23 जनवरी को भारत सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मना रहा है. यह उत्सव ऐसे समय में आया है जब भारत के विश्वविद्यालयों को राजनीति से मुक्त करने की मांग को लेकर एक तीखी बहस चल रही है. केंद्र की मौजूदा सरकार बोस की विरासत को एक दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी के रूप में पेश करके उसे हड़पने की कोशिश कर रही है; यह प्रयास बोस के गहरे स्तर तक समाहित धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी विश्वासों की उपेक्षा करता है. ऐसे दौर में जब इस बात की खूब चर्चा है कि छात्र संघों को खत्म कर दिया जाना चाहिए और #ShutDownJNU (जेएनयू बंद करो) जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, और यह जोर दिया जा रहा है कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री के लिए हैं, असहमति के लिए नहीं, ऐसे में बोस की विरासत एक असहज लेकिन काउंटर-नैरेटिव पेश करती है.
नेताजी के लिए छात्र कभी भी शिक्षा का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं था, बल्कि राजनीतिक परिवर्तन के अग्रदूत थे. उस इतिहास की यह पड़ताल प्राइवेट पेपर्स, पुराने अखबारों, पत्रिकाओं, ओरल हिस्ट्री ट्रांसक्रिप्ट को आधार बनाकर की गई है. साथ ही नेहरू मेमोरियल और राष्ट्रीय अभिलेखागार (नेशनल आर्काइव्स ऑफ़ इंडिया) की होम पोलिटिकल की फाइलों व रुद्रांशु मुखर्जी की ‘नेहरू एंड बोस: पैरेलल लाइव्स’ व भावुक शर्मा के लेख “डीबंकिंग ‘पॉपुलर मिथ्स’ थ्रू अ स्टडी ऑफ बोस” की मदद ली गई है. यह उन विशिष्ट घटनाओं की जांच करता है जिन्होंने छात्र आंदोलन के साथ बोस के अटूट गठबंधन को परिभाषित किया और यह पता लगाता है कि ‘छात्र राजनीति’ का उनका बचाव आज भी प्रासंगिक क्यों है.
आइए सबसे पहले इस बात पर गौर करें कि वर्तमान शासन किस तरह बोस को गलत तरीके से अपने एजेंडे के लिए हड़पने की कोशिश कर रहा है.
बोस: कांग्रेस से मतभेद, लेकिन…
नेहरू और बोस के संबंध बेहद मैत्रीपूर्ण थे और जैसा कि रुद्रांशु मुखर्जी ने अपनी पुस्तक ‘नेहरू एंड बोस: पैरेलल लाइव्स’ में लिखा है कि यह बंधन इतना घनिष्ठ था कि नेहरू बोस को ‘छोटे भाई’ की तरह मानते थे. यह भावना तब और दृढ़ हो गई जब नेहरू की पत्नी कमला के अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने और नेहरू परिवार को सहारा देने के लिए बोस वहां मौजूद एकमात्र व्यक्ति थे.

8 अप्रैल, 1936 भारत लौटने पर बोस को हिरासत में लिया गया और कुछ समय के लिए जेल में डाल दिया गया. यह देश के युवाओं को रास नहीं आया और नेहरू ने भी 10 मई के दिन को ‘सुभाष दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की. बोस 1938 में पहली बार और 1939 में दूसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए थे, लेकिन गांधी से मतभेद और कांग्रेस कार्य समिति के असहयोग के कारण इस्तीफा देना पड़ा था.
दरअसल, 1939 के कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में बोस ने गांधी के पसंदीदा उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैय्या को हरा दिया था. गांधी ने इसे अपनी निजी हार माना, जिसके बाद कार्य समिति के असहयोग के कारण बोस को मजबूरन इस्तीफा देना पड़ा. उस समय, उन्होंने अपने भतीजे को एक पत्र लिखा था. यह वही पत्र है, जिसे ‘बोस के प्रति नेहरू के द्वेष के प्रमाण’ के रूप में उद्धृत किया जाता है. लेकिन इस उस पत्र को संदर्भ में और पूर्णता के साथ पढ़ा जाना चाहिए. बोस ने अपने भतीजे को लिखा था कि यदि नेहरू अपनी बात पर दृढ़ रहते, तो बोस (और नेहरू) के गुट को अधिक मत प्राप्त होते और वे एक अलग दल (पार्टी) का गठन भी कर सकते थे. लेकिन गांधी के प्रति बोस और नेहरू के दृष्टिकोण में अंतर था. दोनों ही गांधी का सम्मान करते थे, लेकिन बोस के विपरीत, नेहरू गांधी अलग होने के लिए तैयार नहीं थे.
हालांकि, पत्र कहता है कि नेहरू के अलावा किसी और ने मेरे उद्देश्य को अधिक नुकसान नहीं पहुंचाया, लेकिन यह टिप्पणी त्रिपुरी कांड के संदर्भ में की गई थी. यह इस तथ्य से उभरता है कि बोस, गांधी के प्रति अपनी प्रशंसा के बावजूद उनसे अलग होने के लिए तैयार थे, जबकि नेहरू इसके लिए तैयार नहीं थे. रुद्रांशु मुखर्जी बताते हैं कि इस समय बोस ने नेहरू को स्थिति पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित भी किया था. हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बोस के कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यकाल के दौरान नेहरू को प्लानिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था और नेहरू ने इस बात का उल्लेख करना आवश्यक समझा है.
जब बोस की मृत्यु का समाचार नेहरू तक पहुंचा, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए, यह उन बहुत कम अवसरों में से एक था जब वे सार्वजनिक रूप से रोए थे. उन्होंने भूलाभाई देसाई के साथ आई.एन.ए. के कैदियों का बचाव करने के लिए 25 वर्षों के बाद वकील का कोट भी पहना.
सुभाष चंद्र बोस की विरासत और वर्तमान शासन द्वारा उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए उनके बारे में फैलाई गई गलत धारणाओं को देखने के बाद, अब हम छात्र संगठनों के साथ उनके जुड़ाव की ओर बढ़ेंगे.
छात्र जीवन के शुरुआती वर्ष और आध्यात्मिक संकट
सुभाष चंद्र बोस का शुरुआती छात्र जीवन आध्यात्मिक खोज से राजनीतिक कार्रवाई की ओर बदलाव के प्रतीक थे. उन्होंने पहले सात वर्षों तक कटक के प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल में पढ़ाई की, लेकिन अंततः उन्हें लगा कि वे वहां फिट नहीं बैठते क्योंकि वह स्कूल मुख्य रूप से यूरोपीय बच्चों के लिए था. बाद में वे रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल चले गए, जहां उन्हें अपने प्रधानाध्यापक, बेनी माधव दास में अपना आदर्श मिला, जिन्होंने उन्हें प्रकृति से प्यार करना और नैतिक चरित्र को महत्व देना सिखाया.
अपनी किशोरावस्था के दौरान सुभाष एक आध्यात्मिक संकट से गुजरे और स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं से गहरे प्रभावित हुए. वे आत्म-त्याग और मानवता की सेवा में विश्वास करने लगे, जिसके कारण उन्होंने छात्रों का एक समूह बनाया जो बीमार लोगों की देखभाल करता था और गरीबों की मदद करता था.
भेदभाव के खिलाफ प्रेसिडेंसी कॉलेज में किया हड़ताल
1913 में, सुभाष कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में शामिल हो गए, जो उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. वह एक ऐसे छात्र समूह में शामिल हो गए, जो खुद को विवेकानंद का आध्यात्मिक अनुयायी मानता था, लेकिन कॉलेज के ब्रिटिश माहौल का भी आलोचक था. उन दिनों इतिहास के एक प्रोफेसर ईएफ ओटेन की वजह से कॉलेज का माहौल तनावपूर्ण हो गया. वह प्रोफेसर भारतीय छात्रों के साथ नस्लीय भेदभाव करने के लिए कुख्यात थे. जनवरी 1916 में, जब प्रोफेसर ओटेन ने कुछ छात्रों के साथ बदसलूकी की, तो कक्षा प्रतिनिधि के रूप में सुभाष ने माफी की मांग की. जब प्रिंसिपल ने मना कर दिया, तो सुभाष ने एक सफल हड़ताल आयोजित की, जो उस समय छात्रों के लिए एक बहुत ही साहसी कदम था.
कुछ हफ्तों बाद यह संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया, जब प्रोफेसर ओटेन ने एक और छात्र के साथ मारपीट की, जिसके कारण छात्रों ने बदला लेने के लिए ओटेन को कॉलेज की सीढ़ियों पर घेर लिया और उन्हें बुरी तरह पीटा. हालांकि, सुभाष ने कभी स्वीकार नहीं किया कि उन्होंने खुद प्रोफेसर को मारा था, लेकिन वे वहां मौजूद थे और प्रिंसिपल द्वारा उन्हें ‘सरगना’ माना गया.
जब एक समिति ने उनसे पूछताछ की, तो सुभाष ने शामिल अन्य छात्रों का नाम बताने से इनकार कर दिया. सजा के तौर पर उन्हें प्रेसिडेंसी कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया और कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्ययन करने से प्रतिबंधित कर दिया गया, जिससे उनकी शिक्षा एक वर्ष के लिए बाधित हो गई.

सुभाष कटक लौट आए और अपना समय सामाजिक कार्य करने में बिताया, जब तक कि उन्हें पढ़ाई पर लौटने की अनुमति नहीं मिल गई. इसके बाद वे स्कॉटिश चर्च कॉलेज में शामिल हो गए, जहां उन्होंने उच्च सम्मान के साथ दर्शनशास्त्र में अपनी डिग्री पूरी की. दिलचस्प बात यह है कि इस समय वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के ‘इंडिया डिफेंस फोर्स’ नामक एक सैन्य इकाई में भी शामिल हुए. उन्हें समझ आया किया कि सैन्य प्रशिक्षण और वर्दी पहनने के एहसास ने उन्हें आत्मविश्वास और शक्ति की एक ऐसी भावना दी, जो उन्होंने पहले महसूस नहीं की थी.
छात्रों के राजनीति क्यों जरूरी?
32 वर्ष की आयु में लाहौर में एक छात्र सम्मेलन में भाषण देते हुए, बोस ने इस धारणा को चुनौती दी कि छात्रों का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए. उन्होंने तर्क दिया कि एक गुलाम देश में हर समस्या का, जब ठीक से विश्लेषण किया जाता है, तो वह मूल रूप से एक राजनीतिक समस्या होती है, और इसलिए राजनीति को शिक्षा से अलग नहीं किया जा सकता है. राष्ट्रीय जीवन के सभी पहलू आपस में जुड़े हुए हैं, और कमियों का पता राजनीतिक कारणों से लगाया जा सकता है; नतीजतन, छात्र राजनीति से दूर रहने का जोखिम नहीं उठा सकते.
बोस ने सवाल उठाया कि भारत में राजनीति में छात्रों की भागीदारी पर विशेष प्रतिबंध क्यों लगाया जाना चाहिए, जब स्वतंत्र देशों में भविष्य के राजनीतिक विचारकों और कार्यकर्ताओं को तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.
उन्होंने ‘संपूर्ण जीवन’ नामक दर्शन का समर्थन किया और युवाओं को केवल अपनी पढ़ाई तक सीमित रहने के खिलाफ तर्क दिया. उनके लिए, जीवन को अलग-अलग खानों में नहीं बांटा जा सकता था. छात्र क्रांति के ‘अग्रदूत’ थे, जिनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे पुराने, अधिक सतर्क नेताओं की तुलना में स्वतंत्रता के लिए एक तेज प्रवृत्ति रखें. उन्होंने छात्र आंदोलन को गैर-जिम्मेदार बच्चों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि जिम्मेदार युवाओं के रूप में देखा जो अपने चरित्र का विकास करने और अपने देश की सेवा करने के लिए प्रेरित थे.
राजनीतिक गठबंधन और पार्टी के भीतर मतभेद
1930 के दशक में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के बीच व्यक्तिगत स्नेह और एक साझा वामपंथी विचारधारा में निहित बहुत गहरी दोस्ती थी, जो समाजवाद और योजना के सोवियत मॉडल की वकालत करती थी. उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक समानता और संसाधनों का उचित वितरण भी होना चाहिए.
हालांकि, द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में स्वतंत्रता प्राप्त करने के उनके दृष्टिकोण में मतभेद उभरे, क्योंकि नेहरू फासीवाद के विरोधी बने रहे जबकि बोस ने जर्मनी और जापान से समर्थन मांगा. 1930 के दशक के अंत तक, बोस द्वितीय विश्व युद्ध में कांग्रेस पार्टी के कुछ गुटों के संकोची रवैये से अधीर हो गए. यह मानते हुए कि अन्य गुट बहुत अधिक समझौतावादी थे, बोस ने अपना ध्यान छात्रों की ओर उस ताकत के रूप में लगाया जो स्वतंत्रता दिला सकती थी.

1940 का एआईएसएफ सम्मेलन और क्रांतिकारी रणनीति
जनवरी 1940 का अखिल भारतीय छात्र संघ (एआईएसएफ) सम्मेलन दिल्ली में सम्पन्न हुआ, जिसकी अध्यक्षता बोस ने की. एआईएसएफ का यह सम्मेलन उनके दर्शन के व्यावहारिक अनुप्रयोग का साक्षी बना और इसने गांधीवादी तौर-तरीकों से एक तीखे अलगाव को चिह्नित किया.
‘स्वतंत्रता प्रतिज्ञा’ में खादी कताई की अनिवार्यता को लेकर उपजे विवाद में, बोस ने संशोधनवादी छात्रों का समर्थन किया. उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक युद्ध के युग में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विजय प्राप्त करने के लिए केवल कताई पर्याप्त नहीं हो सकता. उन्होंने युवाओं से आध्यात्मिक प्रतीकात्मकता के बजाय आधुनिक राजनीतिक रणनीतियों को अपनाने का आग्रह किया. एआईएसएफ के अंदर कुछ छात्र गुट द्वितीय विश्व युद्ध को ध्यान में रखते हुए ‘शांति’ की मांग करने वाला एक प्रस्ताव पारित करना चाहते थे, लेकिन बोस उनसे असहमत थे.
उनका मानना था कि अंग्रेजी अभी युद्ध से जूझ रहे हैं, और यही ब्रिटिश साम्राज्य पर हमला करने का ‘सुनहरे अवसर’ है. उन्होंने उग्रवाद को अनिवार्य किया और छात्रों को निर्देश दिया कि यदि वरिष्ठ नेता कार्य करने में विफल रहते हैं, तो युवाओं को एक ‘वैकल्पिक नेतृत्व’ प्रदान करना होगा. इस सम्मेलन के बाद, गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के साथ दरार गहरी हो गई. हालांकि, बोस के मन में नेहरू और गांधी के लिए सम्मान कभी कम नहीं हुआ, जो इस तथ्य से साबित होता है कि उन्होंने अपनी आजाद हिंद फौज में नेहरू और गांधी के नाम पर रेजिमेंट बनाया था.
बोस ने अंग्रेजों पर देश के भीतर से दबाव बनाए रखने के लिए पंजाब में एक प्रमुख एआईएसएफ नेता प्रबोध चंद्र जैसे सहयोगियों की तलाश की. जनवरी 1941 में अपने ‘ग्रेट एस्केप’ से कुछ दिन पहले, बोस ने चंद्र को कलकत्ता बुलाया और उन्हें निर्देश दिया कि वे छात्र आंदोलन को सक्रिय रखें और आंतरिक अराजकता पैदा करें. इसके बाद बोस खुद विदेश में सैन्य मदद मांगने निकल पड़े.

एआईएसएफ का जर्नल ‘स्टूडेंट्स कॉल’, जिसने 1940 में जर्नल के मुख्य पृष्ठ पर सुभाष बोस की तस्वीर छापी थी. नोट: यह तस्वीर राष्ट्रीय अभिलेखागार के होम पोलिटिकल सेक्शन से ली गई है.
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और सैन्य कमान में परिवर्तन
बोस का प्रभाव भारत से बाहर भी फैला, उदाहरण के लिए उन्होंने प्रबोध चंद्र से बर्मा छात्र सम्मेलन में भाग लेने का अनुरोध किया. उस समय बर्मा भारत का हिस्सा था और यू आंग सान (U Aung San) जैसे छात्र बाहरी कर्ज से स्वायत्तता और मुक्ति के लिए आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे थे. 1938-39 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में वामपंथी छात्रों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन किया, जबकि रूढ़िवादी इसका विरोध करते थे.
गांधी, नेहरू और सुभाष बोस जैसे नेताओं की छात्रों के बीच अलग-अलग स्तर की लोकप्रियता थी. बोस को भारतीय जनता के लिए एक महत्वपूर्ण नायक के रूप में जाना जाता था, जो महत्वपूर्ण आदर्शों के लिए खड़े थे.
बाद के दिनों में छात्रों के साथ बोस का रिश्ता बदला. उन्होंने छात्रों से सेना में शामिल होने के लिए पढ़ाई छोड़ने का आह्वान किया. उनका दर्शन अपने अंतिम निष्कर्ष पर पहुंच गया: ‘सीखने का कर्तव्य’ अब ‘आजाद कराने के कर्तव्य’ के सामने गौण हो गया. बोस छात्रों को केवल भविष्य के नागरिक के रूप में नहीं, बल्कि क्रांति के तत्काल सैनिकों के रूप में देखने लगे.
(लेखक जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज के शोधार्थी हैं और एनएसयूआई से जुड़े हैं.)
