नई दिल्ली: गौहाटी हाईकोर्ट ने गुरुवार (26 फरवरी) को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा को नोटिस जारी किया. अदालत ने उनके खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह कदम उठाया, जिनमें उन पर मुसलमानों को निशाना बनाकर कथित हेट स्पीच देने का आरोप लगाया गया है.
ज्ञात हो कि मुख्यमंत्री मुसलमानों के एक वर्ग को ‘मिया’ समुदाय कहकर संबोधित करते रहे हैं.
उल्लेखनीय है कि ‘मिया’ बांग्ला भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक अपमानजनक शब्द है. असम की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अक्सर इस समुदाय को ‘घुसपैठिए’ कहती रही है. इन पर आरोप लगाया जाता रहा है कि वे मूल निवासियों के संसाधनों, नौकरियों और ज़मीन पर कब्ज़ा कर रहे हैं.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं और मुख्यमंत्री के साथ-साथ केंद्र सरकार तथा असम सरकार को भी नोटिस जारी करने का निर्देश दिया. मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल को निर्धारित की गई है.
याचिकाकर्ताओं में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, असमिया स्कॉलर हिरेन गोहेन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) शामिल हैं, जिन्होंने पहले सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. शीर्ष अदालत ने उन्हें हाईकोर्ट जाने की सलाह दी थी.
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी, चंदर उदय सिंह और मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि शर्मा ने असम में मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ और धमकी भरे बयान दिए.
उन्होंने अदालत को बताया कि सोशल मीडिया मंच एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किए गए एक वीडियो (जिसे बाद में हटा दिया गया) में मुख्यमंत्री को टोपी पहने लोगों पर गोली चलाते हुए दिखाया गया था. साथ ही मतदाता सूची में कथित हेरफेर की योजना, मतदान अधिकार सीमित करने की कथित धमकी और समुदाय के आर्थिक बहिष्कार की अपील का भी उल्लेख किया गया.
सिंघवी ने तर्क दिया कि मुख्यमंत्री के बार-बार दिए गए बयान ‘भड़काने के आदतन पैटर्न’ को दर्शाते हैं और राज्य के प्रमुख के रूप में उनके दायित्वों के अनुरूप नहीं हैं.
अरोड़ा ने भी इसी तरह की दलील देते हुए उन घटनाओं का हवाला दिया, जहां मुख्यमंत्री ने छात्रों को अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों द्वारा स्थापित शैक्षणिक संस्थानों में जाने से हतोत्साहित किया था. उनका कहना था कि ऐसे बयान संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना और प्रस्तावना में निहित समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं तथा कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन सकते हैं.
अदालत ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत बयान प्रथमदृष्टया ‘विभाजनकारी प्रवृत्ति’ की ओर संकेत करते हैं, हालांकि अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वह सभी पक्षों की दलीलों और प्रस्तुतियों की विस्तार से जांच करेगी.
शर्मा के बयानों पर विवाद
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शर्मा हाल के महीनों में मुसलमानों के खिलाफ अपने बयानों को लेकर विवादों में रहे हैं.
बीते 7 फरवरी को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की असम इकाई ने एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री को मुसलमानों पर गोली चलाते हुए दिखाया गया था. व्यापक निंदा के बीच इस वीडियो को डिलीट कर दिया गया. इस वीडियो को शर्मा के पहले से जारी सांप्रदायिक हमलों की एक अवैध और खतरनाक बढ़ोतरी बताया गया. सोशल मीडिया पर कई लोगों ने लिखा कि यह गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत स्पष्ट अपराध बनता है.
शर्मा पहले कह चुके हैं कि उनका काम ‘मिया लोगों को परेशान करना’ है. शर्मा ने 27 जनवरी को कहा था, ‘कांग्रेस मुझे जितना चाहे गाली दे, मेरा काम मिया लोगों की ज़िंदगी मुश्किल बनाना है.’ उन्होंने लोगों से समुदाय को किसी भी तरह परेशान करने का आह्वान किया. उन्होंने कहा था, ‘रिक्शा में अगर किराया 5 रुपये है, तो उन्हें 4 रुपये दीजिए. जब तक उन्हें परेशानी नहीं होगी, वे असम नहीं छोड़ेंगे… ये कोई मुद्दे नहीं हैं.’
उन्होंने कहा था कि हिमंता बिस्वा शर्मा और भाजपा सीधे तौर पर मियाओं के खिलाफ हैं.
उनके नफरती बयानों को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी. उसके बाद मुख्यमंत्री ने हर्ष मंदर खिलाफ सौ मुकदमे करने की धमकी दी थी.
