इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख़्त टिप्पणी- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद यूपी में ‘बुलडोज़र जस्टिस’ जारी

‘बुलडोज़र जस्टिस’ पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ध्वस्तीकरण को सज़ा के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि सज़ा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, न कि कार्यपालिका के पास. अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से सवाल किया है कि क्या किसी अपराध के घटित होने के तुरंत बाद किसी इमारत को गिराना, कार्यपालिका के विवेकाधिकार का ‘छलपूर्ण प्रयोग’ नहीं है.

प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि ‘बुलडोज़र जस्टिस’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के आदेश के बावजूद राज्य में इमारतों का दंड देने के उद्देश्य से ध्वस्तीकरण जारी है.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी सवाल किया कि क्या किसी अपराध के घटित होने के तुरंत बाद किसी इमारत को गिराना, कार्यपालिका के विवेकाधिकार का ‘छलपूर्ण प्रयोग’ नहीं है.

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी फहीमुद्दीन और अन्य द्वारा दायर एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान की. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके एक रिश्तेदार आफ़ान ख़ान पर बीएनएस, पॉक्सो एक्ट, आईटी एक्ट और उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज है.

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि हालांकि उन्हें एफआईआर में सह-आरोपी के रूप में नामित नहीं किया गया है, फिर भी कथित तौर पर जिला पुलिस से मिलीभगत रखने वाली एक भीड़ उन्हें निशाना बना रही है.

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष आशंका जताई कि हमीरपुर स्थित उनकी संपत्तियों, जिसमें एक आवासीय मकान, एक व्यावसायिक लॉज और एक आरा मिल शामिल है, उनको संबंधित अधिकारियों द्वारा ध्वस्त किए जाने के लिए चिह्नित किया गया है.

उनका यह भी कहना था कि व्यावसायिक लॉज और आरा मिल को पहले ही प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा सील किया जा चुका है. ऐसे में उन्होंने संभावित बुलडोजर कार्रवाई को रोकने के लिए हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की.

याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत देते हुए हाईकोर्ट ने सवाल किया कि क्या राज्य को किसी आरोपी के आवास को गिराने का अधिकार है, या फिर उसका दायित्व नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है.

पीठ ने टिप्पणी की कि किसी अपराध के तुरंत बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करना, कार्यपालिका के विवेकाधिकार का विकृत या अनुचित प्रयोग हो सकता है. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि उसके संज्ञान में ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें किसी अपराध के घटित होने के तुरंत बाद ही उस व्यक्ति से जुड़ी इमारतों में रहने वालों को ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी कर दिया गया है.

अदालत ने कहा, ‘इसके बाद वैधानिक औपचारिकताओं की दिखावटी पूर्ति के बाद आवासीय इमारतों को गिरा दिया गया.’

मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को तय करते हुए अदालत ने पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के फैसले, विशेष रूप से उसके पैरा 85 और 86 का पालन नहीं किया गया है.

अदालत ने सवाल किया, ‘क्या तोड़फोड़ करने वाली प्राधिकरण ने इसे उचित ठहराया, या फिर सार्वजनिक आवश्यकता/उद्देश्य के अभाव में आवासीय इमारतों को न गिराने का राज्य पर कोई दायित्व था?’ कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या किसी अपराध के घटित होने के तुरंत बाद ही ध्वंस के लिए कदम उठाए गए थे.

हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें किसी अपराध के तुरंत बाद ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी कर दिया जाता है. अदालत ने दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ध्वस्तीकरण को सज़ा के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि सज़ा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, न कि कार्यपालिका के पास.

इसके अलावा, अदालत ने यह जानना चाहा कि राज्य के वैधानिक अधिकार और एक सामान्य नागरिक के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों के बीच टकराव की स्थिति में हाईकोर्ट किस तरह संतुलन स्थापित कर सकता है.

अंत में, अदालत ने संबंधित अधिकारियों से यह भी पूछा कि क्या ध्वस्तीकरण की ‘उचित आशंका’ किसी नागरिक के लिए इस अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का आधार बन सकती है, और यदि हां, तो ऐसी ‘आशंका’ के अस्तित्व को मानने के लिए न्यूनतम मानक क्या होगा.

हालांकि, राज्य सरकार ने याचिका पर प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि यह समय से पहले दायर की गई है और याचिकाकर्ताओं को उनके खिलाफ जारी नोटिसों का जवाब देना चाहिए.

इसके अलावा, हाईकोर्ट को मौखिक आश्वासन भी दिया गया कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना और याचिकाकर्ताओं को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिए बिना कोई ध्वस्तीकरण नहीं किया जाएगा.