जयपुर: ज़ुगराफ़िये पर जैसलमेर-बाड़मेर-बालोतरा-जालौर-फलौदी-बीकानेर वाला क्षेत्र राजस्थान का वह बिंदु है, जहां भोर से पहले के उजले उजाले में मरुस्थल अपनी असंख्य वनस्पतियों और ख़ूबसूरतियों के साथ अंगड़ाइयां लेता है. उसके जिस्म में जुंबिश इस तरह होती है कि हवा रेत को संवारने लगती है. मानो किसी अनदेखे हाथ ने उस सुनहरी रेत को अक्षरों में बदल दिया हो. एक ऊंट की छाया दूर तक खिंचकर प्रश्नचिह्न बन जाती है. और उसी क्षण तनोट माता मंदिर के प्रांगण से एक पदयात्रा चल पड़ती है धीर, शांत, पर भीतर से ज्वालामुखी की तरह उष्ण.
आप अगर भारत के नक्शे पर पाकिस्तान से लगते उस हिस्से को देखें, जहां राजस्थान से सिंह के सिर-सा आकार बनता है, सबसे अधिक संकट वहीं है. इस क्षेत्र से अब करीब डेढ़ सौ से दो सौ लोग पैदल ही जयपुर के लिए निकल पड़े हैं. ये हैं किसान, पशुपालक, अध्यापक, विद्यार्थी, संत, किशोर, कुछ नंगे पांव तो कुछ अपनी खास जूतियों से रेत छिटकाते. ये सब जयपुर की ओर बढ़ रहे हैं.
21 जनवरी को सीमा से चली यह यात्रा इस समय ब्यावर को पार कर चुकी है और अजमेर के पास है. यह यात्रा 24 मार्च के आसपास जयपुर राजधानी जयपुर पहुंचेगी. इसका नाम ही इसका संकल्प है; ‘ओरण बचाओ, गोचर बचाओ, गाय बचाओ, जीवन बचाओ.’ यह कोई साधारण जुलूस या पदयात्रा भर नहीं; यह स्मृति की चलती हुई पंक्ति है, जो सौर ऊर्जा के नाम पर बदलते भूगोल से संवाद करना चाहती है.

ओरण: ज़मीन नहीं, जीवित परंपरा
ओरण को सिर्फ़ ‘ज़मीन का टुकड़ा’ कहना उसके अर्थ को छोटा करना है. पश्चिमी राजस्थान में ओरण वह सामुदायिक संरक्षित वनभूमि है, जिसे गांवों ने किसी देवी-देवता, पीर-फ़कीर, लोकनायक या शहीद के नाम पर छोड़ा. इस इलाके में डूंगरजी का ओरण है तो पीर फ़कीर और सतियों के नाम से भी ओरण हैं. इस इलाके के करीब आठ सौ गांव हैं और इन सभी में ओरण हैं. फलेड़ी गांव में पीर के नाम से ओरण है, जिसे अल्पसंख्यक समुदाय के पुरखों ने अपने गोधन, ऊंटों आदि के लिए तैयार करवाया था. यहां पेड़ काटना वर्जित है. चराई नियमों से बंधी है. कुएं, नाड़ियां, तालाब और खडीनें सामूहिक श्रम से संवारी जाती हैं. वर्षा का पानी आगौर से बहकर खडीनों में रुकता है और फिर गांवों के तालाबों तक पहुंचता है; वही जल साल भर मनुष्य, पशु, पक्षी और वनस्पतियों का सहारा बनता है.
‘ओरण एक जीवित, जीवंत, जीवनदायी वनस्पतियों और पुरखों की अनूठी परंपराओं का पावन संग्रहालय है,’ चतरसिंह जाम कहते हैं, जो वर्षों से पारंपरिक जल प्रणालियों पर काम करते रहे हैं. चतरसिंह जाम वे शख़्स हैं, जिन्होंने अनुपम मिश्र ने अपनी विश्व प्रसिद्ध कृति “आज भी खरे हैं तालाब’ लिखी तो इस क्षेत्र में सामग्री जुटाने में उनके साथ घूमे. और जाम इस पद यात्रा में उत्साह से चल रहे हैं.
वे घासों और वृक्षों के नाम ऐसे गिनाते हैं जैसे कोई श्लोक पढ़ रहा हो; धामण, मुरट, भुरट, दूधेल, शंखपुष्पी, सेवण; झाड़ियां; खींप, डाब; वृक्ष; खेजड़ी, बोरड़ी, जाळ, कुम्मट. यही जैव-विविधता मरुस्थल की रीढ़ है. ओरण का मतलब है कि उस भूमि में बहुत प्रचुर और तरह-तरह की घास होगी. इन ओरण में कुएं हैं, तालाब हैं, खडीनें हैं और कैचमेंट एरिया होने से यहां बारिश का पानी एकत्र होकर खड़ीनों में होते हुए गांवों के तालाबों में जाता है और वही पानी पूरे बरस लोगों, पशु पक्षियों और वनस्पतियों के काम आता है. इसी के भरोसे लोग यहां जैविक खेती करते हैं.

जैसलमेर और बाड़मेर में लगभग हर गांव की अपनी ओरण है. कहीं पाबूजी राठौड़ के नाम से, कहीं पीर के नाम से, कहीं जुझार सिंह के नाम से, जिनकी कथा में उनका शीश महिलाओं, गायों और लोकशक्ति की रक्षा में काठोड़ी गांव के पास मोकला की रणभूमि में गिरा, पर उनका धड़ लड़ता हुआ आगे सिंध के गोटकी तक बढ़ा. यह विक्रम संवत् 1283 यानी सन् 1226 की बात है. इस तरह आस्था ने इन स्मृतियों को भूमि में बदला और गांवों के लेागों ने चालीस हजार बीघा जमीन स्वेच्छा से ‘जुझार जी री ओरण’ के नाम से छोड़ी. इस इलाके में गाएं चरा रही एक बुज़ुर्ग महिला मनभरी देवी बताती हैं, आज वीरता के लिए पुरस्कार दिए जाते हैं, लेकिन पुराने समय में लोकसमाज वीरता के लिए इस तरह के काम करता था कि उस व्यक्ति की वीरता और ख्याति सदियों रहती थी.
भेड़-बकरियां और ऊंट चरा रहे किसी भी लड़के या बूढ़े से आप पूछें कि कहां से हो तो वह कहेगा, देगराय ओरण से हूं या भादरिया ओरण से. यहां लोग अक्सर अपने गांव का नहीं, अपनी ओरण का नाम लेते हैं तो उनकी पहचान का यह पक्ष पहलू सोचकर ही आंखें भीग जाती हैं.
राजस्व रिकॉर्ड और विस्मृति
समस्या यहीं से शुरू होती है यानी राजस्व रिकॉर्ड के स्मृति लोप से. स्थानीय लोगों का कहना है कि पश्चिमी राजस्थान की लगभग 80 प्रतिशत ओरण राजस्व अभिलेखों में दर्ज़ नहीं हैं. कागज़ पर वे ‘सिवाय चक’ या अन्य श्रेणियों में आती हैं. और जहां रिकॉर्ड नहीं, वहां असुरक्षा है.
पिछले वर्षों में सौर और पवन परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर भूमि आवंटन हुए. कार्यकर्ता आरोप लगाते हैं कि कई स्थानों पर ओरण भूमि भी आवंटित कर दी गई. सरकार और कंपनियां कहती हैं कि प्रक्रिया वैधानिक है और देश को स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता है.

‘हम सौर ऊर्जा के विरोधी नहीं हैं,’ यात्रा के सूत्रधार सुमेरसिंह सांवता कहते हैं. ‘पर पहले ओरण को सुरक्षित मान्यता दीजिए. उसके बाद बची हुई भूमि पर छोटे-छोटे प्रोजेक्ट लगाइए. विकास चाहिए, विनाश नहीं.’ सांवता और सैकड़ों ग्रामीणों ने पूरे तीन महीने धरना दिया. जब बात नहीं बनी तो पदयात्रा का निर्णय लिया. सीधे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से संवाद की आशा में. अभी दो दिन पहले इस समूह के लोगों की वार्ता रेवेन्यू मिनिस्टर हेमंत मीणा, जैसलमेर विधायक छोटूसिंह (भाजपा), पोकरण विधायक प्रताप पुरी (भाजपा) और बाली विधायक पुष्पेंद्रसिंह राणावत (भाजपा) के साथ वार्ता हुई थी; लेकिन इसमें कोई समाधान नहीं निकला.
सीमा के गांव और बंद रास्ते
मामला सिर्फ़ एक नहीं है. इस समस्या के कई पहलू हैं. जैसे रामगढ़ क्षेत्र के गांव, जैसे जोगा, पारेबर, सेउवा, रागवा आदि सीमा के सन्निकट हैं. स्थानीय लोग कहते हैं कि कुछ स्थानों पर परियोजनाओं ने रास्ते अवरुद्ध कर दिए. वे याद दिलाते हैं कि युद्धकाल में भी उन्होंने गांव खाली नहीं किए, सेना की सहायता की. लेकिन परियोजनाओं के कारण आज इन गांवों के लोगों के पास दूसरे गांवों में जाने के लिए रास्ते ही नहीं बचे हैं. ‘यह जमीन अब खाली नहीं रह गई है,’ सांवता कहते हैं. ‘इलाके की ढाई-तीन लाख गाएं और उनसे कहीं अधिक भेड़-बकरियों और ऊंटों के जीवन का अब जाने क्या ही होगा.’
पश्चिम राजस्थान में पशुधन सिर्फ़ अर्थव्यवस्था नहीं, संस्कृति है. ऊंट राज्य पशु है; लेकिन धीरे-धीरे कम हो रहे हैं. और राज्य पक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, जिसे यहां गोडावण कहते हैं, बिजली की लाइनों से टकराकर मर रहे हैं. संरक्षणवादी भूमिगत केबल की माँग करते हैं; कंपनियां लागत का प्रश्न उठाती हैं. इस पद यात्रा का नेतृत्व कर रहे सुमेरसिंह सांवता बहुत अरसे से इसी पर काम कर रहे हैं.

एक कंधा, एक प्रतीक
जोधपुर के बालेसर में एक दृश्य ने इस पदयात्रा को एक नया प्रतीक दे दिया. शिव बाड़मेर के निर्दलीय विधायक और सोशल मीडिया के नायक रविंद्र सिंह भाटी ने सुमेरसिंह सांवता को अपने कंधों पर उठाकर लगभग एक किलोमीटर तक चलाया. संदेश स्पष्ट था, नई पीढ़ी को अपनी विरासत का भार उठाना होगा. ‘मैं किसी दल का नहीं, सच का पक्षधर हूं,’ भाटी ने कहा. उन्होंने रात पदयात्रियों के साथ मंदिर में भूमि पर बिताई.
यह आंदोलन दलों से परे है. संत, समाजसेवी, राजपूत सभा, ग्रामीण संगठन आदि सभी धर्मसभाओं में एकत्र हो रहे हैं. कोई पाबूजी की पड़ पढ़ रहा है, कोई प्रसादी बाँट रहा है तो किसी को जांभोजी महाराज के संदेश याद आ रहे हैं. संत सत्यम गिरि महाराज कहते हैं, ‘गाय में माता का रूप है, वृक्षों में ईश्वर का वास है, जल पंचतत्व है. विकास के नाम पर इनका अंत नहीं हो सकता.’
विकास का द्वंद्व
राजस्थान भारत की सौर महत्वाकांक्षा का अग्रदूत है. रेगिस्तान की धूप राष्ट्रीय ऊर्जा नीति का अभिमान है. पर प्रश्न उठता है कि क्या हर उजाला हर छाया को मिटा दे?
विशेषज्ञ कहते हैं कि बेहतर भू-योजना, स्पष्ट राजस्व रिकॉर्ड, समुदाय की सहभागिता और वितरित सौर मॉडल; जैसे छोटे प्रोजेक्ट, कृषि-सौर (एग्रीवोल्टाइक), नहरों या छतों पर संयंत्र आदि संघर्ष कम कर सकते हैं. पर इसके लिए गति से अधिक विवेक चाहिए.
आम लोग कहते हैं, मरुस्थल को ‘बंजर’ समझना भूल है. यह घासभूमि है यानी ग्रासलैंड. सूक्ष्म, पर समृद्ध. ओरण सदियों से एक सांस्कृतिक पर्यावरण नीति रहे हैं. धर्म, संस्कृति, परंपरा और पारिस्थितिकी का संगम.
पदयात्रा की देह
इस यात्रा में शुगर के रोगी हैं, बीपी वाले हैं, गठिया से पीड़ित हैं. 75 वर्षीय कल्याण सिंह भी चले हैं और कुछ दूसरे लोग भी. शाम को धर्मसभा होती है. कानूनी माँगें और भक्ति गीत साथ-साथ. बुज़ुर्ग भगवानसिंह 115 किलो के हैं और उनके घुटनों और कमर में गहरा दर्द है; लेकिन वे यह यात्रा कर रहे हैं. प्रेमसिंह और तेजसिंह भी बेहद बुज़ुर्ग हैं, लेकिन शुरू से ही इस यात्रा में हैं.
यह केवल भूमि की लड़ाई नहीं; यह आत्म-पहचान की रक्षा है.
‘अगर आप ओरण ले लेते हैं,’ एक बुज़ुर्ग कहते हैं, ‘तो आप सिर्फ़ घास नहीं लेते. आप हमारी स्मृति, संस्कृति और सामाजिक भूगोल ले लेते हैं.’
सूर्य अस्त होता है. दूर कहीं सौर पैनल चमकते हैं. उसी आकाश के नीचे एक गोडावण भारी पंखों से उड़ने की कोशिश करता है धीमा, असहज, पर जिद्दी. पदयात्री चलते रहते हैं. मरुस्थल सुनता है.
और प्रश्न हवा में ठहरा रहता है, क्या हर हरित क्रांति अपने भीतर स्मृति का स्थान छोड़ सकती है? यह ग्रीन एनर्जी रेवल्यूशन हमें कहां ले जाएगी?
जयपुर अभी 184 किलोमीटर दूर है और ये अहिंसावादी यात्री हर दिन बमुश्किल 12 से 18 किलोमीटर दूरी तय करते हैं. यह सड़क भी बहुत असुरक्षित है और कुछ जगह तो बहुत ही बुरा हाल है. पर यह यात्रा सिर्फ़ दूरी नहीं नाप रही; यह उस संतुलन की तलाश है, जहां विकास और विरासत एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं, साथ खड़े हों.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
