सरकार की मंशा पर गंभीर संदेह पैदा करती है.
उन्होंने कहा, ‘अनिल प्रकाश जोशी की इस मामले में कभी कोई भूमिका नहीं रही है और वे आम तौर पर सरकार समर्थक रुख के लिए जाने जाते हैं. इससे यह संदेह पैदा होता है कि उत्तराखंड सरकार एक बार फिर इस मामले में गुमराह करने का प्रयास कर रही है.’
बंद को लेकर प्रशासन ने कहा- शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार
रविवार को बंद के मद्देनज़र गढ़वाल आईजी ने कहा कि हालांकि सभी को शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है, लेकिन किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
बंद के आह्वान पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा, ‘यह एक निरंतर संघर्ष का हिस्सा है. जब तक सरकार सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में सीबीआई जांच नहीं कराती, तब तक हम अपनी मांग जारी रखेंगे और संघर्ष करते रहेंगे क्योंकि इस हत्या और इसके विभिन्न पहलुओं की जांच आवश्यक है.’
उन्होंने यह भी कहा कि नई एफआईआर अंकिता के माता-पिता को दर्ज करानी चाहिए थी, न कि जोशी को.
गौरतलब है कि 2022 में हरिद्वार के पास वनतारा रिसॉर्ट में काम करने वाली 19 वर्षीय रिसेप्शनिस्ट अंकिता भंडारी के साथ कथित बलात्कार और हत्या के मामले ने उत्तराखंड में बढ़ते अपराध दर को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी थी. यह पहाड़ी राज्य ऐतिहासिक रूप से कम आपराधिक गतिविधियों के लिए जाना जाता रहा है.
जांच के दौरान पीड़िता के एक दोस्त ने पुलिस को बताया कि भंडारी की हत्या संभवतः इसलिए की गई क्योंकि उन्होंने एक वीआईपी मेहमान की ‘एंटरटेन’ करने की ज़बरन मांग को ठुकरा दिया था. हालांकि, व्यापक रूप से चर्चित होने के बावजूद इस मामले के ‘वीआईपी’ पहलू का उल्लेख आरोपपत्र में नहीं किया गया था.
