नई दिल्ली: पत्रकार संगठनों- एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (ईजीआई), डिजीपब, कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे), प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ने श्रीनगर स्थित पत्रकारों पर हाल ही में हुई पुलिस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है और अधिकारियों से इसे तुरंत रोकने का आग्रह किया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार (21 जनवरी) को जारी एक बयान में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कश्मीर में अधिकारियों द्वारा वैध पत्रकारिता गतिविधियों के निरंतर दमन पर गहरी चिंता व्यक्त की है.
गिल्ड ने कहा कि एक लोकतंत्र में, जिसका मीडिया एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, इस तरह की मनमानी कार्रवाइयों के लिए कोई जगह नहीं हो सकती.
हालांकि, पुलिस अधिकारियों ने अभी तक इस कार्रवाई के कारणों पर स्पष्टीकरण नहीं दिया है, लेकिन गिल्ड ने इस बात की आलोचना की कि पुलिस द्वारा एक पत्रकार को बॉन्ड हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया, जिससे वे भविष्य में कोई ‘शांति भंग’ करने वाली गतिविधि नहीं करेंगे, फिर चाहें इसका जो भी अर्थ हो.
संगठन का कहना है कि इस तरह का प्रयास मीडिया को उसके वैध कर्तव्यों का पालन करने से रोकने के लिए दबाव और धमकी देने के समान हैं. अतीत में ऐसे अनगिनत मामले सामने आए हैं. इस तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए.
मालूम हो कि इंडियन एक्सप्रेस के बशारत मसूद, हिंदुस्तान टाइम्स के आशिक हुसैन और हाल ही में द हिंदू के पीरज़ादा आशिक समेत कई पत्रकारों को इस महीने जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मौखिक रूप से तलब किया। इससे पहले द वायर के कश्मीर संवाददाता जहांगीर अली का फोन दिसंबर में जब्त कर लिया गया था.
‘2019 से चली आ रही व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा’
डिजिटल न्यूज़ संस्थाओं के संगठन डिजीपब ने कहा कि इस तरह की जनहित पत्रकारिता को अपराध बना देना और उचित प्रक्रिया के बिना पत्रकारों को बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करना प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर हमला है.
संगठन की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इस तरह की धमकियां 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद से चली आ रही व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा हैं.
डिजीपब के अनुसार, ‘अधिकार समूहों और मीडिया निगरानी संस्थाओं की रिपोर्ट में बताती है कि 2019 से अब तक 200 से अधिक पत्रकारों को तलब, पूछताछ, छापे, धमकियों या कानूनी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है. यह दमन अब स्थानीय कश्मीरी पत्रकारों से लेकर प्रमुख राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और स्वतंत्र पत्रकारों तक फैल गया है, जबकि कई बड़े मीडिया संस्थान चुप्पी साधे हुए हैं, जिससे सबसे कमजोर पत्रकार ही इसका खामियाजा भुगत रहे हैं.’
मीडिया पर इस तरह की अनुचित कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन बताते हुए संगठन ने चेतावनी दी कि यह केवल जम्मू-कश्मीर का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे भारत में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक चिंता है.
इस संबंध में सीपीजे एशिया-प्रशांत कार्यक्रम समन्वयक कुणाल मजूमदार ने भी कहा कि पुलिस की यह कार्रवाई जम्मू-कश्मीर में मीडिया के खिलाफ धमकियों के एक सिलसिले का हिस्सा है. अधिकारियों को उत्पीड़न बंद करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पत्रकारों को अपना काम करने के लिए मनमानी पुलिस कार्रवाई का सामना न करना पड़े.
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ने भी घाटी के पत्रकारों पर इस तरह की पुलिसिया कार्रवाई की कड़ी निंदा की है.
इन संगठनों का कहना है कि जम्मू और कश्मीर में रूटीन रिपोर्टिंग को लेकर राष्ट्रीयअखबारों के पत्रकारों को बुलाए जाने और उनसे पूछताछ की खबरें गंभीर चिंता का विषय है.
पत्रकारों के बीच उनके काम को लेकर डर का माहौल बनाना एक लोकतंत्र में प्रेस की आज़ादी को कमज़ोर करने जैसा है.
मीडिया संगठनों ने जम्मू-कश्मीर पुलिस से ऐसी कार्रवाई को तुरंत रोकने का आग्रह किया है.
‘पुलिस ने अपनी सीमा पार कर दी’
वहीं, हिंदुस्तान टाइम्स के संपादकीय में इस संबंध में सख्त रुख अपनाते हुए कहा गया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सामान्य ख़बरों को लेकर पत्रकारों को मौखिक समन जारी करके ‘हद पार कर दी है.’
संपादकीय में लिखा गया है, ‘जम्मू-कश्मीर में पुलिस अत्यधिक दबाव में काम करती है, यह क्षेत्र सीमा पार आतंकवाद का गढ़ रहा है. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि पत्रकारों को डराया-धमकाया जाए, जो केवल समाचारों को लाने वाले हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे.’
यह देखते हुए कि पत्रकारों पर जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर सरकार के रुख का पालन करने की कोई बाध्यता नहीं है, अखबार ने कहा कि सच्चाई को निष्पक्ष तरीके से बताना उनका कर्तव्य है, चाहे इससे प्रशासन को कितनी भी असुविधा क्यों न हो.
अखबार ने कहा कि वह केवल अपने पाठकों के प्रति जवाबदेह है.
अखबार के मुताबिक, ‘श्रीनगर में पुलिस की मनमानी, ख़बरों को नियंत्रित करने और पत्रकारों को डराकर प्रशासन की छवि खराब करने वाली रिपोर्टिंग को रोकने की एक बेकार कोशिश है.’
अखबार आगे लिखता है कि इस तरह की कार्रवाई जम्मू-कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के सरकार के प्रयास को कमज़ोर करते हैं.
संपादकीय में कहा गया, ‘प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सहित केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों ने बार-बार इस क्षेत्र को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने, भय और अराजकता के लंबे और कष्टदायक दौर से गुज़रे संस्थानों का पुनर्निर्माण करने, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने और नागरिक, सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के महत्व पर ज़ोर दिया है. लेकिन तथ्यात्मक रिपोर्टिंग को रोकने के प्रयास इन सभी उद्देश्यों के ख़िलाफ़ हैं.’
